ब्रजेन्द्र नाथ सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

लगभग 15 सालों के अपने पत्रकारिता जीवन में मैंने सैकड़ों रैलियां कवर की है। मुझे पता है आज इन रैलियों में भीड़ कैसे जुटाई जाती है। कुछ का तो मैं खुद गवाह हूं। बहरहाल, ये राजनीति का वो दौर है जिसमें कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो स्वतः रैलियों में शामिल होते हैं। लेकिन वो जो 1990 का दौर था, गजब था। उस दौर में लोग खुद अपने पसंदीदा नेता को देखने-सुनने के लिए पहुंच जाते थे।

जहां तक मुझे याद है, साल 1996 की बात है। अटलजी को रांची के मोरहाबादी मैदान में एक चुनावी सभा को संबोधित करना था। मैं उन दिनों छात्र था। सुबह-सुबह अखबार पढ़ा तो पता चला कि अटलजी रांची आने वाले हैं। बस क्या था! सारा काम निपटाया और साइकिल उठाकर चल पड़ा अटलजी को सुनने। एक नागरिक के नाते ये मेरी पहली रैली थी। किसी तरह रांची कॉलेज हॉस्टल में साइकिल खड़ी की। भीड़ बहुत थी। बेपरवाह, रैली स्थल तक जा पहुंचा और एक मुफीद जगह ढूंढ ली। उन दिनों रैली स्थल पर कुर्सियां नहीं लगाई जाती थीं। पूरा भाषण सुनने के बाद ही वहां से निकला। ऐसा नहीं था कि भाजपा से कोई खास लगाव था या राजनीति में बहुत दिलचस्पी थी, इसलिए मैं रैली में गया। इसका मकसद अटलजी को देखने से कहीं ज्यादा उन्हें साक्षात सुनना था।

इस अनुभव के बाद अटलजी से मिलने का मौका पत्रकारिता में आने के बाद मिला। वह भी वर्ष 2006 में। तब, जब स्वास्थ्य कारणों से उनका राजनीतिक सफर अपने अवसान की ओर था। इत्तेफाक ही था वह। हम पांच-छह पत्रकारों को ये मौका अचानक नसीब हुआ। वे सोफा पर अपने चिरपरिचित सफेद धोती-कुर्ता में थे और सिर्फ नमस्ते का जवाब हाथ उठाकर दे रहे थे। किसी से कुछ भी बात नहीं। हम सबने चाय पी। इधर चाय खत्म और उधर मुलाकात का वक्त।

इसी साल जुलाई में एक बार फिर ऐसा समय आया कि लगा शायद उनके दर्शन हो जाएं, लेकिन संभव नहीं हो सका। दरअसल, पापाजी एम्स में भर्ती थे। लकवा (पैरालिसिस) के इलाज के लिए। अटलजी भी उसी लाल बिल्डिंग के पहले फ्लोर पर थे और पापाजी पांचवें। दिनभर में दर्जनों बार ग्राउंड फ्लोर से पांचवें फ्लोर पर आना-जाना होता था। हर बार इच्छा होती कि एक बार अटल जी के दर्शन हो जाएं, लेकिन चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच यह मुमकिन नहीं हो सका।

लगभग महीनेभर के इलाज के बाद पापाजी की हालत में कुछ सुधार हुआ। डॉक्टरों ने यह कहकर विदा किया कि ‘इन्हें पूरी तरह दुरुस्त होने में वक्त लगेगा। बच्चों की तरह इनकी सेवा करनी होगी। इसलिए घर ले जाइए और उनकी देखभाल करिए।’ तमाम आशंकाओं के बीच 26 जुलाई को जब हम सभी एम्स से पापाजी को लेकर घर आ रहे थे, तब यह आभास भी नहीं था कि अटलजी सिर्फ 20 दिनों के बाद ही विदा हो जाएंगे।

अटलजी के जाने के बाद उनसे जुड़ी यादें मन-मस्तिष्क में ताजा हो रही थीं। सोचा, क्यों न इन अनुभवों को साझा किया जाए और इसी बहाने पापाजी के स्वास्थ्य की स्थिति से भी सभी को अवगत करा दूं। इतना सब कुछ लिखने के बाद भी इसे उस वक्त (अटलजी के दिवंगत होने के दो दिन बाद तक) साझा करने की हिम्मत नहीं कर सका, क्योंकि पापाजी बस, सांस भर ले रहे थे। यह पोस्ट अब साझा कर रहा हूं। पिछले कुछ दिनों में पापाजी की तबीयत में सुधार आया है। फिजियोथेरेपी का फायदा दिख रहा है। हाथ-पैर उठा ले रहे हैं। लड़खड़ाती जुबान से बात करने की कोशिश भी कर रहे हैं। खुद अपने हाथ से खाना खाने लगे हैं। सुबह-शाम व्हीलचेयर पर घूम भी रहे हैं। वन्नू बाबू अपने दादाजी के साथ खूब मस्ती कर रहे हैं। दादा और पोते के बीच की अठखेलियां मम्मी को भी बहलाए रखती हैं तो कभी-कभी पापाजी की आंखों में आंसू भी ला देती हैं।

इन्हीं सब परिस्थितियों से कदमताल करते हुए जिंदगी आगे बढ़ रही है। इस उम्मीद में कि सुधार का क्रम यूं ही जारी रहेगा और पापाजी ठीक हो जाएंगे।


ब्रजेन्द्र नाथ सिंह। इंडो एशियन न्यूज सर्विस में वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की शिक्षा हासिल की। नवानगर, बिहार के मूल निवासी। फिलहाल दिल्ली है ठिकाना।

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