भारतेंदु नाट्य उत्सव में आज दिल्ली में तमाशा-ए-नौटंकी की तीसरी बार प्रस्तुति हो रही है। इससे पहले ये नाटक भारत रंग महोत्सव में भी धूम मचा चुका है। नौटंकी का रस लिए ये नाटक अभिनेताओं के जानदार और शानदार अभिनय की वजह से दर्शकों के जेहन में बसा हुआ है। 14 मार्च को सुरेश भारद्वाज निर्देशित वेलकम जिंदगी के साथ दिल्ली साहित्य कला परिषद के इस नाट्य फेस्टिवल काआयोजन शुरू हुआ। दूसरे ही दिन साजिदा के नाटक का मंचन हो रहा है। इसके अलावा फेस्टिवल में त्रिपुरारी शर्मा निर्देशित आधा चांद, के माधवन निर्देशित हेमलेट,  भारती शर्मा निर्देशित कर्मभूमि,  बापी बोस निर्देशित आषाढ़ का एक दिन की प्रस्तुति भी हो रही है। महोत्सव का समापन 20 मार्च को एमके रैना निर्देशित बाकी इतिहास से होगा।

तमाशा-ए-नौटंकी का निर्देशन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ग्रेजुएट साजिदा ने किया है। साजिदा ने नौटंकी को नए आलेख और नए अंदाज में दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है। साजिदा की माने तो हर आर्ट फॉर्म को वक्त के साथ कुछ बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए। वो मानती हैं कि नौटंकी को भी उसकी मूल आत्मा को जिंदा रखते हुए आधुनिक वक्त की कसौटी के लिहाज से खुद में कुछ परिवर्तन के लिए तैयार रहना होगा। वो नौटंकी के नए आलेखों की जरूरत को भी रेखांकित करती हैं। पंडित रामदयाल शर्मा ने इस नाटक का संगीत दिया है और उनके साथ पूरी संगीत मंडली नौटंकी के जो रंग बिखेरती है, वो तमाशा-ए-नौटंकी की जान है।

नाटक ‘तमाशा -ए- नौटंकी’ का आलेख मोहन जोशी का है, जिसमें उन्होंने कलाकारों की निजी जिंदगी के कुछ रंग समेटते हुए नाटक का ताना-बाना बुना है। नौटंकी के कलाकारों की निष्ठा कैसे वक्त के साथ बदलती है, ये इस नाटक में दिखलाया गया है। दरअसल, जैसे-जैसे मनोरंजन के आधुनिक साधन बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे नौटंकी जैसी कलाओं के लिए अपना वजूद कायम रख पाना मुश्किल हो जाता है। आर्थिक तंगी की वजह से कलाकारों में भी भटकाव आता है और नौटंकी का स्तर भी गिरता जाता है।

साजिदा ने अब तक की हर प्रस्तुतियों में थोड़े-बहुत बदलाव किए हैं और कलाकारों ने भी अपनी अभिनय प्रतिभा को आजमाते रहने की ठान रखी है। इसलिए नौटंकी के रंग में ये प्रस्तुति हर बार कुछ नया एहसास दे जाती है।

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