dipak-1

महादेवी वर्मा

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।

युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल,

प्रियतम का पथ आलोकित कर।।

सौरभ फैला विपुल धूप बन, मृदुल मोम-सा घुल रे मृदु तन,

दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल

पुलक-पुलक मेरे दीपक जल।।

सारे शीतल कोमल नूतन, माँग रहे तुझसे ज्वाला-कण,

विश्वशलभ सिर धुन कहता मैं हाय न जल पाया तुझमें मिल

सिहर-सिहर मेरे दीपक जल।।

जलते नभ में देख असंख्यक, स्नेहहीन नित कितने दीपक,

जलमय सागर का उर जलता, विद्युत ले घिरता है बादल

विहँस-विहँस मेरे दीपक जल।।

द्रुम के अंग हरित कोमलतम, ज्वाला को करते हृदयंगम,

वसुधा के जड़ अंतर में भी, बंदी है तापों की हलचल

बिखर-बिखर मेरे दीपक जल।।

deepakमेरे निश्वासों से दुततर, सुभग न तू बुझने का भय कर,

मैं अँचल की ओट किए हूँ, अपनी मृदु पलकों से चंचल।

सहज-सहज मेरे दीपक जल।।

सीमा ही लघुता का बंधन, है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन,

मैं दृग के अक्षय कोशों से तुझमें भरती हूँ आँसू-जल।

सजल-सजल मेरे दीपक जल।।

तम असीम तेरा प्रकाश चिर, खेलेंगे नव खेल निरंतर,

तम के अणु-अणु में विद्युत-सा अमिट चित्र अंकित करता चल।

सरल-सरल मेरे दीपक जल।।

तू जल जल होता जितना क्षय, वह समीप आता छलनामय,

मधुर मिलन में मिट जाना तू उसकी उज्जवल स्मित में घुल-खिल।

मदिर-मदिर मेरे दीपक जल।।


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