वीरेंद्र नंदा

 मुजफ्फरपुर में सन् 1901 में रवीन्द्रनाथ टैगोर को दिये गये सम्मान-पत्र की बांग्ला प्रति की प्रतिलिपि रंगकर्मी स्वाधीन दास से मुझे मिली जो मेरे लिए ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ थी ! हिन्दी अनुवाद के लिए जब उनसे कहा तो वे टूटी-फूटी हिन्दी में तर्जुमा करते और मैं वाक्यों में ढालता किन्तु बात न बनी। लालगंज निवासी चिकित्सक व हिन्दी के कवि डॉ. निर्मल चक्रवर्ती से चलभाष पर अपने इस कष्ट के निवारण की दवा मांगी। फौरन निरोग करने की उन्होंने हामी भर दी और मैं तत्क्षण लालगंज की ओर चलायमान हो चला, साथ मेरी पत्नी-पुत्र भी हो लिए। वहाँ पहुँचते ही डॉ. चक्रवर्ती मेरी पत्नी को देख चुटकी ली- “अभी भी एस्कॉर्ट करना पड़ता है ?” कुछ देर ठंडा-गर्म, हँसी ठट्ठों के बाद मान-पत्र की बांग्ला प्रति उन्होंने थामी और हो गये शुरू- धारा प्रवाह। वे बोलते मैं लिखता जाता और इस तरह ढाई घन्टों में यह सम्पन्न कर-कराकर उन्होंने विदा किया। संभवतः इस मान-पत्र का यह पहला हिन्दी अनुवाद है। इसके लिए डॉ. निर्मल चक्रवर्ती को सादर नमन।

 बंग कवीन्द्र श्रीयुत रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सुभागमन के उपलक्ष्य में मुजफ्फरपुर में समर्पित मान-पत्र-

कविवर,

इस प्रदेश में आप के सुभागमन के उपलक्ष्य में आप की अभ्यर्थना करने के लिए इस मुजफ्फरपुर में, प्रवासी बंगाली आज यहाँ इकट्ठे हुए हैं। कुछ ही दिनों के लिए सही, बंगभूमि के वरदपुत्र, भारती की प्रिय संतान, आप को हमारे बीच पाकर हम सचमुच आनंदित, कृतार्थ एवं धन्य हुए हैं तथा इस मामूली अभिनंदन-पत्र के माध्यम से आप के प्रति हमारे छोटे-छोटे दिलों की अकृत्रिम भक्ति, प्रीति, श्रद्धा एवं कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।

   इसके पूर्व इस प्रदेश में आप का कभी पदार्पण नहीं हुआ, अतः इस प्रदेश के संबंध में कुछ बातें कहना संभवतः अप्रासंगिक नहीं होगा। आम तौर पर इस प्रदेश को तिरहुत के नाम से पुकारा जाता है। हमने सुना है कि इसका पौराणिक नाम तीरभुक्ति है। प्राचीन काल में यह एक विशिष्ट-समृद्ध जनपद था एवं पौराणिक मिथिला नगरी इसी के अंतर्गत अवस्थित थी। आज भी इस प्रदेश के उत्तरांचल में स्थित सीतामढ़ी, जनकपुर सरीखे स्थानों को इस अंचल के लोग राजर्षि जनक का यज्ञ क्षेत्र, सीता देवी की जन्मभूमि एवं श्रीराम के हर-धनुर्भंग के स्थान के रूप में जानते हैं तथा रामनौमी के दिन सहस्त्रों तीर्थयात्री उस पवित्र कथा का स्मरण कर हरधनु के टूटे खण्डों को देखने वहाँ जमा होते हैं। मगर यह इतिहास की, अतीत काल की कहानी है। वह प्राचीन गौरव कभी का समाधि में तब्दील हो गया है। उस समाधि का ध्वंसावशेष भी अब नहीं बचा है, वह किवदंती मात्र है। प्राचीन साहित्य में जनक या जनक की सभा का उल्लेख देखने पर स्वदेश भक्तों के मन में केवल शोक से बोझल स्मृतियाँ जाग उठती है। बांग्ला भाषा के आदिकवि विद्यापति का जन्म इसी अंचल में है। इसलिए यहाँ आते ही सहित्यानुरागियों के मन में विद्यापति की भाषा सुनने की उत्सुकता पैदा होती है। लेकिन इस भूखण्ड के कवि होने के बावजूद विद्यापति की कविता यहाँ बहुत बहुपठित नहीं है। बल्कि विद्यापति के नाम से बहुत कम लोग ही अवगत हैं। विद्यापति का जो कुछ भी सम्मान है वह बंग देश में है।

