राकेश कायस्थ

राजपथ की पूरी महफिल इस बार अकेले बापू ने लूट ली। अरुणाचल से लेकर गोवा तक शायद कोई ऐसा राज्य हो, जिसकी झांकी में बापू दिखाई ना दिये हों। मंत्रालयों तक की झांकी में हर जगह बापू ही बापू विराजमान रहे।

यह साल उनकी 150वीं जयंती का है, झांकियों पर इस बात का असर स्वभाविक है। लेकिन अकेले गांधी पूरा भारत नहीं हैं। व्यक्ति का जरूरत से ज्यादा महिमामंडन गांधी दर्शन नहीं है।गणतंत्र दिवस की झांकियां देखते हुए दो-तीन बातें समझ आती हैं। पहली बात यह कि गांधी एक सुरक्षित और हानिरहित प्रतीक है। जब कुछ समझ ना आये तो गांधी की जय हो जाये।

दूसरी बात यह है कि शायद कोई ऐसी एजेंसी नहीं है, जो गणतंत्र दिवस की झांकियों की तैयारी का ठीक से समन्वय कर सके। ऐसा होता तो इतना दोहराव दिखाई नहीं देता, जो झांकियों में दिखा। राजपथ पर जो दृश्य 26 जनवरी को उपस्थित होता है, वह भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति होता है। क्या भारत की आत्मा इतनी एकरंगी है?कोई रचनात्मकता नहीं, कोई कल्पनाशीलता नहीं, बस वैसी ही रस्म अदायगी जैसी बरसों से होती आई है।

जिस विविधता को भारत की ताकत माना जाता है, वह इन झांकियों में गायब थी। सिर्फ पश्चिम बंगाल की झांकी ऐसी थी, जिसमें सामाजिक सौहार्द को आधार बनाया गया था और देश की बाकी समुदायों का प्रतिनिधित्व भी दिखा। लेकिन भारत की जनजातीय संस्कृति की झलक कहीं देखने को नहीं मिली। अगर 25 झांकियों में बापू दिखे तो किसी एक झांकी में अंबेडकर भी नज़र आ सकते थे।

26 जनवरी झांकियों में इस बार चिर-परिचित कांग्रेसी सुस्ती भी नजर आई। जिन तीन राज्यों राजस्थान, मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी है, वहां की झांकी मुझे नज़र नहीं आई। कुछ दोस्तों ने बताया है कि तीनों राज्यों की झांकी अस्वीकृत कर दी गई। यह और भी बुरा है। 26 जनवरी की झांकी कोई रियलिटी शो नहीं है। यह भारत के संघीय ढांचे की नुमाइश है। इसमें सभी भारतीय राज्यों की उपस्थिति अपरिहार्य होनी चाहिए।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आप ने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों एक बहुराष्ट्रीय मीडिया समूह से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ और ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।