डा. सुधांशु कुमार

जी हां ! चौंकिए मत !! जरा ध्यान से इस पीत पट पर अंकित ब्रह्म स्वरूप शब्द पर गौर से गौर फरमाइए , क्योंकि शब्द को हमारे शास्त्रकारों ने ब्रह्म कहा है, माना है। इसी प्रक्रिया के तहत जब मैंने माननीय सांसद , श्री श्री 116 , लगभग 70 वर्षीय गृहमंत्री राजनाथ जी की गोदी में विराज रहे 71 वर्षीय गांव ‘बेंती’ पर गौर फरमाया तो उसके स्वर्णिम शिक्षा केंद्र ‘प्राथमिक विद्यालय बेंती’ के पीत-पट पर अंकित हरित शब्द-मालाओं के बीच कुछ श्याम शब्द ऐसे शोभायमान थे मानो वे काजल की भूमिका में बिहारी लाल की नायिका की आंखों के सौंदर्य में श्रीवृद्धि कर रहे हों ! किन्तु, जब उसके सौंदर्य पर जरा गौर से गौर फरमाया तो उस पर अंकित एक शब्द ने मुझे बाल्यकाल के बगीचे में ‘धकेल’ दिया, जहां मई-जून की भरी और कड़ी ‘दुपहरिया’ में ‘डलिया-पतिया ‘, और ‘चोरिया-नुकिया’ खेलते थे और उस खेल की परिणति होती पादने-पदाने की सांध्य पर्यंत चलने वाली क्रिया ! इन खेलों में जो हारता, वह तब तक पादता, जब तक सामने वाली टीम हार न जाय।

यहां ‘पादना’ पद किसी नकारात्मक अर्थ का सूचक नहीं है, बल्कि यह तो हारने वाली टीम व खिलाड़ी का गवाह है। वैसे भी इसके सही अर्थ सौंदर्य का साक्षात्कार तो गांव का वह ‘छोरा’ ही कर सकता है जिसने कम से कम अपनी बाल्यावस्था गांव की अमराइयों में गुजारी हो। अन्यथा तीसी के विशाल वृक्ष पर झूला झूलते हुए आलू की फैक्ट्री से सोना निकालने की परिकल्पना का चांस बढ़ सकता है! वैसे जो भी संगी इस चोरिया-नुकिया और डलिया-पतिया अंतर्ग्रामीण प्रतियोगिता की चपेट में आ जाता, वह घंटों पादता ही रहता लेकिन यहां तो माननीय गृहमंत्री की गोदी के गांव के साथ-साथ संपूर्ण देश की शिक्षा 71 वर्षों से पाद रही है और इस ‘पीत पट’ के अनुसार इस शिक्षा को ‘पदाये जाने वाले मान्य विषय’ हैं -हिन्दी , गणित , सा. अध्ययन, नैतिक शिक्षा इत्यादि।

वैसे माननीय सांसदों की गोदी में विराज रहे गांवों और गोदी विहीन सभी गांवो पर दृष्टिपात करने के उपरांत मैंने पाया कि इस पादने की क्रिया में गोदीयुक्त और गोदीविहीन सभी गांव सम्मिलित हैं। कोई गांव पेयजल समस्या के कारण पाद रहा है, तो कोई सड़कों के कारण, किसी गांव को पलायन पदा रहा है तो किसी गांव को ‘माटसाब’ सवेरे-सवेरे ‘खुले में शौचनिषेध परियोजना’ के अंतर्गत ‘दौड़ा-दौड़ा’ कर पदा रहे हैं। वैसे, यदि आप गौर से देखें तो पाएंगे कि व्यष्टि, समष्टि , भारत, ‘फाखिश्तान’, अमेरिका, रूस , चीन , सीरिया ट्रंप, किम, शी, मो , पु , सबके सब पाद रहे हैं। खुशफहमी बस ‘इत्ती’ है कि वह समझ रहे हैं कि वे नहीं , उन्हें छोड़कर और सभी पाद रहे हैं। उन्हें शायद मालूम नहीं कि बच्चे को उसके बस्ते के बोझ ने, किशोरों को बुढ़ापे ने तो बुड्ढों को उसके तरुणापे ने पदा रखा है।

जहां तक रही हमारे गृह मंत्री जी की बात तो उन्हें ‘महबूबा’ पदा रही हैं। न जाने किन परिस्थितियों में , जबसे उन्होंने ‘महबूबा’ की फरमाइश पूरी की है, उस वक्त से घाटी, और घाटी के साथ साथ वह भी कुछ ज्यादा ही पाद रहे हैं। जो प्रधानसेवक सिंहासनारूढ़ होने से पूर्व दुश्मन को पदाने के जुमले छोड़ा करते थे, एक के बदले दस सिर लाने की बातें करते थे, वह घाटी को झुलसते हुए और दुश्मन की गोलियों के शिकार नन्हीं जान को देखकर भी मौन हैं! हमें अब पता चल रहा है कि ‘माता’ और ‘महबूबा’ में महबूबा का पलड़ा भारी क्यों है! धधकती हुई घाटी में सीजफायर का पेट्रोल डालकर फिलहाल वह सवा सौ करोड़ के दिमाग को पदा रहे हैं। इस सीजफायर का अर्थ किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा …न गोली खा चुके जवानों के और न खाने वाले भारत माता के जांबाज सपूतों के। यह सोच-सोच कर सबका दिमाग पाद रहा है कि जो व्यक्ति 56 इंच के सीने के साथ एक सिर के साथ दस सिर लाने की गर्जना करता था उसने पत्थरबाजों के सामने रमजान की ‘जुमलेबाजी’ कैसे छोड़ दी ?

खैर , छोड़िए इन बातों को ! बाते हैं , बातों का क्या !! अगर राजनीति की बात मेरे पल्ले पड़ती , तो मैं भी अपनी गोदी में गांव लेकर, दिल्ली में ढिंढोरा पीट रहा होता !! और ढिंढोरा पीटते-पीटते इकहत्तर साला आजादी को पदा रहा होता !


डॉ सुधांशु कुमार- लेखक सिमुलतला आवासीय विद्यालय में अध्यापक हैं। भदई, मुजफ्फरपुर, बिहार के निवासी। मोबाइल नंबर- 7979862250 पर आप इनसे संपर्क कर सकते हैं। आपका व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘नारद कमीशन’ प्रकाशन की अंतिम प्रक्रिया में है।


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