सच्चिदानंद जोशी

कुछ दिन पहले बचपन का एक दोस्त मिला। मेरे रूप को देखते ही बोला “अरे यार तुम तो एकदम बदल गए “। उम्र के साथ शरीर और बाल दोनों ही बिखर जाते हैे। बाल तो उसके भी कम हो गए थे, लेकिन मैं उससे ये बात कह नही पाया। उसी को धीरज न रहा बोल उठा ” तुम तो बिल्कुल अलग लगते हो दाढ़ी में “।

दाढ़ी रखे कुछ दिन हो गए हैं, इसलिए इस सवाल से दो दो हाथ करने के मौके कई बार आये। कई सारे उत्तर तैयार थे लेकिन उन्हें सुरक्षित रख लिया।
” क्यो अच्छी नही लग रही है क्या। कई लोगों ने तारीफ की है इस रूप की ” मैंने प्रतिप्रश्न किया।
“नहीं यार दाढ़ी अपन लोग कहाँ रखते हैं। एकदम ‘वो’ लग रहे हो। ”
“दाढ़ी तो शिवजी की भी थी , हमारे प्रधानमंत्री जी की भी है। इसमें क्या खराबी है ”
” उनकी दाढ़ी अलग है , तुम्हारी ‘वैसी ‘ लग रही है।
“अब यार ऐसी वैसी तो नहीं पता , बस रख ली । ”

दोस्त शायद इशारों में बात करके थक गया था सो उसने सीधे बात कह दी ” एकदम मियां भाई लग रहे हो। अब तो तुम्हें मौलाना जोशी कहना पड़ेगा। ” बचपन का दोस्त था और उसे मेरे साथ चाहे जैसा मजाक करने का जायज हक़ था। लेकिन वो अपनी बात कह चुका था और ये बता कर संतुष्ट महसूस कर रहा था कि दाढ़ी रखने की स्टाइल से मैं मौलाना जोशी सा दिखने लगा हूँ।

मुझे याद आ गया 1984 का साल। उन दिनों भी मैं दाढ़ी रखा करता था। ये वो काल था जब इश्क़ में मार खाये आशिकों में और नौकरी की तलाश में घूम रहे बेरोजगारों में दाढ़ी रखने का फैशन आम था। अपन दोनों ही समस्याओं से ग्रस्त थे, लिहाज़ा दाढ़ी भी बड़ी थी। 1984 के सिख दंगे हुए और घर वालों ने तथा मित्रों ने जबरन मेरी दाढ़ी कटवा दी। उस दौरान कई सिख बंधुओं को अपनी दाढ़ी और बाल काट देने पड़े थे। उम्र कम थी और बेरोजगार भी था तो सोचा कहीं दाढ़ी ही न रोड़ा बन जाये रोजगार का।

आज एक बार फिर मेरी दाढ़ी मेरी पहचान के लिए प्रश्न चिन्ह बन गयी थी। वो दोस्त मेरे गेटउप को अच्छा या बुरा कहता तो ठीक था, लेकिन दाढ़ी के साथ उसने मुझे धर्म की पहचान का अहसास दिला दिया था। मैं सोच में था कि उसे क्या जवाब दूँ और ये भी पसोपेश भी कि क्या उसे मेरा कोई भी जवाब वाजिब लगेगा। क्योंकि उसने अपनी आंखों पर एक पूर्वाग्रही चश्मा लगा रखा है।

फिर देखी फ़िल्म ” मुल्क” और लगा कि एक मेरा दोस्त ही नही है, मुल्क में और लोग भी है जो दाढ़ी से व्यक्ति का धर्म और नीयत तय कर रहे हैं।” मुल्क “देखने के बाद सोचने पर मजबूर हो गया कि कैसे हम धीरे-धीरे अपने पूर्वाग्रहों के गुलाम होते जा रहे हैं और कैसे हमने किसी व्यक्ति या समुदाय के बारे में अपनी राय बना ली है।

पहले तो हमारा मुल्क भारत ऐसा नहीं था। हम सब मिलकर साथ रहते थे। साथ ही मिल बैठकर समस्याओं का, तकलीफों का सामना करते थे और उसमें से रास्ता निकलते थे। क्यों और कब ऐसा हुआ कि हमारा समाज खेमों में बंटता जा रहा है और हम दाढ़ी पर, पाजामे पर, खाने-पीने पर, रीति रिवाजों पर अपने पूर्वाग्रहों के चश्मे चढ़ाते जा रहे हैं। त्यौहार अब भारतीय त्यौहार न होकर हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई या सिख त्यौहार हो गये हैं। अपराधी अब सिर्फ अपराधी न रहकर हिन्दू , मुस्लिम या ईसाई अपराधी हो गये हैं। पीड़ित भी अब संप्रदायों से जाने जा रहे हैं।

“मुल्क” आपको इन सवालों से सिर्फ रूबरू ही नहीं कराती बल्कि झकझोर कर पूछती है कि कब तक हम इन सवालों से भारतीय समाज को नफरत की आग में झोंकते रहेंगे। “मुल्क” ऐसे और कई सवाल आपसे पूछती है , जिनके जवाब हम जानते तो हैं पर मानते नहीं। बल्कि मानना नहीं चाहते।

कुछ दिनों पहले एक वाक्य समाज में तैर गया था” हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान होता है “। काफी लोगों ने इसका प्रयोग अपनी तरह से किया और पूर्वाग्रह पक्के किये। फिर शब्द आया “हिंदू आतंकवाद ” और पूर्वाग्रह की जड़ें औऱ मजबूत हो गयीं। भूल गए हम कि आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद होता है वो किसी मजहब या धर्म का नहीं होता। आतंकवाद पूरे समाज की तबाही करता है, भारत की तबाही करता है। बच्चे फिर वो चाहे हिन्दू के हों या मुसलमान के, अगर गलत काम करें तो उन्हें सही राह पर लाना और नसीहत देना समाज का काम है , समाज के बुजुर्गों का काम है।

भारत हमेशा विचारों का देश रहा है और हमने हमेशा संवाद से बड़ी से बड़ी कठिनाई का हल निकाला है। हमने विश्व को संवाद सिखाया है और विश्व को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाया है। लेकिन आज हम खुद ही अपने आपको कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और अपने बनाये पूर्वाग्रहों के गुलाम होते जा रहे हैं। जबसे ” मुल्क” देखी है , तबसे लग रहा है कि हमें एक बार फिर से नए सिरे से सोचने की शुरुआत करनी होगी, तब जाकर भारत अपनी पहचान के मुताबिक सही राह पर चल पायेगा।

“मुल्क” सिर्फ हिन्दू मुसलमान के अंतर्संबंधों की ही पड़ताल नहीं करती बल्कि सिनेमा से जुड़े उस पूर्वाग्रह को भी तोड़ती है कि सिनेमा उद्देश्यपूर्ण नहीं होता,  नहीं हो सकता। अगर आपने नहीं देखी है तो एक बार जरूर देखें और सोचें कि किस तरह हम अपने देश को इस तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्ति दिला सकते हैं। कैसे हम फिर से एक हँसता मुस्कुराता शान्त भारत बना सकते हैं।


सच्चिदानंद जोशी। शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय और कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की एक पीढ़ी तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। इन दिनों इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के मेंबर सेक्रेटरी के तौर पर सक्रिय।

संबंधित समाचार