ब्रह्मानंद ठाकुर

फोटो सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

आई का बतकही बिलकुले एक नया लुक में  था। असल में हुआ यह कि साउनीघड़ी पवनिए के दिन 15 अगस्त वाला परब भी पड़ गया। भकुआइए नहीं ,अरे ,ओहे पनरह अगस्त जेकरा बुद्धन बाबू , मुखिया जी , गाट ( गार्ड ) साहेब और  सुमेर जी लोग स्वतंत्रता दिवस कहते हैं। और, जिसके बारे मे अक्सर घोंचू भाई कहते हैं कि  अरे , हम त उस दिन खूब सूतते हैं ,चाहे बदरकट्टू रउदा रहे चाहे मेघ। लेकिन सांझ मे बड़ा रोचक तरीका से आजादी  आंदोलन के बारे में बताना नहीं भूलते।

घोंचू उवाच-8

वे कहते हैं  कई  सालों तक लोग अंग्रेजों से लड़ते रहे , जेल गये और हजारों वीर  देशभक्त सपूतों की शहादत के  बाद अई देश से अंगरेज का राज खतम हुआ।  लेकिन अबहियो पूरी आजादी कहां मिली है। आजादी का माने खाली वोटे से सरकार बनाना त नहीं है। आजादी का माने हय सबको शिक्षा, सबको काम , सबको इलाज । देश के सब आदमी को बिना जात – धरम आ लिंग का भेद किए,  विकास का समान अवसर उपलब्ध होना।  ई सब त अभी बांकिए हय । त इस बार पनरह अगस्त आ साउनीघड़ी पवनी एक्के दिन पड़ गया सो गांव से शहर जा क पढे वला कउलेजिया लड़िका  बंटी और प्रिंसवा भी घरे आयल था।

फोटो सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

ओकरा बिहान भेले पूर्व प्रधानमंत्री अटल  बिहारी बाजपेयी जी की मृत्यु  94  बरीस की उमिर में हो गई, से हुनका सोग में  सतरहो को  स्कूल – कउलेज बंदे हो गया। अई लेके बंटी और प्रिंसवा को तीन दिन की छुट्टी हो गयी। ऊ दून्नू  सांझ होइते मनकचोटन भाई के ऊहे तिनटंगा चउकी पर अप्पन आसन जमा के बड़का मोबाईल पर कुछ टिप-टाप कर रहा था कि उधर से घोंचू भाई ललका गमछा से अप्पन चेहरे पर चुहचुहा रहा पसीना पोंछते नमूदार हो गये। उनके पैर की धमक  सुन बंटी  का ध्यान घोंचू भाई की ओर ज्योंही गया ,  उसने तुरत  तिनटंगा चउकी  से उठ कर दोनों हाथ जोड़ते हुए  कहा -‘ गोर लगइछियो कक्का। ‘  उसके इतना कहते ही प्रिंसवा भी खड़ा होकर दहिना हाथ करेजा पर रख  थोड़ा नीचे झुका।

घोंचू भाई दोनों लड़िकवन को ”  खुश रहो बउआ ‘  कहकर आशीर्वाद देते हुए पूछे – ‘ कहो ,क्या हाल है तुम्हारे पढाई – लिखाई का ?  पास कर गये बीए ?  ‘ अभी कहां कक्का , चार साल हो गये एग्जामे नहींं ले रही है यूनिवर्सिटी , बस इसी इन्तजार मे हूं कि यह गेट पार करूं तो आगे की सोंचूं। ‘ बंटी ने यह कहते हुए मनुहार  किया ‘आइए , बैठिए न कक्का ,बहुत दिन हो गये आप से बतियाए हुए। ‘  घोंचू भाई उसी तिनटंगा चौकी पर बइठ गये ।  मैं भी हाली – हाली जनेरा का कुट्टी कुटकट्टा मशीन मे काटने के बाद कल पर हाथ – गोर धोया और गमछा से हाथ – मुह पोंछते हुए बंसखटिया निकाल लाया। मनकचोटन भाई धनरोपनी की मजदूरी फरिया कर मजदूर सब को बांकी मजदूरी दे कर हमरा पंजरा मे आकर बैठ गये। परसन कक्का भी हमलोगों को देख फंरा मे से खइनी का डिब्बा निकाल बाएं हाथ मे थोड़ा खइनी रखे और उसमे चूना मिला कर चुनाते हुए बतकही मे शामिल हो गये।

