हरि अग्रहरि

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा-जब तक लोगों का दिल और दिमाग नहीं बदलता, तब तक किसी भी योजना में स्थायित्व नहीं आ सकता। आज निर्मल गांव इसलिए निर्मल नहीं रहे कि लोगों का माइंड सेट नहीं बदला। मंत्री महोदय ने बताया कि कुछ सांसदों की शिकायत है कि उन्होंने जिन गांवों को चुना है, वहां विकास के लिए फंड की समस्या आ रही है। बड़े उद्योगों का सीएसआर फंड भी उन्हीं सांसदों को मिल पाता है, जिनके संबंध कारपोरेट घरानों से होते हैं। आमतौर पर सीएसआर फंड उन्हीं सांसदों को मिल पाते हैं, जिनके क्षेत्र में औद्योगिक संस्थान हैं।
सांसद आदर्श ग्राम योजना
गांवों में कई खुराफाती भी होते हैं, वे बनते हुए काम को बिगाड़ना चाहते हैं, ऐसे में उससे भी जूझना पड़ता है। पर मन में यदि ठान लें तो काम पूरा होकर ही रहेगा। किसी भी गांव को आदर्श बनाने में सफलता तभी मिलेगी, जब मन में उस गांव को आदर्श बनाने की ललक होगी। ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास पहुंचे प्रजेंटेशन में 82 को छांटा गया था, जिनमें 31 की चर्चा मध्यप्रदेश की मीटिंग में हो पाई। वहां मौजूद अधिकारियों से और भी आयडिया मांगे गए ताकि उन्हें भी शामिल किया जा सके। मंत्रालय ने देश के बड़े राज्यों में और एक साथ कई राज्यों के अधिकारियों के साथ ऐसी ही बैठकें जारी रखने का फैसला किया है।

देश में कुल 6 लाख गांव और 2.40 लाख ग्राम पंचायतें हैं। 74 वें वित्त आयोग ने दो लाख 292 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस हिसाब से प्रत्येक गांव को 15-16 लाख रुपए मिलेंगे। यदि बड़े गांव हैं तो उन्हें 50 लाख रुपए तक हर साल मिल सकेंगे। उससे भी ज्यादा बड़े गांवों को एक-एक करोड़ रुपए मिल सकेंगे। वे खुद इस राशि को अपनी जरूरत के अनुसार खर्च कर सकेंगे। राज्य की योजनाओं के लिए एडवायजरी जारी की गई है कि वे सांसद आदर्श ग्राम योजना की तरह दूसरे गांवों में भी विकास कराएं।
उत्तरप्रदेश से बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने इस मीटिंग में यूपी के अधिकारियों की गैरहाजिरी पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि उत्तरप्रदेश में जो भी काम होते हैं तो वह लोहिया गांव में ही होते हैं। सांसद आदर्श ग्राम की तो चर्चा ही नहीं हो रही है। वहां की सरकार एक पैसे की राशि आदर्श ग्राम के लिए नहीं दे रही है। ऐसे में पूरा दारोमदार केंद्र सरकार पर ही आ गया है। वहीं सांसद जनार्दन मिश्रा ने कहा कि लोगों को ये सोच बदलनी होगी कि सरकार, एनजीओ आकर सब कुछ कर दें। इस बात पर चिंता जाहिर की कि शराब के लिए हजारों रुपए फूंक देने वाले लोग गांव के विकास के लिए 10 हजार रुपए जुटाने की जहमत नहीं उठाते।