तस्वीर- आशीष सागर दीक्षित के फेसबुक वॉल से साभार। सेवाग्राम में प्रार्थना सभा।

ब्रह्मानंद ठाकुर

महात्मा गांधी की कल्पना का भारत स्वशासी ग्रामीण इकाइयों का था, गांधी और अराजकवाद के आलेख की कड़ी में अब तक आप  विभिन्न अराजकवादी चिंतकों के विचारों से रू-ब- रू हो चुके हैं। इनका मानना था कि राज्य-व्यवस्था स्वयं शोषण का औजार होती  है, इसलिए समाज को इससे मुक्ति दिलाना जरूरी है और यह भी कि वर्तमान औद्योगिक सभ्यता में मानवीय संवेदना मर जाती है, लोगों में पारस्परिक सहयोग की भावना खत्म हो  जाती है ।   ‘महात्मा गांधी और व्यावहारिक अराजकवाद’ पुस्तक में  समाजवादी चिंतक, सच्चिदानन्द सिन्हा का वह पूरा व्याख्यान है जो उन्होंने   2 अक्टुबर, 2011  को गांधी शांति प्रतिष्ठान में दिया था। पिछले साल एक मुलाकात के दौरान सच्चिदा बाबू से मुझे यह पुस्तिका प्राप्त हुई थी। पूरा देश इस साल महात्मा गांधी की 150  वीं जयंती बड़ी धूमधाम से मना रहा है।  ऐसे में   गांधी जी के व्यावहारीक अराजकवाद पर सच्चिदा बाबू का यह व्याख्यान काफी महत्वपूर्ण और उपयोगी है। यहां प्रस्तुत है उस व्याख्यान की 6 ठी और अंतिम कड़ी। 

 एक समय  मानव श्रम पर निर्भर   भारतीय उद्योग पश्चिमी देशों से आयातित कारखानो में उत्पादित औद्योगिक वस्तुओं की प्रतिस्पर्धा में मार खा गये थे।  सम्भवत: 22 वीं शदी आते- आते कोयला, तेल आदि इतने महंगे हो जाएंगे कि अक्षय उर्जा स्रोत सूर्य पर निर्भर  ‘फूड चेन’ , जिसमें प्रकाश संश्लेषण से वनस्पतियों और शैवाल से   लेकर संसार के सभी जीव -जंतु जीवन का आधार पाते है  और  इससे प्राप्त उर्जा से चलने वाले उद्योग-धंधे स्पर्धा में कोयला, तेल आदि पर निर्भर उद्योगों से आगे निकल जाएंगे। ज्ञातव्य है कि विशेष तरह के हस्त कौशल से निर्मित वस्तुएं आज भी कारखानों में निर्मित वस्तुओं से बेहतर होती हैं और प्रतिस्पर्धा में टिकी हुई हैं। हमारी पारम्परिक कृषि भी, जो मूलत: बैलों, मानवश्रम और जैविक खादों पर निर्भर है, खाद्यान्न उत्पादन सस्ते दर पर करती है और पश्चिमी देशों के  मशीनीकृत  कृषि के  खाद्यान्नों के मुकाबले खड़ी हैं, जबकि पश्चिमीदेशों की कृषि को भारी अनुदानपर टिकाए रखा जाता है।

तस्वीर- आशीष सागर दीक्षित के फेसबुक वॉल से साभार

आने वाले समय में जब धरती का गड़ा खजाना शेष हो जाएगा, प्राकृतिक आधार पर स्थित कृषि और घरेलु उद्योगों के इर्द-गिर्द  छोटी स्वायत्त ग्रामीण इकाइयां ही चल सकेगी, जैसी भारत में और संभवत:  दुनिया के कई हिस्सो में औद्योगिक क्रांति के पहले थी। यूरोप में भी इसके बावजूद कि वहां फ्युडल सिस्टम विकसित हो गया था, फ्युडल व्यवस्था के समानांतर ही रूस के ग्रामीण लोगों की ‘ मीर ‘  जैसी संस्थाएं अस्तित्व में थी, जो पारस्परिकता पर आधारित थी।

 महात्मा गांधी की कल्पना का भारत वैसे ही स्वशासी ग्रामीण इकाइयों का था। यह एक व्यावहारिक कल्पना थी, जो उभरते उर्जा संकट में प्रासंगिक बनती जाएगी। शताब्दी – दो शताब्दी बाद आज की यह विशाल नागरीय व्यवस्थाएं उर्जा और पर्यावरण के संकट से ध्वस्त हो जाएगी और आज की विशाल आवासीय और आवागमन की व्यवस्थाएं उर्जा संकट से मृत हो जाएंगी। ये चीन की दीवार और पिरामिड की तरह खंडहर बन नुमाइश की चीजें  बन जाएंगी। महात्मा गांधी राजकीय व्यवस्थाओं को नजरअंदाज किए बगैर उनसे संघर्ष के साथ-साथ कुछ वैसे प्रतिमान भी रचनात्मक कार्यों से स्थापित करना चाहते थे, जो नये समाज के निर्मान को दिशा दे । उनके समाज का सपना अराजकवादियों से मिलता-जुलता था, लेकिन वे अधिक व्यावहारिक थे और जहां संभव हुआ नये समाज के मॉडल के रूप में छोटे स्तर पर निर्माण भी करते चले।  आल इंडिया विलेज एसोसिएशन, जो कभी बिल्कुल अप्रासंगिक लगता था, आज के पर्यावरण संकल्प  के संदर्भ में नयी प्रासंगिकता ग्रहण करने लगा है। यह बात अलग है कि ऐसी संस्थाओं पर भी मौजूदा प्रबंधन के मानक हावी होने लगे हैं लेकिन यह सब तात्कालिक भटकाव है।

ब्रह्मानंद ठाकुर।बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के निवासी। पेशे से शिक्षक। मई 2012 के बाद से नौकरी की बंदिशें खत्म। फिलहाल समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा में जुटे हैं। मुजफ्फरपुर के पियर गांव में बदलाव पाठशाला का संचालन कर रहे हैं।