ब्रह्मानंद ठाकुर

चुल्हन भाई के यहां हर साल बड़े धूमधाम से  कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। इस दिन उनके दरबाजे के मंदिर को खूब सजाया जाता है। वैसे यहां अगल-बगल  सटे हुए दो मंदिर है। एक में राम,लक्षमण,सीता और उनके भक्त हनुमान की मूर्ति है और दूसरे में शिवलिंग स्थापित है। इसीलिए सालों भर कुछ न कुछ आयोजन मंदिर परिसर में होता ही रहता है। कभी रामनवमी, कभी राम-जानकी विवाह, कभी शिवरात्रि महोत्सव और साल में एक बार कृष्ण जन्माष्टमी का आयोजन। मंदिर में कृष्ण की कोई स्थाई मूर्ति नहीं होने के कारण इस दिन उनका  दही – माखन खाते हुए एक बड़ा सा फोटो मंदिर के बरामदे में चौकी पर रख कर खूब सजाया जाता है। आसन और झूला का इंतजाम भी होता है। शाम से जो भजन -कीर्तन शुरू होता है वह आधी रात को कृष्ण के जन्म होने तक चलता रहता है। इधर पिछले जन्माष्टमी से आर्केस्ट्रा की परम्परा भी शुरू हुई है तो पारम्परिक कीर्तन भजन में कमी आ गई है। आर्केस्ट्रा के नाम पर जबर्दस्त चंदा वसूली होती है। स्वेच्छा से भी और राहगीरों को रोक कर भी। इसमें चुल्हन भाई की न तो सहमति रहती है न कोई विशेष योगदान। वे तो नितांत सात्विक विचार वाले सीधे- सादे भलमानस हैं मगर नवतुरिया लड़िकन सब के जिद के आगे वे अक्सर खामोश ही बने रहते हैं।

घोंचू उवाच पार्ट- 9

अर्थोपार्जन से लेकर आयोजन के समापन तक की सारी जिम्मेवारी इन्हीं मोंछउठाओन लडकों पर होती है। पिछले साल भी आर्केस्ट्रा हुआ था। दूर-दूर से कृष्णभक्त और आर्केस्ट्रा प्रेमी युवाओं का जुटान ऐसा कि  मंदिर परिसर से लेकर सड़क तक तिल रखने की जगह नहीं। रातभर सोहर सहित अन्य फरमाइशी गीतों का समा बंधा रहा।’ युग-युग जीअ तोर ललनवां/आजु के दिनमा बड़ा सोहावन रतिया मनभावन लागे हो। ललना रे जशोदा के जनमल होरिलवा/ होरिलवा बड़ा सुन्दर हो। ‘ फिर ‘ जनमे हैं कृष्ण कन्हाई, नन्द बाबा को दे दो बधाई ‘। एक-एक गीत पर गायक ,गायिका को  सौ, दो सौ यहां तक कि पांच -पांच सौ का पुरस्कार श्रोता दर्शकों की ओर से मिलने लगा। समा परवान चढता रहा। अपने अपने माथे में लाल – पीला , हरा मुरेठा बांधे कृष्णभक्त युवा झूमते रहे , तालियां बजाते रहे और गीतों की फरमाईश चलती रही। कलाकार गाते रहे -‘ गोकुला भए नन्द लाल खुशी घर छाएल हो,  ललना रे घर घर बाजत बधइया आ नन्द घर सोहर हो।’  इस बार उससे भी शानदार आयोजन के लिए नवतुरिया लडिकन की टीम ने कमर कस लिया है। गांव में घर- घर तुलसी दल आगे – आगे बांटा जा रहा है और चंदा मांगने वाली टीम पीछे – पीछे चल रही है। मनसुखवा के हाथ में कांपी- कलम है। वह इस टीम का अगुआ है।
सांझ-बत्ती का बखत हो रहा है।सब लोग खेती – पथारी के काम से फुर्सत पा चुके हैं। बस ,माल- मवेशी का चारा – दाना , नादी – सानी , गोबर – कर्सी करना और गपियाने के सिबा कुछ और कामे नहीं बचा है। तो आज मैं, बटेसर, बिल्टु ,परसन कक्का मनकचोटन भाई के तिनटंगा चउकी पर बइठे ही थे कि मनसुखबा की टीम पहुंच गई चंदा मांगने। आई घोंचू भाई मनकचोटन भाई के साथ दू बजे दिने में गांव से तीन कोस दूर फुलहरा गांव में भईंसी खरीदने गये हुए थे। भईंसी दाम-काम से जब नहीं पटा त जल्दिए वे दोनों वापस  लौटे और उसी समय दूरा पर जूम गये। मनसुखवा को अपने शागिर्दों के साथ दरबाजे पर खड़ा देख मनकचोटन भाई ने पूछा -‘ क्या सब हो रहा है बाबू ? किस अभियान में पिले हुए हो तुमलोग ?’ जनम अठमी का चंदा मांग रहे हैं, जगमोहना कहता है कि पहले मनकचोटन बबा से शुरू करेंगे तब आगे बढेंगे। ऊनका जतरा अच्छा होता है।’ इतना सुनते ही मनकचोटन भाई ने कुर्ता के उपरका पाकिट से एगो पनसहुआ निकाल जगमोहना के हाथ में थमा दिया और कपड़ा बदलने अपनी कोठरी में जा घुसे। मनसुखबा अपने नाना का नाम लिख उसके आगे 500  रूपया लिखकर अपनी टीम के साथ आगे बढ गया।
तस्वीर सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

