साभार.कुमार सर्वेश

नए साल की शुभकामनाओं के बीच आइए देसी की ओर चल! मिलवाते हैं पटना की अम्मा से! आइए, मिलते है पटना शहर की ऐसी शख्सियत से, जो गुमनामी के अँधेरे में जिंदगी जीने को अभिशप्भत है, और मैं ‘अम्मा’ कहकर पुकारता हूं। अम्मा प्रेमचंद गोलरंबप के निकट अवस्थित मोइन उल हक़ स्टेडियम के पहले गेट के पास बने फुटपाथ पर अपनी दुकान लगाती हैं। अम्मा की दुकान में आलूचॉप, प्याजू, फुलौरी, आलू-पूड़ी, दाल-पूड़ी और पकौड़ा मिलती है और वह भी उज्ज्वला के दौर में ठेठ अंदाज़ में लकड़ी के चूल्हे पर बना हुआ, जो आपको आपकी माँ के हाथों के बने पकौड़े की याद दिला देगा। मिट्टी की सोधी ख़ुशबूऔर देसी स्वाद से भरपूर ऐसा गरम-गरम करारा पकौड़ा दस लाख से अिधक की आबादी वाले किसी शहर में आपको शायद ही नसीब हो। आकार ऐसा रि धनिया/सरसों की चटनी के साथ दो आलूचॉप और प्याजू के बाद आप रात का खाना खाने की हिम्मत न जुटा पाएँ।

आजकल पटना-प्रवास के दौरान अक्सर मेरा यहाँ जाना होता है और सच कहूं तो, जाना नहीं होता है, मेरा पकौड़ा-प्रेम और अम्मा के हाथ के पकौड़े का आकर्षण अर मुझे वहाँ जानेके लिए विवश कर देता है। अबतक मेरे जिन मित्रों ने अम्मा के हाथ के पकौड़े खाये हैं वे उनके मुरीद बन गये हैं। पर, बर्गर, पिज्जा, चाऊमीन और डोसा के इस दौर महा हाइजेनिक-अनहाइजेनिक के विवाद में उलझी इस पीढ़ी के पास इतना समय कहाँ कि अम्मा की दुकान की ओर भी अपनी नज़रें इनायत करे, उस अम्मा की ओर, जो अपने ही घर में उपेक्षा एवं तिरस्कार की शिकार है, जिनकी ज़िंदगी सरकारों से बदलने से नहीं बदलती, जिन्हें मुद्रा और स्टार्टअप के दौर मे भी अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दस रुपए से सैकड़ा प्रति माह की ब्याज-दर पर सूदखोरों से उधारी लेनी पड़ती है और जिसने अपने बच्चों पर निर्भर रहने की बजाय आत्मनिर्भर जीवन को स्वीकार किया, पर अपनी ज़िम्मेदारियों से कभी समझौता नहीं किया। आज भी अम्मा अपनी माँ, जिनकी उम्म करीब पचासी साल की होंगी, की जिम्मेरियों को अपने कंधों पर उठा रही है, जबकि उनकी खुद की उम्र करीब पैंसठ साल होगी। आइए नए साल के अवसर पर इन अम्माओं और उनके उत्पादों के साथ खड़े होने का संकल्प लें ।