अनीश कुमार सिंह

क्या कसूर था मेरा, यही कि मैं एक लड़की हूं। क्या कसूर था मेरा कि मैं उनका सामना नहीं कर पाई। बड़ी हिम्मत जुटाकर मैंने इसका विरोध किया। अपने स्कूल के टीचर से अपना दुखड़ा सुनाया। लेकिन उन्होंने क्या किया। सिवाय मेरी अंतर्रात्मा को तार-तार करने के। मैंने प्रिंसिपल से भी गुहार लगाई लेकिन वहां भी मुझे निराशा मिली। सबने मेरा फायदा उठाया। एक-एक कर सभी ने मुझे वो ज़ख़्म दिये जो मेरे लिए हमेशा एक नासूर की तरह रहेंगे। उन 7-8 महीनों में 18 लोगों ने दरिंदगी की हद पार कर दी।
मेरा बस एक ही सवाल है कि मैं अब किस पर विश्वास करूं। स्कूल के उन दोस्तों पर जिन्हें मैं अपने भाई की तरह मानती थी, उन गुरुजनों पर जो मेरे लिए अपने मां-बाप की तरह पूजनीय थे। या फिर समाज के उस ताने-बाने पर जो हमेशा से पुरुषप्रधान रहा है। आज नहीं तो कल दोषियों को सजा मिलेगी। ये मेरा मन कहता है लेकिन क्या सज़ा मिल जाने भर से मुझे इंसाफ़ मिल जाएगा। ये सवाल मैं आप पर छोड़ती हूं।
अनीश कुमार सिंह। छपरा से आकर दिल्ली में बस गए हैं। इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता के गुर सीखे। प्रभात खबर और प्रथम प्रवक्ता में कई रिपोर्ट प्रकाशित। पिछले एक दशक से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सक्रिय।
न्यूज़ नेशन
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