घोंचू भाई ई सब बड़ा गौर से देख और समझ रहे थे। उन्होंने  कहा– ‘परम्परा से चिपके रहना नादानी के सिवा और कुछ नहीं है। इस दुनिया में हर चीज परिवर्तनशील है। जो परिवर्तनशील नहीं है  वैसा कुछ भी नहीं है इस संसार में। जब हर वस्तु परिवर्तनशील है तो उससे उत्पन्न विचार या चिंतन भी अवश्य ही परिवर्तनशील होगा। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को नहीं मानेगा वह मिट जाएगा। हम चाहकर भी परिवर्तन की इस गति को नहीं रोक सकते। हमें उस परिवर्तन के अनुसार अपनी मान्यताएं  और दृष्टिकोण बदलना ही होगा। घोंचू भाई ई सब कहिए रहे थे कि अंदर से मनकचोटन भाई  आज खुद चाय का ट्रे लिए हाजिर हो गये। मैंने बरामदे से खटिया नीचे उतार लिया था। मनकचोटन भाई के हाथ से ट्रे लेकर पहले एक कप घोंचू भाई को थमाया फिर बारी- बारी से वहां बैठे सबों को चाय दी।

चाय की चुस्की के साथ घोंचू भाई ने कहना शुरू किया–  मनकचोटन जी, दुनिया में शाश्वत और चिरंतन सत्य जैसा कुछ भी नहीं है। कुछ भी निरपेक्ष नहीं। हर चीज सापेक्ष है, देश, काल और परिस्थिति सापेक्ष। मानव सभ्यता के विकास के इतिहास का पन्ना उलटिए। सब पता चल जाएगा। आदिम युग से आधुनिक युग तक का सफर  तो कम से कम यही बताता है। आधुनिक युग मे आदिम और मध्य युगीन मान्यताओं को पकड़े रहना कहां की बुद्धिमानी है ?   आज के हमारे नवयुवक ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर वर्तमान में अपना कर्तव्य निश्चित करने के बजाए यह जो भोंडा प्रदर्शन कर रहे हैं क्या आज के वैज्ञानिक युग में  यह उचित लगता  है ?

 ‘ समझा नहीं मैं कि आप कहना क्या चाहते है? ‘  मनकचोटन भाई ने जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा। ‘यही  कि धर्मग्रंथ के अनुसार कृष्ण द्वापर मे पैदा हुए थे।  उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनके विचार से मानव सहित सम्पूर्ण जीव -जगत की रक्षा और विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आवश्यक था।  स्वच्छ और निर्मल जल का विशाल स्रोत यमुना नदी का जल कालिया नाग के  बिष से इतना जहरीला हो गया था कि मनुष्य और जानवरों की कौन कहे, उस नदी के ऊपर से उड़ने वाले  परिंदे भी उस बिष के प्रभाव से दम तोड़ने लगे थे। कृष्ण को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने तुरत यमुना नदी में प्रवेश कर कालिया नाग को मार कर यमुना के जल को फिर से उपयोग में लाने लायक बनाया। नारी जाति को जो सम्मान कृष्ण ने दिया, वह  कोई अन्य महापुरुष कहां दे पाए ? इसकी भी कथा कृष्ण के शौर्य और पराक्रम से जुड़ी हुई है। उन्होंने भौमासुर नामक राक्षस को वध कर उसके कारागार में बंद विभिन्न राजाओं के 16 हजार राजकुमारियों को न केवल आजाद कराया बल्कि उनसे विवाह कर उन सबों को मर्यादित जिंदगी जीने का अवसर दिया। इन दोनों उदाहरणों को वर्तमान संदर्भ में देखने और समझने की जरूरत है। आज हो क्या रहा है ? आज  राम और कृष्ण के देश की नारियों पर अत्याचार चरम पर है। भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार क्या नहीं हो रहा है आज? इसकी चिंता आज किसको है ?

सारी प्राकृतिक सम्पदाओं के अनियंत्रित दोहन से  सम्पूर्ण मानवजाति के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है । जल ,जमीन  और हवा तक प्रदूषण का शिकार है। नदियों का अस्तित्व  भीषण संकट मे पड़ गया है। तो क्या कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेकर इन प्राकृतिक संसाधनों को बचाने का  आंदोलन शुरू नहीं होना चाहिए ?   ऐसे में हम हाथ पर हाथ रख यदि बैठे रहे तो क्या  मानव जाति को नष्ट होने से बचा पाएंगे? कृष्ण  के नाम की माला जपने,जन्मोत्सव मनाने की जगह जरूरत है कर्मोत्सव मनाने की।  और हमें वर्तमान संदर्भ में कर्म का रूप भी निश्चित करना पडे़गा। यही  आज के वक्त का तकाजा है। इतना कहकर घोंचू भाई तिनटंगा चौकी से उठे और चलते बने। मैं सोंचने लगा, घोंचू भाई आज बडे़ पते की बात कह गये। धर्म का रूप भी इसी तरह बदलता है!


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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