ब्रह्मानन्द ठाकुर
पिछले दिनों वाराणसी में शिक्षा के मंदिर में जो कुछ हुआ उसने शिक्षा जगत पर एक बदनुमा दाग लगा दिया । जिस तरह छात्राओं की मांग को अनदेखा किया गया और सुरक्षा देने के बदले उनपर लाठियां बरसाई गईं । हैरानी तो इस बात पर होती है कि जिस प्रबंधन को छात्राओं की शिक्षा, सुरक्षा और अस्मिता का ख्याल रखना चाहिए वही उनको बेतूकी नसीहत देने में भी परहेज नहीं किए । कुलपति से लेकर प्राक्टर तक छात्राओं की पिटाई को जायजा ठहराते नजर आते हैं । ऐसे कुलपति को शिक्षा के मंदिर से बेदखल करने की बजाय हमारी सरकारें मौन साध लेती है । आखिर सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी रही कि अभी तक वीसी को हटाने की बजाय उनको लंबी छुट्टी पर भेजना पड़ा ।

ऐसे में सवाल उठता है कि हमारे शिक्षण संस्थान किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं । ये सवाल इस लिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि ये सब उस शिक्षण संस्थान में हुआ है जिसकी एक एक ईंट पूंजीवाद की देन नहीं बल्कि समाजवाद की देन है ।  आज से एक शताब्दी पूर्व जब देश में उच्च शिक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं था तब महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने देश में एक ऐसे विश्वविद्यालय की नींव रखी जो प्राचीन भारतीय परम्पराओं को अक्षुण्य रखते हुए देश-दुनिया में हो रही तकनीक की प्रगति की शिक्षा भी दे सके। अपनी इसी सोच को साकार करने के लिए उन्होंने 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना की। खास बात ये कि इस महान यूनिवर्सिटी की स्थापना का सारा काम चंदे से किया गया। बीएचयू की स्थापना का इतिहास कहता है कि पंडित मदन मोहन मालवीय को इस पुनीत कार्य के लिए जिसने सबसे पहले एक पैसा चंदा के रूप मे दिया था वह एक गरीब और बुजुर्ग महिला थी । यह सिर्फ चंदा मात्र नहीं बल्कि उस बुजुर्ग का मालवीय जी को दिया पहला आशीर्वाद था जिसकी बदौलत वे अपने मिशन को कामयाब कर सके।
विश्व पूंजीवाद एक खास नियम के तहत ही अपना प्रगतिशील चरित्र खो कर प्रतिक्रियावादी बन चुका है। लिहाजा वह उस सभी तरह के ज्ञान-विज्ञान, चिंतन और संस्कृति को मूल समेत नष्ट करने पर तुला हुआ है जो उसके अस्तित्व के लिए घातक है। अब राजसत्ता चूंकि इन्हीं पूंजीपतियों के कब्जे में है इसलिए छद्म लोकतंत्र में सत्ता के संचालक चाहे किसी भी दल या विचारधारा के क्यों न हों, अपने वर्ग हित में हर वैसी शिक्षा, संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं जो उनके लिए खतरा पैदा कर सकता है। प्रख्यात रूसी साहित्यकार टाल्सटाय ने भी कहा है कि – हुकूमत की जडें जनता की अज्ञानता में निहित होती हैं। अब भला कोई पूंजीवादी सत्ता के मैनेजर जनता को सही शिक्षा दे कर अपनी ही छड़ों पर कुठाराघात कैसे कर सकती है ?  हाल ही में बीएचयू में हुई घटना को इसी नजरिए से देखने की जरुरत है। इसके लिए सिर्फ किसी एक दल की पार्टी या सरकार को दोषी ठहराना उसका सतही आकलन मात्र होगा।

 1300 एकड़ में फैला BHU का मुख्य परिसर, 6 संस्थान, 14 संकाय, 14  विभाग 75 छात्रावास और 35 हजार विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय को एशिया की सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बनाता है। यहां विश्व के 34 देशों से छात्र आ कर पढ़ते हैं। डाक्टर सुंदर लाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉक्टर एस राधाकृष्णन, डाक्टर अमरनाथ झा, आचार्य नरेन्द्र देव और डॉक्टर त्रिगुण सेन जैसे प्रभृति विद्वान इस विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं। ख्याति प्राप्त भारती वैज्ञानिक शांतिस्वरूप भटनागर ने इस विश्वविद्यालय के कुल गीत की रचना की थी -‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर यह सर्व विद्या की राज धानी।

आखिर इतना गौरव पूर्ण इतिहास जिस शिक्षण संस्था का रहा हो,  उसकी मर्यादा तार-तार क्यों हो रही है। वह भी भारत की आजादी के 70 वें साल में। होना तो यह चाहिए कि गुलाम भारत में हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने जिस उन्नत शिक्षण संस्थाओं का निर्माण किया,  आजादी के बाद वह और ऊंचा मुकाम हासिल करता लेकिन स्थिति इतनी बदतर कैसे हुई? इस सवाल का जबाव आज देश पूछ रहा है। देशवासी जानना चाह रहे हैं लेकिन इसका सही जबाव कोई नहीं दे रहा है। मेरा मानना है कि नीति-नैतिकता, शिक्षा-संस्कृति, विचार-दर्शन इत्यादि अपने समय की अर्थव्यवस्था के आधार का सुपर स्ट्रक्चर (ऊपरी ढांच ) होता है। यह हमेशा अपने आधार से नियंत्रित और संचालित होता है। इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है। इसका विकासशील चरित्र काफी पहले ही खत्म हो चुका है। कभी समता,  स्वतंत्रता और विश्वबंधुत्व के नारे के साथ सामंतवाद की कब्र पर पैदा होने वाला पूंजीवाद आज अपने ही सिद्धांतों का गलाघोंट रहा है। शिक्षा, संस्कृति, नीति-नैतिकता, आदर्श सब कुछ आज व्यक्तिगत लाभ का साधन बन प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक सभी को बदहाल कर रहे हैं ।

शिक्षा को बाजार के हवाले करते हुए सरकारें शिक्षा पर व्यय के अपने संवैधानिक दायित्व से मुंह मोड़ती जा रही हैं। स्कूलों से विश्वविद्यालय तक छात्रों के जनवादी अधिकारों का हनन किया जा रहा है। छात्र जब समय से पाठ्यक्रम पूरा कराने, समय से परीक्षा आयोजित करने और परीक्षाफल प्रकाशन की मांग करते हैं तो उनके आंदोलन को बेरहमी से कुचला जाता है। दलीय राजनीति के आधार पर विश्वविद्यालय के छात्रों में फूट पैदा कर उनके जनवादी अधिकारों का हनन जारी है। आज बीएचयू की घटना से सबक लेते हुए जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को निजीकरण,  व्यापारीकरण, केन्द्रीकरण व साम्प्रदायीकरण के हमले से बचाना और वैज्ञानिक, जनवादी, धर्म निरपेक्ष शिक्षा ध्यवस्था लागू करने का आंदोलन तेज किया जाए।