   बंग देश से इस प्रदेश की दूरी बहुत अधिक है, ऐसा भी नहीं है। बंगालियों की संख्या यहाँ अत्यल्प है, ऐसा भी नहीं है एवं जब बंगालियों का समाज है तो बंगालियों की भाषा भी है मगर यह भाषा दैनिक जरूरतों के अनुरूप प्रयोग होने वाली अनावृत, अनअलंकृत, अशोभित, वाक्य समूह मात्र है। उसकी न पोशाक है, न परिपाटी है, न श्रृंगार है। न उसे सुसम्बद्ध करने का कोई प्रयास है। यहाँ बंग साहित्य की सेवा करने की कोई कोशिश या उत्सुकता नहीं है। इस उदासीनता के फलस्वरूप इस प्रदेश में जन्में, पले और बढ़े बंगाली बच्चे हिन्दी और बांग्ला के विचित्र मिश्रण से एक संकर भाषा की सृष्टि कर रहे हैं।

यहाँ बंग साहित्य के अनुरागियों की साहित्य तृष्णा मिटाने के लिए इकलौता साधन दो-चार सामयिक पत्रिकाएँ हैं। उसमें से बहुतेरी पत्रिकाएँ आप के द्वारा ही संपादित हैं और बहुत बार आपकी ही रचना पढ़कर हम अपनी साहित्य की तृष्णा मिटाते हैं और जो भी पढ़ते हैं उससे मुग्ध हो जाते हैं और आनंदविभोर हो जाते हैं। आप बंग साहित्य के भंडार में ज्ञान एवं भाव के क्षेत्र से असंख्य रत्न उड़ेल चुके हैं तथा मातृभाषा के अंगों को विविध वर्ण, छंदों, तरह-तरह के आवरणों तथा अलंकार से सजा चुके हैं। हमलोगों की किस्मत में सारी चीजें देखने का सुअवसर न होते हुए भी जो देख पाते हैं वही हमारे चित्त को रस से सराबोर कर देता है। अन्तःकरण को आप के प्रति भक्ति और प्रेम से भर देता है और सैंकड़ों कोस की दूरी होने के बावजूद आप को चिरपरिचित अंतरंग की तरह हृदय के समीप खींच लाता है। साहित्याचार्य बंकिम बाबू के परलोक गमन के बाद बंग देश की कविता के राजसिंहासन के वर्तमान अधिकारी आप ही हैं। बंगालियों के हृदय राज्य में आप का राजसिंहासन निर्मित हुआ है। आप महाऐश्वर्यधारी राज-राजेश्वर के रूप में प्रत्येक भावुक बंग देशवासी के हृदय में विराज रहे हैं।

