राकेश कायस्थ

जिस दौर में चोर को चाणक्य और तड़ीपार को तारनहार का समानार्थी मान लिया गया है। उसी दौर में गुजरात की तीन राज्य सभा सीटों के लिए वोटिंग हुई। इस पूरे प्रसंग पर किताब लिखी जा सकती है, या फिल्म बनाई जा सकती है। लेकिन यह प्रसंग ना तो पहला था और ना ही आखिरी होगा। इसलिए वक्त बर्बाद करना फिजूल है। फिर भी कुछ बातें जो निकलकर सामने आईं।

1. बीजेपी के रणनीतिकारों ने अपना काम बखूबी किया। खेल उन नासमझ विधायकों की वजह से बिगड़ा जिन्होंने कांग्रेस में इतने समय रहने के बाद भी नहीं सीखा की चार सौ बीसी किस तरह की जाती है। बैलेट लहराकर बताना कि देखो हमने सौदे मुताबिक वोट डाल दिया है, यह बात समझ में नहीं आई। क्या ऐसी कोई शर्त रखी गई थी कि पूरा भुगतान तभी होगा जब बैलेट लहराकर दुनिया को बताया जाएगा? मुझे यकीन है कि चाल, चरित्र और चेहरे वाली पार्टी ने ऐसी कोई शर्त नहीं रखी होगी। लेकिन अगली बार ऐसी स्थिति आये तो वोटिंग से पहले बागी विधायकों की कार्यशाला ज़रूर करवाई जानी चाहिए।

2. इस प्रकरण ने बिहार विधानसभा का चुनाव याद दिला दिया। चुनाव में बीजेपी के पिटने के बाद मैंने कहा था किसी आईएएस टॉपर को कभी यह साबित करने की कोशिश नहीं नहीं करनी चाहिए कि वह जब चाहे बैंक क्लर्क भी बन सकता है। नाकाम हुए तो बहुत बेइज्जती होगी। गुजरात की तीसरी सीट की कहानी भी कुछ ऐसी रही। दो सीटों पर बीजेपी का हक था। लेकिन तीसरी हड़पने के लिए कुछ ऐसी जोर जुगत भिड़ाई गई कि देखकर लगा कि देश का सबसे बड़ा बिल्डर किसी गरीब सब्जी-भाजीवाले की टपरी पर जबरन कब्जा जमाना चाहता है। लेकिन सब्जी वाले के हाथों पिटकर वापस लौटना पड़ा।

3. कांग्रेस मुक्त भारत का नारा कितना थका हुआ है, ये भी फिर से याद आया। जिसकी राह पर चल रहे हो, उसी से मुक्ति? मिल बांटकर खा लो भइया क्या दिक्कत है, या फिर ईमानदारी से मान लो कि कांग्रेस ब्रांड से मुक्ति चाहिए ताकि कांग्रेस शैली की राजनीति पर हमारा एकछत्र कब्जा हो।

फ़ाइल चित्र

4. याद दिलाना बेकार है कि ये वही पार्टी है, जिसके नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सिर्फ एक डायरी में नाम आने की वजह से संसद से त्यागपत्र दिया था। डायरी में नाम अब भी है, खैर जाने दीजिये। ये यही वही पार्टी है, जिसके शीर्षस्थ नेता अटल बिहारी वाजपेयी यूपी में राज्यपाल रोमेश भंडारी की जोड़-तोड़ से सरकार बनवाने की कोशिशों के खिलाफ अनशन पर बैठ गये थे। ज्यादा वक्त नहीं गुजरा। दोनों नेता अभी जीवित हैं और आडवाणी तो कुछ-कुछ कहते भी रहते हैं, थोड़ा सुन लेते तो अच्छा होता। लेकिन किसी को कुछ सुनाई नहीं देगा क्योंकि वह दौर नेताओं का था, यह दौर चक्रवर्ती सम्राट का है। वह दौर बीजेपी समर्थकों का था, यह दौर भक्तों का है।

5. इस प्रकरण के बाद फेसबुक और व्हाट्स एप पर बांटने के लिए कांग्रेस के कारनामों की लिस्ट बन रही होगी। लोकतंत्र में कारनामों पर सबका बराबर हक है। हे भक्तों उन्हे क्षमा कर दो, जो ये पूछते हैं कि पार्टी विद डिफरेंस कांग्रेस से बड़ी लकीर खींचने पर क्यों तुली है। मैं चाहता हूं कि ये सरकार कम से कम 10 साल चले ताकि ब्रांड कांग्रेस खत्म हो और चार सौ बीसी की सारी मौलिक कहानियों पर सिर्फ और सिर्फ ब्रांड बीजेपी का एकाधिकार हो।


राकेश कायस्थ।  झारखंड की राजधानी रांची के मूल निवासी। दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय। खेल पत्रकारिता पर गहरी पैठ। टीवी टुडे,  बीएजी, न्यूज़ 24 समेत देश के कई मीडिया संस्थानों में काम करते हुए आपने अपनी अलग पहचान बनाई। इन दिनों स्टार स्पोर्ट्स से जुड़े हैं। ‘कोस-कोस शब्दकोश’ नाम से आपकी किताब भी चर्चा में रही।

 

संबंधित समाचार