फोटो सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

घोंचू भाई आदतन शुरू हो गयेः उन्होने बंटी से पूछ दिया ,  तुम तो स्कूल मे बड़ा तेज विद्यार्थी था।  ‘बचपन मे तुम मुझसे बराबर सवाल करते रहे। आज मैं तुम से एक सवाल करता हूं। बताओ  मानव जाति का पहला वैज्ञानिक आविष्कार क्या था ? ‘  बंटी जब तक बोलता , उससे पहले प्रिंस बोल उठा -आग ‘। ‘ नहीं ‘ घोंचू भाई ने असहमति जताते हुए कहा ‘ देखो , धरती पर होमो – सेपियंस प्रजाति से पहले ही आग पर काबू पाया जा चुका था। इसे  मानव  पूर्वजों ने प्राप्त किया था।’  यहीं से तो आग मे कच्चे मांस को भून कर खाने की शुरुआत हुई थी जिससे हमारे आदि मानव के मुख की आकृति में बदलाव आया और  स्पष्ट अभिव्यक्ति का विकास हुआ।’

बंटी ने कहा  ‘ नहीं कक्का , आग नहीं , पहिया मानव जाति का पहला आविष्कार माना जाता है।‘  घोंचू भाई ने फिर इन्कार मे सिर हिलाते हुए कहा -‘ नहीं , यह भी नही । यही तो मुश्किल हय आज की पढाई लिखाई की कि हमारी नई पीढी को जो इतिहास पढाया जा रहा है , वह तथ्यों से परे है। इससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास नहीं हो पाता है और नई पीढी धार्मिक अंधविश्वास और अवैज्ञानिक चिंतन के जाल मे फंसकर रह जाती है। अगर वर्तमान समस्याओं से निजात पाना है तो मानवजाति के  ऐतिहासिक विकासक्रम को वैज्ञानिक तरीके से समझना होगा। ‘
फोटो सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

अब तक घोंचू भाई बंटी और प्रिंस को लक्ष्य कर ये बातें कह रहे थे। उनके तर्क की गम्भीरता को समझते हुए मैं , परसनक्का और मनकचोटन भाई उनके और करीब आ गये। घोंचू भाई कहने लगे  ‘ देखो , शारीरिक रूप से आधुनिक मानव लगभग 2 लाख ,साल पहले विकसित हुआ और व्यावहारिक रूप से ( स्पष्ट बोलने और औजार बनाने मे सक्षम ) आधुनिक मानव  आज से 40 हजार साल पहले हिम युग मे विकसित हुआ। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। तब से लगभग 10 हजार साल पहले कृषि के आगमन से पहले तक इसके जीवन निर्वाह का साधन शिकार करना था। तब जहां- जहां शिकार  मिलने की सम्भावना होती थी , वहां-वहां खानाबदोश की तरह घूमता रहता था। वे लोग जिस जानवर का शिकार करते , उसे आपस में मिल- बांंट कर खाते थे। दूसरे दिन के लिए उसे इसलिए बचाकर नहीं रखा जाता था क्योंकि वह सड़ जाता था।

