रुपेश कुमार
चौकाने वाले आंकड़े हैं कि जिले में प्रत्येक वर्ष गेहूं की उत्पादकता कम होती जा रही है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन एवं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत फसल जांच कटनी प्रयोग प्रतिवेदन से लिये गये आंकड़े के अनुसार गेहूं की उपज विगत तीन साल में तेरह क्विंटल प्रति हेक्टेयर कम हो गयी है। इस वर्ष की रिपोर्ट आना अभी शेष है, लेकिन इस साल मौसम की मार भी गेहूं की फसल पर पड़ी है। तापमान में वृद्धि के कारण उत्पादन करीब चालीस से पचास फीसदी तक कम हुआ है। मधेपुरा और आसपास के इलाकों के किसान गेहूं की यह उपज देख कर निराश हैं जबकि खेती में लागत बढ़ती ही जा रही है। जहां कट्ठा में दो मन गेहूं की उपज होती थी, इस साल केवल बीस से पच्चीस किलो तक हुई है। बमुश्किल ही लागत निकलने की उम्मीद है। किसानों के जरूरी काम प्रभावित हो गये हैं। किसी का कर्ज चुकता नहीं हो पाया तो किसी के घर की छत की मरम्मत इस बरसात में होने से रही। मक्का की फसल खेतों में है बोरिंग फेल होने के कारण पटवन प्रभावित हो रही है। अगर हर फसल के साथ ऐसा ही होता रहा तो आने वाले समय की भयावहता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
गांव-देहात में कहावत है..आमदनी अठन्नी और खर्च टका ! गेहूं की खेत को लेकर इस बार किसानों पर ये यह कहावत सटीक बैठ रही है। उदाकिशुनगंज प्रखंड क्षेत्र मे एक बार फिर गेहूं की फसल ने किसानों को रुला दिया है। पिछले वर्ष गेहूं की अच्छी फसल होने की वजह से किसानों ने अपनी जमीन पर गेहूं की बुआई इस आस में की थी कि इस बार भी अच्छी उपज होगी और इसे बेच कर घर के जरूरी काम करेंगे लेकिन प्रकृति की मार ने किसानों का सपना तोड़ दिया। किसानों की माने तो टाका खर्च आमदनी अठन्नी की तर्ज पर गेहूं की पैदावार हुई है।

बिहारीगंज प्रखंड के हथियौंधा पंचायत वार्ड संख्या 12 के किसान लोघाय मंडल कहते हैं कि 12 कट्ठा खेत में विगत साल बीस से पच्चीस मन गेहूं की उपज होती थी, इस साल केवल तीन मन ही उपज हुई है। गेहूं के पौधों के विकसित नहीं होने के कारण पैदावार पर असर पड़ा वहीं चूहे ने भी उनकी फसल को काफी क्षति पहुंचाई है। इसी गांव के लालबहादुर मंडल कहते हैं कि एक एकड़ में 18 मन गेहूं की उपज होती थी लेकिन इस साल केवल 12 मन ही गेहूं हो सका है। किसान भैरव यादव कहते हैं कि दस कट्ठा में विगत साल जहां तीन क्वींटल गेहूं की उपज हुई थी इस साल केवल दो क्वींटल ही गेहूं उपजा।
हर साल घटती जा रही है गेहूं की उपज
वर्ष 2013-14 – 174.02 क्विंटल प्रति हेक्टेयरवर्ष 2014-15 – 161.05 क्विंटल प्रति हेक्टेयरवर्ष 2015-16 – 156.27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर(राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन एवं राष्ट्रीय कृषि विकास योजना अंतर्गत फसल जांच कटनी प्रयोग प्रतिवेदन से लिये गये आंकड़े )
बिहारीगंज प्रखंड के हथियौंधा पंचायत किसान भैरव यादव कहते हैं कि इस साल गेहूं बेच कर घर की मरम्मत कराना था। चदरा की कीमत भी पता कर ली थी लेकिन इतने कम उपज को बेच कर क्या काम होगा, ईश्वर ही जाने। सिंहेश्वर प्रखंड के कमरगामा गांव के किसान राजा सिंह कहते हैं कि इस साल गेहूं की कम उपज के कारण वह अपने खेत की घेराबंदी का काम पूरा नहीं कर पायेंगे।
क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक
कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक सह कृषि वैज्ञानिक डा मिथिलेश कुमार राय कहते हैं कि गेहूं की रोपनी के समय से ही तापमान में दो डिग्री की वृद्धि दर्ज की गयी थी। जब गेहूं में कल्ला निकलने का समय आया तो तापमान के कारण ही पौधों में शाखाएं नहीं निकल सकीं। यही कारण रहा कि गेहूं का उत्पादन प्रभावित हो गया।
सिंहेश्वर प्रखंड के रामपट्टी गांव के किसान विजय सिंह कहते हैं कि इस साल गेहूं की उपज में पचास फीसदी तक की गिरावट आयी है। लागत निकलना तो काफी मुश्किल है अब मक्के की फसल पर ही आसरा है। तापमान बढ़ने क कारण पटवन अत्यधिक करना पड़ रहा है। गेहूं की फसल के भरोसे कई जरूरी काम थे, कुछ कर्ज भी चुकता करना था लेकिन इस बार गेहूं ने निराश कर दिया है, मक्का पर उम्मीद है।

मधेपुरा के सिंहेश्वर के निवासी रुपेश कुमार की रिपोर्टिंग का गांवों से गहरा ताल्लुक रहा है। माखनलाल चतुर्वेदी से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद शुरुआती दौर में दिल्ली-मेरठ तक की दौड़ को विराम अपने गांव आकर मिला। पहले हिंदुस्तान और अब प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ के तौर पर गांव की ज़िंदगी में जितना ही मुमकिन हो, सकारात्मक हस्तक्षेप कर रहे हैं। उनसे आप 9631818888 पर संपर्क कर सकते हैं।
किसानों को मिले मुआवजे की खैरात से निजात
gehu ki kheti nirash nahi kar skti sir. agr bhav ache mile to