 बंकिम बाबू ने आपको ही अपने राज्यासन का भावी अधिकारी मानकर जयमाला निकाल कर आपके ही गले में डाल दी उसी दिन आप का राज्याभिषेक हो गया था। आप की बहुमुखी प्रतिभा चरित्र सृजन का उत्कर्ष, भाषा की उदात्तता एवं माधुर्य और सर्वोपरि आपकी हार्दिकता हमलोगों को कुछ ऐसे भावावेश रस से विभोर कर देता है जिसकी अनुभूति पद्य में कभी नहीं हुई थी एवं इसे भाषा में व्यक्त करना असाध्य है। आप की कविता और संगीत से बंग समाज मंत्रमुग्ध है। पेशावर राज्य से लेकर वर्मा की सीमा तक क्या स्थानीय क्या प्रवासी, आपकी कविता और संगीत से सकल बंग समाज मंत्रमुग्ध है। प्रत्येक बंगाली आपकी वाणी की झंकार सुनने के लिए व्यग्र हो उठते हैं। जो प्रतिभा उस गीत और कविता सृजन का उत्स है उस प्रतिभा के स्रोत को, साक्षात उस देवोपम कवि को अपने बीच विराजते देखकर हृदय में कुछ ऐसी अनअनुभूत, अनिर्वचनीय उसे हमारी कमजोर भाषा, दीन-हीन वाक्यों में हम कैसे व्यक्त करेंगे। अकवि का हृदय लिए हम आपको कैसे पूर्णरूपेण समझेंगे फिर भी आपके अमृतोपम काव्यपाठ से हृदय में जो कुछ भी संस्कार और सरसता उतपन्न होती है इसी के द्वारा आपको समझने की हम कोशिश करते हैं और जितना थोड़ा बहुत आपको समझ पाते हैं उतने से ही कुछ ऐसे मुग्ध हो जाते हैं कि आपके काव्य की पंक्ति-दर-पंक्ति में हमारे ही हृदय का भाव प्रतिबिंबित होता देखते हैं। हमारे हृदय पर आपका कुछ ऐसा आधिपत्य है जैसा बंकिम बाबू के अलावा कोई और नहीं कर सका है।

       आपकी कविता की समालोचना करने के लिए यह समय और स्थल उपयुक्त नहीं है और क्षमता भी हमारी नहीं है फिर भी उसकी बावत दी चार बातें नहीं कहने पर हमारा आपके प्रति कर्तव्य अधूरा रह जायेगा। अतः आपकी अनुमति से दो चार बातें हम कहेंगे। कविता-प्रवण बंग प्रदेश में आपने कविता में एक अभिनव युग का सूत्रपात किया है। आपको आदर्श मानकर, आपका अनुसरण कर और प्रेरित होकर कवियों की एक पीढ़ी पैदा हुई है ! ब्रह्मा से सिंधु तक बांग्लाभांति उस कविता के प्रभाव से द्रवित हो जाते हैं ऐसे कवियों की महिमा भी क्या कम है ? आपकी कविता में इस महिमा का उत्स निहित है। कविता की आत्मा है– सत्य औदार्य, सौंदर्य और सामंजस्य। कवि जो सत्य परिभाषित करते हैं वह अंतर्जगत का भावराज्य का सत्य है न कि बाह्य जगत का। मनोदेश में मानव की जो सुख-दुख, आशा-निराशा, मान-अभिमान, आवेग-आकांक्षा सरीखी भावनाएँ उत्पन्न होती हैं और फिर ओझल हो जाती हैं कवि उसी की भाषा में स्पष्ट अभिव्यक्ति करते हैं। कवियों का मानव समाज के प्रति इस सत्य के प्रचार का संकल्प अति महान है और उसका उद्देश्य मानव को शूद्रता से उठाकर महत्ता प्रदान करता है। अर्थात मान व चरित्र का उत्कर्ष और हृदय में देवत्व की प्रतिष्ठा उनका लक्ष्य होता है। मगर उस सम्पूर्ण सत्य की मात्र भाषिक अभिव्यक्ति कविता नहीं होती, अतीन्द्रीय जगत से सुललित भाव, सुकोमल सौंदर्य, ध्वनि एवं छंद, वर्ण और राग लेकर सुखद, सरल भाषा में आंतरिक सत्य की अभिव्यक्ति में जो सक्षम हैं वे ही कवि हैं। आपकी कविता में ये सारे गुण समाहित हैं इसीलिए आपकी कविता उतनी समादृत है और प्रतिष्ठित है। आपकी कविता की एक और विशिष्टता है अंतरप्रवाही देश प्रेम की धारा। देशप्रेम की उद्दीपक कविताएँ बंग देश में बहुत हैं लेकिन उनका प्रभाव दीर्घ स्थायी नहीं है। अचानक वे पूरे देश में उद्दाम बाढ़ की तरह फैल जाती हैं मगर फिर यह श्रोत रुक जाता है सागर में मिल जाता है और ऊपर बची रहती है कीचड़ की तह। आपकी रचनाओं में देश प्रेम फलगू की तरह अंतःसलिला है उसमें चंचलता या रौद्र रूप नहीं है, न लहरों का विध्वंसक रूप है बल्कि वे हमेशा मानस को धीरे-धीरे सींचती रहती हैं। आप जिस सास्वत सत्य में विश्वास करते हैं सम्पूर्ण देश और समाज को उसी सत्य से जागृत करने का प्रयास करते हैं। आपकी संगीतावली ने बांग्ला में एक अभूतपूर्व युग की अवतारणा की है। प्रेम संगीत या रोमांटिक संगीत भी प्रचुर मात्रा में रचा है लेकिन वह लालसा, कामना और भोग के ऊर्ध्व है– देहातीत है। उसमें त्याग, आत्म बलिदान, ससीम से असीम में जाने की कामना है। आपकी गद्य रचना भी अतुलनीय है। ‘ सुधित पाषाण ‘ नामक आपकी कहानी हमपर ऐंद्रजालिक प्रभाव डालती है और हमें तंद्राक्षण्ण कर एक स्वप्नलोक में ले जाती है।