सब बराबर थे। कोई अमीर -गरीब नहीं था। तब न कोई राजा था न प्रजा। किसी के पास निजी सम्पत्ति भी नहीं थी।  कोई स्थाई निवास भी नहीं था। फिर इनकी जनसंख्या बढी। जंगलों मे उपलब्ध संसाधन जब इनके जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त नहीं रहे, तब कृषि का आविष्कार हुआ। मानवजाति का यही पहला आविष्कार था।  घोंचू भाई की यह बात सुनकर मुझसे रहा नहीं गया सो मैं उनसे पूछ ही बैठा ‘ अच्छा घोंचू भाई , कृषि का आविष्कार आखिर किया किसने ?’  घोंचू भाई ने अपना पहलू बदला , मुझसे मुखातिब हुए और कहने लगे –  ‘देखो ,  ठीक-ठीक तो इस बात का पता नहीं है लेकिन जब उस समय के समाज में भोजन की कमी हुई और लोगों ने देखा कि उनके द्वारा खाए गये फलों के जो बीज या गुठली जमीन पर फेंक दिए गये थे तो कुछ समय बाद उसी बीज से पौधे जन्मे, फिर उससे उसी तरह के फल मिले जो उसने कुछ साल पहले खाए थे।
फिर दूसरे तरह के पौधों से भी दाने प्राप्त हुए जिसका उपयोग भूख मिटाने के लिए तब लोग करने लगे। फिर जंगलों, खुले घास के मैदान को साफ कर खेत बनाए गये। पत्थर के औजार से खेती शुरू हुई। लोगों ने समझा कि जब मिट्टी में बीज डाल दिए जाते हैं तो कुछ समय बाद उससे पौधा निकलता है। फिर कुछ समय बाद उससे उसी तरह का फल या बीज निकलता है ,जैसा मिट्टी मे डाला गया था।  यह सब उतना आसान नहीं था जितना अभी लग रहा है। करीब 20 हजार  साल पहले जो  खेती की शुरुआत हुई उससे उस समय के समाज मे बड़ा बदलाव हुआ। बीज बोने से लेकर फसल तैयार होने तक लोगों को उस क्षेत्र मे रहना पड़ता था।  लोगों ने वहां स्थाई रूप से घर बना कर रहना शुरू किया।
मानव जाति ने घुमंतु जीवन से निकल कर  स्थाई जीवन की ओर कदम बढाया। इसे नवपाषाण युग का नाम इसलिए दिया गया कि तब लोग पत्थर के औजार से खेती  करते थे। इसी के बाद खेती से प्राप्त अनाज को भविष्य के लिए जमा करने की प्रवृति पैदा हुई। चूंकि  शुरुआती दिनों मे पर्याप्त उपज नहीं होती थी इसलिए भोजन की कमी हो जाती थी और लोग भोजन की तलाश मे खेती छोड़ कर दूसरी जगह जा भी नहीं सकते थे। एक जगह स्थाई रूप से रहना उनकी जरूरत थी और मजबूरी भी। अपर्याप्त अनाज के  कारण पूरे कबीले के लोगों की जरूरत जब  पूरी नही हो पाती थी तो लोगों मे भोजन के लिए आपस मे झगड़ा भी होने लगा। औजार पत्थर के थे इसलिए खेती योग्य जमीन भी बढाई नहीं जा सकती थी। लिहाजा इस लड़ाई झगड़े मे जो पक्ष ताकतवर होता वह अपने हिस्से अधिक रख लेता। बस इसी कृषि के आविष्कार के बाद समाज मे वर्ग विभाजन भी हो गया। जो ताकतवर थे उसने जमीन पर कब्जा किया और कमजोर लोगों को उसकी दासता स्वीकार करनी पड़ी। पहिया का आविष्कार तो काफी बाद मे हुआ जब कृषि के आविष्कार के बाद थोक परिवहन की जरूरत पड़ी

घोंचू भाई मानव समाज के विकास का तार्किक विश्लेषण करिए रहे थे कि मनसुखबा अंदर से चाय ले आया और चाय की चुस्की के साथ आज की बतकही पर विराम लगाते हुए घोंचू भाई ने कहा कि सच्चाई वही नहीं है जो आजकल स्कूल कालेजों के पाठ्यपुस्तकों मे पढाई जा रही है। घोंचू भाई के ई रहस्योद्ग्घाटन पर मेरे मुंह से बरबस निकल ही गया -‘ घोंचू भाई गलत नहीं कहते हैं।’


ब्रह्मानंद ठाकुर। बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।

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