वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के फेसबुक वॉल से
रमजान का महीना खत्म होते ही एक बार फिर सरकार ने कश्मीर घाटी में ऑपरेशन ऑल आउट का फैसला किया है । हालांकि रमजान के महीने में हिंदुस्तान के एक तरफा संघर्ष विराम की देश के साथ ही कश्मीर को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी । ईद से ठीक पहले अमन के दुश्मनों ने शांति के पैरोकार पत्रकार शुजात बुखारी की निर्मम हत्या कर दी। रमजान के जिस पाक महीने दुहाई देकर सीएम महबूबा मुफ्ती ने संघर्ष विराम कराया वहीं उनपर भारी पड़ गया । पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या ना सिर्फ कश्मीर के लिए बड़ी क्षति रही बल्कि पत्रकार जगत के लिए बड़ा नुकसान दायी रही । शुजात की यादों का साझा कर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने उन्हें श्रद्धांजलि दी ।

देश के जाने-माने पत्रकार और जम्मू कश्मीर के लोकप्रिय़ अखबार ‘राइजिंग कश्मीर’ के प्रधान संपादक शुजात बुखारी की नृशंस हत्या की खबर सुनकर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। जब मुझे ये खौफनाक सूचना मिली, तो कुछ देर के लिए लगा मानो पता नहीं मैं किस अंधेरी अतल गहराई में गिरता जा रहा हूं, जहां सिर्फ शून्यता ही शून्यता है। खबर पर यकीन करने में कुछ वक्त लगा। शुजात मेरे लिए सिर्फ एक पत्रकार-संपादक नहीं, वह एक प्यारा दोस्त भी था। जहां तक याद आ रहा है, पहली बार हम लोग सन् 1997 या 98 के अगस्त-सितम्बर महीने में श्रीनगर में मिले थे। तब शुजात कश्मीर टाइम्स के श्रीनगर ब्यूरो में संवाददाता थे। बाद में वह ‘द हिन्दू’ के साथ जुड़े और कुछ बर्ष बाद फिर अपना अखबार ‘राइजिंग कश्मीर’ लेकर आये। बहुत कम समय में ही उनका अखबार सरहदी सूबे का प्रमुख अखबार बन गया। शुजात प्रतिभाशाली संपादक-पत्रकार के अलावा बेहद जहीन इंसान था।

वह न जाने कितने लोगों का दोस्त था। और हर दोस्त उसे अजीज समझता था। सचमुच हरदिल-अजीज! पता नहीं, किसने और क्यों उससे दुश्मनी पाली थी। शुजात के इस तरह जाने के बाद अब मैं कह सकता हूं कि जम्मू कश्मीर में आज अनेक जगहें फिर से बेहद खौफनाक हो गई हैं। शायद, मिलिटेंसी के सबसे काले दिनों से भी ज्यादा। पर वहां पत्रकारों पर लंबे समय से कभी जानलेवा हमले नहीं हुए थे। पर गुरुवार की मनसूस शाम शुजात बुखारी जैसी मशहूर शख्सियत को खत्म कर दिया गया। मिलिटेंसी के शुरुआती दिनों में (सन् 1993 में) श्रीनगर स्थित बीबीसी के दफ्तर में लेटर-बम के विस्फोट के जरिये मुश्ताक अहमद नामक एक प्रतिभाशाली फोटो पत्रकार की जान ली गई थी। वरिष्ठ पत्रकार युसूफ जमील बुरी तरह घायल हो गये थे। फिर सन् 2003 में पत्रकार परवेज मो. सुल्तान की श्रीनगर की प्रेस एन्क्लेव में ही हत्या हुई थी।
इस बार शुजात को मार डाला गया, उसी प्रेस एन्क्लेव स्थित उसकी आफिस के बिल्कुल पास। पर मैं समझता हूं, घाटी में शुजात या उनकी तरह के लोगों के विचार को कोई खत्म नहीं कर सकेगा। कश्मीर में अच्छी पत्रकारिता और सरहदी सूबे के जटिल मसलों को सुलझाने की जब भी बात होगी, शुजात का नाम हमेशा लोगों की जुबां पर आयेगा। शुजात हम तुम्हें कभी नहीं भूल सकेंगे, दिल्ली हो या श्रीनगर, चप्पे-चप्पे में तुम्हारी यादें हमारे साथ रहेंगी।
श्रद्धांजलि दोस्त!


उर्मिलेश/ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक । पत्रकारिता में करीब तीन दशक से ज्यादा का अनुभव। ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘हिन्दुस्तान’ में लंबे समय तक जुड़े रहे। राज्यसभा टीवी के कार्यकारी संपादक रह चुके हैं। दिन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता करने में मशगुल।