ऐ हिंदी, वो करते रहें फ़िक्र, हम तो तुम पे फिदा हैं
विश्व हिन्दी सम्मेलन, भोपाल से ज़ैग़म मुर्तज़ा
विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी। फोटो-पीआईबी
हिंदी दुनिया की चौथी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। दुनिया भर में 100 करोड़ से ज़्यादा लोग हिंदी बोल, समझ लेते हैं। हिंदी एक बड़ा बाज़ार है जिसमें साहित्य से लेकर टीवी और फिल्म कारोबार शामिल है। हिंदी में हर साल हज़ारों किताबे छप जाती है जबकि हिंदी पत्र पत्रिकाओं और फिल्मों की तादाद दुनिया की किसी भी भाषा में होने वाली इस तरह की गतिविधियों से कम नहीं है। लेकिन ये दुनिया की अकेली भाषा है जिसको ज़िंदा रखने के लिए सरकार को सम्मेलन आयोजित करने पड़ते हैं और विभागों में सालाना रस्म अदायगी वाले कार्यक्रम आयोजित करने पड़ते हैं।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 40 करोड़ से ज़्यादा लोग हिंदी को अपनी भाषा बताते हैं लेकिन इससे जुड़े लोगों को फिक्र है कि हिंदी धीरे धीरे मर रही है। विश्व हिंदी सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री देश की चिंता ज़ाहिर करते हैं। प्रधानमंत्री हिंदी के लिए कितने फिक्रमंद हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वो हिंदी की तुलना डायनासोर और विलुप्त सभ्यताओं से करते हैं। वो हिंदी के लिए वही चिंता जताते हैं जो अब से चालीस साल पहले आयोजित पहले हिंदी सम्मेलन में भी ज़ाहिर की गई थीं। लेकिन हिंदी की चुनौतियों को लेकर न तब किसी के पास कोई जवाब था और न शायद अब है।
हिंदी अकेली भाषा है जिसे ज़िंदा रखने के लिए राजभाषा विभाग है। हर सरकारी विभाग एक पखवाड़ा आयोजित करता है। संसद सचिवालय से लेकर सभी मंत्रालयों में हिंदी में काम करने के लिए एक सालाना आयोजन ज़रूर होता है। इन सभी आयोजनों में हिंदी की दुर्दशा पर आंसू बहाए जाते हैं। चिंताएं, चिंतित चेहरे और अफसोस में डूबी आवाज़ें इन आयोजनों की पहचान है लेकिन जो चीज़ इन आयोजनों में नहीं दिखती वो है हिंदी भाषी होने का गर्व।
विश्व हिंदी सम्मेलन
हर साल इन आयोजनों पर सरकार करोड़ों रुपया फूंक देती है। क़समें खाई जाती हैं कि अब तक भले ही कुछ नहीं हुआ आगे ज़रूर होगा। हिंदी के नाम पर लाखों के रोज़गार पैदा होते हैं। इन आयोजनों से कई नए रोज़गारों का सृजन होता है। अर्थव्यवस्था के लिए अहम धन सरकार की तिजोरियों से निकल कर चलन में आ जाता है। लेकिन इस भाषा को स्मृद्ध करने वाले हिंदी की ही तरह दुर्दशा के शिकार हैं। हमने कभी जानने की कोशिश नहीं की कि प्रेमचंद क्यों ग़रीबी में दम तोड़ देते हैं, क्यों बाबा नागार्जुन भूख से लड़ते रहे।
भोपाल में हिंदी सम्मेलन के दौरान चर्चा करते हिंदी प्रेमी। फोटो- सच्चिदानंद जोशी (साभार-फेसबुक वॉल से)
