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पुष्यमित्र

माना जा रहा है कि कल हुए रेल हादसे की सबसे संभावित वजह थी कि झांसी-कानपुर रेलखंड के बीच चले रहे दोहरीकरण कार्य के बावजूद इंदौर-पटना एक्सप्रेस 108 किमी की रफ्तार से दौड़ायी जा रही थी. इंदौर से ही गाड़ी में शिकायत थी, झांसी में ड्राइवर ने शिकायत भी की और उरई में गाड़ी रोक कर बीस मिनट तक उसकी मरम्मत भी की गयी, मगर कहीं भी यह जरूरत नहीं समझी गयी कि ट्रेन की रफ्तार कम रखी जाये. आखिरकार तेज रफ्तार ट्रेन कानपुर पहुंचते-पहुंचते बेपटरी हो गयी और सैकड़ों लोग अकाल-कलवित हो गये. उनके परिवार उजड़ गये और जो जख्मी हैं उन्हें उबरने में काफी वक्त लगेगा.

रेलवे के संरक्षा विभाग में काम करने वाले मेरे एक मित्र बताते हैं कि झांसी और कानपुर के बीच इन दिनों रेल दोहरीकरण का काम चल रहा है और इसे 2018 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. इस काम का टेंडर जीएमआर कंस्ट्रक्शन, केईसी बेंगलुरू और दक्षिण भारत की कंपनी एसईडब्लू को सौंपा गया है. इतना महत्वपूर्ण मार्ग होने के बावजूद अब तक इसका दोहरीकरण नहीं हो पाया था और अब नयी सरकार हर हाल में इसे जल्द से जल्द डबल लाइन करना चाह रही है, इस कोशिश में काफी तेजी से काम चल रहा है. सिर्फ नयी पटरियां ही बिछायी नहीं जा रही बल्कि पुरानी पटरियों में भी स्लीपर और दूसरे जरूरी बदलाव किये जा रहे हैं.

मित्र बताते हैं कि कई दफा ऐसी स्थिति में आधे-अधूरे काम के बीच रेल को गुजरने की इजाजत दे दी जाती है, मगर ऐसे हालात में ध्यान रखा जाता है कि ट्रेन धीमी रफ्तार में गुजरे. रेलवे की भाषा में इसे कॉशन कहते हैं और जहां काम चल रहा होता है, वहां जगह-जगह कॉशन लगे रहते हैं. इसके बावजूद किसी ट्रेन का 108 किमी की रफ्तार से गुजरना हैरत की बात लगती है. बहुत मुमकिन है कि जहां हादसा हुआ हो वहां रेलवे कर्मी कॉशन लगाना भूल गये हों या फिर ड्राइवर से ही उसे देखने में चूक हो गयी हो. हकीकत क्या है इसका तो पता बाद में चलेगा.

train4इस बीच ड्राइवर का एक महत्वपूर्ण बयान सामने आया है. उसका कहना है कि झांसी में उसने गड़बड़ी की शिकायत की थी, मगर उसे अधिकारियों ने कहा कि किसी तरह कानपुर पहुंच जाओ. मित्र बताते हैं कि इसका मतलब इतना ही कि झांसी डिवीजन वाले बला को अपने सिर से उतार कर दूसरे डिवीजन के सिर पर डालने की कोशिश कर रहे थे. रेलवे में यह बहुत पुरानी और विचित्र बीमारी है. अधिकारी-कर्मचारी सिर्फ अपने डिवीजन के बारे में सोचते हैं. कई बार कुछ ट्रेनों के लगातार लेट रहने की एक वजह यह भी होती है. जब तक रेलकर्मी इस भावना से उबरेंगे नहीं दिक्कतें आती रहेंगी.

इस हादसे की एक संभावित वजह तो यह निश्चित तौर पर है कि ट्रेन ऐसी पटरी पर फुल स्पीड से गुजर रही थी जिस पर काम चल रहा था. मगर एक और संभावित वजह मेरे मित्र बताते हैं कि कई दफा किसी बोगी का एकआध चक्का हार्ड हो जाता है, वह चलना बंद कर देता है. मगर इसके लिए कई स्टेशनों पर लोग होते हैं जो आउट स्टेशन के पास बैठ कर चक्कों को देखते हैं कि कहीं कोई चक्का चलना बंद तो नहीं हो गया है. हालांकि वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में अमूमन एक बोगी पलटती है और मोड़ पर हो तो भी चार-पांच बोगियां पलटेंगी. यहां तो 12-13 बोगियों के पलटने की बात कही जा रही है. यह भी कहा गया है कि उरई के पास बीस मिनट तक गाड़ी रोक कर जांच और मरम्मत का काम किया गया.

गड़बड़ी ट्रेन में थी या पटरियों में यह तो जांच का विषय है और संभवतः जांच में पता भी चल गया होगा. मगर यह सार्वजनिक किया जायेगा या नहीं यह कहना मुश्किल है. हां, आंतरिक तौर पर रेलवे को पता चल जायेगा. पूरी जांच की वीडियो कांफ्रेंसिंग भी हो रही होगी और उसके हिसाब से नयी नीतियां भी बनायी जायेंगी. मगर एक बात तो साफ है, वह यह कि रेलवे को और नयी निजाम को यह समझना होगा कि बदलाव के वक्त रफ्तार धीमी रखना सीखें, वरना ऐसे हादसे होते रहेंगे.

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पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। संप्रति- प्रभात खबर में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। आप इनसे 09771927097 पर संपर्क कर सकते हैं।