धीरेंद्र पुंडीर

चुनाव की टेबल पर तमाम दल लेटे हुए हैं, जनता ऑपरेशन में जुटी हुई है। कैची हाथ में और जनता जहां तहां नेताओं के जिस्म से गंदगी बाहर करने में जुट गई है। राजनेताओं के बयान एनेस्थिया में आए हुए मरीज की भांति हो गएं है जो कुछ भी आंय-बांय-सांय बोलता रहता है कई बार सच कई बार सनक में। पूरा चुनाव द्रुत चाल में आ चुका है और बस कुछ ही देर में राग खत्म होने वाला है। 11 मार्च को सर्जरी के बाद टेबिल से विजेता अपने होशो-हवास के साथ बाहर आएगा। बहुमत किसी के पक्ष में आए लेकिन इस वक्त मैं सिर्फ मुलायम सिंह की दाद देने को मजबूर हो रहा हूं। पूरे चुनाव में मुलायम सिंह कही नहीं दिखाए दिए सिर्फ शिवपाल के लिए सभा करने या फिर वोट करने के अलावा। भाई शिवपाल वही जो अब राजनीति की बिसात पर कभी थे वजीर की हैसियत में आ चुके हैं, लेकिन अपना मानना है कि मुलायम सिंह भले ही इलेक्शन में नहीं हैं लेकिन यूपी का इलेक्शन उनके मुताबिक ही चल रहा है। बेटा अखिलेश इस वक्त सीएम है तो बुरे से बुरे हाल में भी नेता प्रतिपक्ष बना रहेगा। पूरी बिसात इस तरह से बिछी है कि लोग सिर्फ घर की लड़ाई में ही उलझ कर रहे गए है जबकि पांच चरणों के चुनाव के बाद अब कुछ लोग समझने लगे है कि वो सिर्फ एक पहलू भर था पूरी कहानी मुलायम सिंह ने कहीं और छिपा कर रखी थी।
यूं तो यूपी में चुनाव धर्म और जातियों के गठबंधन से ज्यादा कुछ नहीं होते है। जातीय गोलबंदी में मुस्लिम वोटों का समीकरण जोड़कर राजनीति अपने नए-नए आवरण में जनता के सामने आती रहती है और लोग नंगे होते हुए बेशर्मों की तरह गर्मी बहुत है गर्मी बहुत के अंदाज में कहते है कि विकास किया है विकास करेंगे टाईप मुहावरों में बात करती रहती है।
बात उलझाता नहीं है। सीधे मुद्दे पर आता हूं। इस पूरे चुनाव में पांच साल पूरे कर रही समाजवादी सरकार ( समाजवाद सिर्फ नाम है यदि आप समाजवाद के अर्थ पर जाना चाहते हैं तो अपनी शक्ल शीशेे मे देख कर मां लक्ष्मी के वाहन को याद करे) के माथे काफी किस्से चस्पा हुए है। खास बता ये कि समाजवादी सरकार ने अपने पांच साल की सत्ता को बड़ी सफाई से हम बौंनों के सहारे विपक्ष में बदल दिया। यानि पूर्ण वहुमत की सरकार विपक्ष बन गई और जो महज 47 विधायकों के साथ विपक्ष में भी दोयम दर्जे की थी वो बीजेपी पक्ष बन गई। जगह जगह उसके नेता तो छोडि़ए प्रधानमंत्री भी अपनी केन्द्र सरकार का हिसाब देते हुए घूम रहे हैं।  एक मुख्यमंत्री अपने पांच साल पूरे कर भीड़ से हाथ उठवा कर पूछता है कि अच्छे दिन आए क्या फिर अगले ही पल ऐसे एक्सप्रेस वे की कहानी सुनाई जाती है जो सिर्फ मुआवजा हासिल करने और टेंडर में लाभ कमाने के लिए तैयार किया गया है और बिना पूरा हुए उसका उद्घाटन भी हो गया।