विश्व हिंदी सम्मेलन की भव्यता, आयोजन पर ख़र्च होने वाला अपार धन, क़रीब 40 देशों के हिंदी प्रेमियों का जमावड़ा और भारत भाग्य विधाता यानि निर्णय प्रक्रिया से जुड़े लोगों की हिंदी से जुड़ी फिक्र एक अलग तरह की भावना पैदा करती है। ये न श्रद्धांजलि जैसा भाव है कि लोग तसल्ली देने इकट्ठा हुए हैं और न उत्सव जैसा भाव है कि लोग जश्न मनाने आए हैं। ये इसके बीच उपजी कोई नई तरह की भावना है।
बहरहाल हिंदी को लेकर हिंदी के साहित्यकार किसी फिक्र में नहीं हैं। हिंदी को खाद, पानी देने वाले लोग इस सम्मेलन में शरीक हों चाहे न हों, भरोसा दिलाते हैं कि हिंदी मरेगी नहीं।
भले ही अब हमारे बच्चे अंग्रेज़ी बोलने में गर्व महसूस कर रहे हैं। भले ही हिंदी बोलने में कुछ लोगों की दासग्रंथि आत्मग्लानि के स्तर तर सक्रिय हो जाती हो। चाहे राजनीतिज्ञ हिंदी से अपने लगाव के मगरमच्छी आंसुओं और झूठे दंभ का प्रदर्शन करते हों। भले ही हिंदी सम्मेलन का मंच कुछ ख़ास और बाक़ी आम के बीच बांट दिया गया हो। लेकिन हिंदी को लेकर मेरा भरोसा क़ायम है। इस सम्मेलन में आकर ये और मज़बूत हुआ है जब देखता हूं कि सरकारी बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद हिंदी जन की भाषा है। दुनिया भर में तमाम हिंदुस्तानियों को हिंदी अभी भी जोड़ती है। हिंदी का दिल बड़ा है और हिंदी वालों का भी।
दुनिया भर में लोग हिंदी की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। उत्साह बढ़ता है जब लोग सरकारी न्यौता न मिलने के बावजूद पैसे देकर इस सम्मेलन में सिर्फ इसलिए आते हैं कि अपने जैसे लोगों से मिलना ही हो जाएगा। भरोसा जागता है जब देखते हैं कि लोग अभी भी हिंदी में सोचते, बोलते और भविष्य के सपने देखते हैं। सरकारी कार्यक्रम डर को मज़बूत करते हैं और यक़ीन दिला देते हैं कि सरकारी संरक्षण में ये भाषा मर जाएगी लेकिन हिंदी वाले इस भरोसे को मज़बूती देते हैं कि मेरी हिंदी ज़िंदा रहेगी। यक़ीनन ‘सरकारी हिंदी’ ख़तरे में है मगर ‘जनभाषा हिंदी’ के उज्जवल भविष्य का दावा मैं कर सकता हूं।
ज़ैग़म मुर्तज़ा। उत्तरप्रदेश के अमरोहा जिले में गजरौला के निवासी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। फिलहाल दिल्ली में राज्यसभा टीवी में कार्यरत हैं।
4 thoughts on “ऐ हिंदी, वो करते रहें फ़िक्र, हम तो तुम पे फिदा हैं”
सटीक,सचोट आलेख। साधुवाद।
हिंदी को कामकाज में लाएंगे तभी कुछ भला हो सकता है… फिल्में धीरे-धीरे अंग्रेजी हो जाएंगी।
Behatarin….yahi to Hindi ki khasiyat hai. Lekin afasos is bat ka hai ki Jo log Hindi me liye fikra mind hone ka dawa karte hain wahi neta mantri English me bolane me Garv mahashush karte hai ….
सटीक,सचोट आलेख। साधुवाद।
हिंदी को कामकाज में लाएंगे तभी कुछ भला हो सकता है… फिल्में धीरे-धीरे अंग्रेजी हो जाएंगी।
Behatarin….yahi to Hindi ki khasiyat hai. Lekin afasos is bat ka hai ki Jo log Hindi me liye fikra mind hone ka dawa karte hain wahi neta mantri English me bolane me Garv mahashush karte hai ….
Avadhesh Singh- Point…..