बदलाव टीम वरिष्ठ पत्रकारों से मुलाकात और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू आज से कर रही है। हमें खुशी है कि इस सिलसिले की शुरुआत हम वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के साथ बातचीत के जरिए कर रहे हैं। टीवी डिबेट में बेहद संजीदगी से अपनी तल्ख टिप्पणियों और तर्कों के साथ अपनी बात रखने वाले उर्मिलेश निजी जिंदगी में संवाद की तमाम संभावनाओं को तलाशते रहते हैं। युवा पीढ़ी के साथ निरंतर बातचीत कर वो उनका मन टटोलते भी हैं और उन्हें पठन-पाठन के लिए प्रेरित करते हैं।

मुसाफिर हूं यारों 

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के संघर्ष और सपनों पर खुली बातचीत
आयोजक- बदलाव, ग़ाज़ियाबाद 
दिनांक- 4 मार्च 2018, रविवार
समय- सुबह-11 बजे से 1 बजे तक
स्थान- 439, कोणार्क इंक्लेव, सेक्टर 17,डी, वसुंधरा (साईं मंदिर के पास)

1956 में उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में एक छोटे से गांव के किसान परिवार में जन्म लेने वाले उर्मिलेश का जीवन संघर्षों की दास्तान है। उर्मिलेश पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले के रहने वाले हैं। गांव से निकलकर इलाहाबाद और फिर दिल्ली तक का सफर तय किया। आपकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी से हुई। आपने हमेशा पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के मुद्दों को पूरी संवेदनशीलता के साथ उठाया। आप इस बात को रेखांकित करते हैं कि नक्सली मूवमेंट के शुरुआती दौर और जयप्रकाश आंदोलन को करीब से देखने-समझने वाले पत्रकारों की जमात की राजनीतिक और सामाजिक चेतना अलहदा रही है।

आप सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले उन चंद चुनिंदा पत्रकारों में शुमार हैं, जो ट्रॉलर्स की परवाह नहीं करते। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक वो सारे सवाल जो सत्ताधारी दलों से किए जाने चाहिए, वो करते हैं, चाहें उन्हें कितनी भी आलोचना क्यों न झेलनी पड़े?

“समझने की बात है कि सवर्ण जाति या उसमें पैदा हुआ कोई एक व्यक्ति और ‘मनुवाद’ एक नहीं हैं, पर्यायवाची नहीं हैं! सवर्ण समाज के अनेक लोगों ने इस देश में मनुवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, जैसे राहुल सांकृत्यायन, इएमएस नंबूदरीपाद आदि! दूसरी तरफ, पिछड़े समाज में पैदा हुए कई लोग शोषण और उत्पीड़न पर टिकी इसी व्यवस्था के पैरोकार बने। कइयों को अभी भी देखा जा सकता है। इसलिए मेरी टिप्पणी में जहां कहीं मनुवाद दिखे, उसे कृपया सवर्ण जाति या उसके हरेक व्यक्ति का पर्यायवाची नहीं समझें! मनुवाद से स्वयं सवर्णों का भी अहित हुआ है।”

– उर्मिलेश, फेसबुक पर की गई टिप्पणी का अंश

उर्मिलेश का नाम आज देश के जाने-माने पत्रकारों और लेखकों में शुमार है। आप करीब 4 दशक से पत्रकारिता से जुड़े हैं । राज्यसभा टीवी में आपने अपने कार्यक्रम ‘मीडिया मंथन’ के जरिए पत्रकारिता का गंभीर विश्लेषण किया और तमाम वो मुद्दे उठाए जिससे मीडिया घरानों और मीडियाकर्मियों का भटकाव कम हो सके, उनका बौद्धिक शिक्षण-प्रशिक्षण हो सके। मीडिया मंथन को आपने करीब 7 साल तक होस्ट किया। इन दिनों द ‘वायर’ में आपकी वीडियो सीरीज  ‘मीडिया बोल’ काफी चर्चा में हैं, जिनमें तमाम सम-सामयिक मुद्दों पर आप बेबाक अंदाज में अपनी राय रखते हैं। इसके साथ ही आप इन दिनों newsclick.in पर भी एक वीडियो सीरीज में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर पूरी धार के साथ अपनी बात रख रहे हैं। आपको साल 2017 में शहीद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की स्मृति में छत्रपति-सम्मान’ दिया गया है

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की किताब ‘कश्मीर विरासत और सियासत’ और ‘क्रिस्टेनिया मेरी जान’ पिछले साल ही प्रकाशित हुई है। 1993-94 में पहली बार उर्मिलेश कश्मीर गए और उसके बाद से लगातार वो वहां के मुद्दे अपनी लेखनी से उठाते रहे हैं। कश्मीर पर इससे पहले आपने ‘झेलम किनारे दहकते चिनार’ नाम से पुस्तक लिखी, जो काफी पढ़ी और सराही गई।

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