चुनाव की घोषणा से 6 महीने पहले तक मैं यूपी में किसी भी आम आदमी से बात करता था या फिर यूपी के नौकरशाहों से बात करता था तो उनका जवाब होता था कि इस बार सत्ता में बीएसपी की वापसी होगी। लोग इतने मुत्तमईन होते थे कि लगता था बीएसपी को आने से कोई शायद ही रोक सकता है। और यही से मुलायम सिंह का राजनैतिक कौशल अपनी रणनीति बनाना शुरू करता है। दरअसल हम बौंनों की आदत होती है कि हम आगे देखते है पीछे मिटाते हुए चलते है। 2017 में बहुमत किसे मिलेगा इस पर बहुत बातें की गई बिना ये देखे हुए कि 2012 में जनता ने क्यों ये सेहरा मुलायम सिंह के सिर बांध दिया था और यही वो पेंच है जिसको मुलायम सिंह जी ने सुलझा कर अखिलेश का भविष्य उज्जवल कर दिया ।
दरअसल मुलायम सिंह इस बात को अच्छे से जानते थे ( रामगोपाल नहीं जानते हों ये कोई मान नहीं सकता ) कि 2012 में पूरी तरह से टूटी-फूटी बीजेपी जिसका नेतृत्व जमीन से ज्यादा नेज की राजनीति में निष्णात राजनाथ सिंह ने किया था कही किसी मुकाबले में नहीं थी और बीएसपी से नाराज ऊंची जातियों का वोट सत्तारूढ़ बीएसपी को सत्ता से बेदखन करने के लिए एक मुश्त समाजवादी पार्टी के खेमें में चला गया और नतीजा ये हुआ कि जिन जिलों में सपा का कभी कोई एक उम्मीदवार भी नहीं जीता था वहां सपा ही सपा छा गई। लेकिन इस बार मुलामय सिंह की चिंता हारे हुए अखिलेश को पार्टी किस तरह से स्वीकार करेगी इस को लेकर थी। लिहाजा पहले भविष्य के उम्मीदवारों को निबटाया गया। इस तरह से कि वो आखिर तक सिर्फ हाथ मल कर खुद को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर सके। पहले दिन से लेकर आखिरी दिन तक मुलायम सिंह ने ऐसा कोई भी काम नहीं किया जिससे अखिलेश को कोई दिक्कत पेश आए और शिवपाल सिंह को कोई फायदा हो जाए।
ऐसे में पहली चाल के बाद आखिरी बाजी थी विपक्षी नेता के तौर पर बने रहने की। समाजवादी पार्टी की जान बीजेपी नाम के तोते में है। एक बीजेपी सत्ता में है तो समाजवादी पार्टी को मुख्य विपक्षी पार्टी होने से और विकल्प के तौर पर उभरने से सिर्फ एक ही पार्टी रोक सकती है और वो है बीएसपी। लिहाजा मुलायम सिंह जी ने तय किया कि इस चुनाव में इस तरह का चक्रव्यूह तैयार किया जाए जिसमें शत्रु के तौर पर दिखे तो बीजेपी लेकिन निबट जाए बसपा। लिहाजा मुसलमान मुसलमान का शोर मचाना शुरू कर दिया गया। इस बात को मुलायम सिंह अच्छे से जानते हैं कि सिर्फ मुसलमान वोट और यादव वोटों की जुगलबंदी उनको कुछ दर्जन सीट जरूर दिला सकती है सत्ता नहीं और इस शोर को इतना जोर से किया गया कि बीएसपी चौक उठी। 2007 में सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे सत्ता में आए बसपा ने मुलायम सिंह के मुस्लिम प्रेम ( जो एक रणनीति के तौर पर ज्यादा उछाला गया) की काट में इतने जोर से मुस्लिम मुस्लिम चिल्लाना शुरू कर दिया कि उनके अपने कट्टर समर्थक चौंक उठे।

उधर मुस्लिम लोगों का पक्ष हासिल करने के लिए मुलायम सिंह की रणनीति के मुताबिक अखिलेश और आजम की जोड़ी ने बिगुल बजाया तो दूसरी ओर मुलायम सिंह ने खुद कई मंचों पर वो वाक्य कहा जो गोलियां चलवाने के बाद से दशकों से इस तरह से नहीं कहा गया था कि मस्जिद बचाने के लिए हमने गोलियां चलवाईं। बसपा इसकी काट में जुटी थी और 100 के करीब मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट बांट दिए हर सभा में चिंतन मुस्लिम वोटर के इर्द-गिर्द घूमने लगा। मुस्लिम मुलायम सिंह के पुराने कामों को याद कर बंटने लगा। बौंनों की काफी सेवा भी की गई और इसमें पिछली सरकार के कामगार नौकरशाह का अनुभव भी काफी कारगर रहा लिहाजा अखिलेश यादव एक विकास पुरूष के तौर पर उभर आए।

दूसरी रणनीति रही कि बीएसपी न जीते भले ही बीजेपी आगे निकल जाए क्योंकि बीजेपी की जीत की स्थिति में आगे का रास्ता बहुत आसान होगा। किसी भी कदम को मुस्लिम हितों के खिलाफ बता कर आंदोलन होना और विकल्प के तौर पर उभरना भी आसान होगा और लगातार हमले झेलती हुई बीएसपी का भविष्य भी कमजोर किया जा सकता है अभी तक कि लड़ाई से लगता है बंटवारें ने इस काम को आसान कर दिया है। विपक्षी गठबंधन के नाम पर टूटी-फूटी और राजघराने के कुछ नामों के सहारे गुमनामी में  जाती हुई कांग्रेस पर दया कर कुछ सींटे देकर मुस्लिम मतों का विभाजन और आसान कर दिया गया। हो सकता है कि नतीजे उलट-फेर के साथ आ जाएं लेकिन अभी तो लग रहा है कि मुलायम सिंह जी ने अपने राजनीतिक कौशल का इंतजाम कर एक हारी हुई बाजी को जीते हुए अवसर में तब्दील कर दिया।


dhirendra pundhirधीरेंद्र पुंडीर। दिल से कवि, पेशे से पत्रकार। टीवी की पत्रकारिता के बीच अख़बारी पत्रकारिता का संयम और धीरज ही धीरेंद्र पुंढीर की अपनी विशिष्ट पहचान है। 

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