  कविवर ! आपने तो बांग्ला साहित्य की सेवा, मातृभाषा की सेवा और स्वदेश की मानवृद्धि के लिए समर्पित कर दिया है। इससे ऊँचा जीवन का और क्या लक्ष्य हो सकता है। आप इस संकल्प पथ पर जितना आगे बढ़ेंगे-  बंग देश का उतना ही कल्याण होगा। आप नये बंगाल के आज पथ-प्रदर्शक हैं। आपको आगे-आगे देखकर हम निर्बल भीरू छोटे भाइयों में से कोई-कोई आपका अनुसरण कर मातृभाषा के लिए आत्मोत्सर्ग करना सीखेगा।

                         ” यद्यद्  विभूतिमत्  सत्वं  श्रीमदर्जित मेव  वा ।

                           तद्  देवान्  गच्छत्वं  मम  तेजो८हंस  सम्भवम्।।

 महाकवि आप में उन्हीं की विभूति है। शक्ति है। आप में उन्हीं के तेज का अंश है। आपकी उस विभूति को हम प्रणाम करते हैं। आपकी ही शक्ति हमलोगों को शोक-दुख में संकट-निराशा में शक्ति देकर बलवान करती है। आपकी ही विभूति हमारे दुर्बल, पीड़ित प्राणों को आश्चर्यजनक शक्ति से अनंत सौंदर्य में ले जाती है। आपका काव्य संगीत हमारे सुख में आनंद, दुःख में सांत्वना, विपत्ति में सहायता, निराशा में शांति, आशा में उत्फुल्लता और सुख में मित्र स्वरूप है। आपकी रचना हमारे मूक हृदय का सस्वर उच्छवास है, हमारे मन की कथा है।

    कविवर ! ईश्वर से हमारी प्रार्थना है कि आप को दीर्घायु करें आप के जीवन को मधुमय बनायें। आपकी प्रतिभा में नया बल, नया तेज संचारित करें एवं वह प्रतिभा आपकी अमृतमयी लेखनी से निकलकर बंग देश काव्य-कुंज में अमृत बरसाये तथा बंग समाज अमर कवि प्रतिभा का अमृतफल चखकर धन्य हो, कृतार्थ हो।

       बंग कविकुल रवि, हम आपकी कृतज्ञता पूर्वक, भक्ति पूर्वक नम्रचित्त ससम्मान अभ्यर्थना करते हैं एवं हर वर्ष आपकी अभ्यर्थना करने के सुअवसर की कामना करते हैं।

बंगाब्द  1308, पहला   श्रावण, प्रवासी बंग समाज,कमला चरण मुखोपाध्याय, रमेश चन्द्र राय,केशवचन्द्र बसु, प्यारी मोहन मुखोपाध्याय, प्रभाषचन्द्र बंद्योपाध्याय, बेनीमाधव भट्टाचार्य ज्ञानेन्द्र नाथ देव 

वीरेन नन्दा/ बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता