बनारस में कथानक को इम्प्रेशन में बदलता ‘मैकबेथ’

बनारस में कथानक को इम्प्रेशन में बदलता ‘मैकबेथ’

संगम पांडेय

व्योमेश शुक्ल की नई प्रस्तुति ‘बरनम वन’ का कलेवर मैकबेथ की तमाम होती रही प्रस्तुतियों में काफी मौलिक और नया है। यह खाली-मंच पर पश्चिमी ऑपेरा की मानिंद एक कास्ट्यूम ड्रामा है। अभिनेतागण यहाँ पारंपरिक एंट्री-एग्जिट के बजाय अचानक किसी भी छोर से नमूदार पाए जाते हैं। म्यूजिक और कोरियोग्राफी का खेल भी इसमें निरंतर चलता रहता है। फिर तुर्रा यह कि ये म्यूजिक भी रोमन दौर पर बनी हॉलीवुड फिल्मों की तर्ज का है। ‘कामायनी’, ‘राम की शक्तिपूजा’ और ‘चित्रकूट’ जैसी बैले प्रस्तुतियों से बनी छवि से व्योमेश का ये एक करारा शिफ्ट है। 

लेकिन प्रस्तुति की समस्या है उसका आलेख। रघुवीर सहाय के ‘तदनंदर संगति का लाभ सुखकर होगा’ जैसे विशुद्ध गद्य-संवादों वाले इस अनुवाद की एक प्रस्तुति मैंने पहले भी देखी है, इसमें कथावस्तु और पात्रों की कोई स्पष्टता नहीं बन पाती। इस तरह प्रस्तुति निरंतर एक ‘अमूर्त कथानक’ का बोरियत भरा सत्यापन करने में गर्क हो सकती थी। पर वैसा नहीं हुआ तो इसका कारण था उसमें नई-नई चीजों से खेलने की अच्छी एनर्जी। यहाँ मैकबेथ अपनी कशमकश को स्टाइलाइज्ड करता है। गहरा तनाव उसके चेहरे पर है, पर अगला पाप उसे करना ही है। खास तरह से बाल बाँधे वह मजबूत शख्सियत वाला एंटी-हीरो है, जिसकी कशमकश के आगे लेडी मैकबेथ की सारी कुटिलता दोयम है। तनाव में थोड़ा खब्ती हो गया हुआ वह जमीन पर हाथ पटकता है, सनकी की तरह एक लफ्ज पर अटक कर कई तरह से बोलता है या गुस्से में पात्रों को चाँटे मारता है।

प्रस्तुति में दृश्यों को इस तरह बनाया गया है मानो कथानक को इम्प्रेशन में बदलने का इरादा हो। पूरे चेहरे को पट्टियों से लपेटे बैंकों का प्रेत काफी देर तक मंच पर टहल रहा है और मैकबेथ की घबराहट एक काव्यात्मक अदा हो गई है। और इसी दरम्यान कोरियोग्राफी के साथ म्यूजिक की अच्छी संगत वाले वो दृश्य भी हैं, जिनमें पश्चिमी ऑपेरा की आभा दिखती है। जिस बीच मंच पर अभिनय और देहगतियों के ये टुकड़े घटित हो रहे हैं उसी बीच छत से (बकौल मोहन राकेश चमगादड़ की तरह लटकी) बीम लाइटों का खेल भी जारी है, जिसमें लाइट एंड साउंड शो नुमा पूरे स्टेज पर दौड़ती रंगीन रोशनियों से लेकर नीम अँधेरे में डूबे दृश्यों तक एक पूरा सिलसिला है। अक्सर दृश्यों में ब्लॉकिंग भी इस तरह से है कि पीछे वाले पात्र कम दिखते हैं, और यह कोई नासमझी नहीं बल्कि दृश्य को इसी तरह बरतने का एक प्रयोग है। यानी क्यों जरूरी है कि हर चीज अकादमिक सरलार्थ में ही हो।

बिल्कुल शुरुआत में दो पुते चेहरे वाले पात्र और एक नगाड़ा मंच पर हैं। नगाड़े पर चोट के साथ ही सक्रियता शुरू होती है। ऐसे दृश्य और प्रस्तुति का कुल ढाँचा एक नए तरह के रंग-ढंग को सामने लाता है, जिसमें पाठ विवरणों की अनिवार्यता से मुक्त होकर भावदशाओं के कोलाज में परिवर्तित हो गया है। दो घंटे लंबी प्रस्तुति में संयोजन की कई त्रुटियाँ भले हों पर उसके डिजाइन में दम है। दर्शक उसी के दम पर बनारस के नागरी मंडली प्रेक्षागृह में इतनी देर तक बैठे रहे, क्योंकि कहानी तो कहीं कुछ पल्ले पड़ नहीं रही थी।


संगम पांडेय। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र। जनसत्ता, एबीपी समेत कई बड़े संस्थानों में पत्रकारीय और संपादकीय भूमिकाओं का निर्वहन किया। कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। नाट्य प्रस्तुतियों के सुधी समीक्षक। हाल ही में आपकी नाट्य समीक्षाओं की पुस्तक ‘नाटक के भीतर’ प्रकाशित।