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डुमरी, देवरिया -बच्चों को कौन समझाएगा विकास के मायने? फोटो- कमलेश

देवरिया जिले का आखिरी गांव है डुमरी। तीन टोलों डुमरी, मठिया और हतवा में बंटा ये हमारा गांव जिला प्रशासन और सियासी नेताओं की नज़रों से हमेशा दूर ही रहा। सरयू नदी के किनारे बसे डुमरी की याद नेताओं को चुनाव के समय ही आती है। विकास किस चिड़िया का नाम है, ये गांव के छोटे बच्चे नहीं जानते। बस इतना जानते हैं कि किसी तरह 10वीं पास कर सेना का जवान या पुलिस फोर्स में सिपाही बन जाना है। इससे ज़्यादा एक आध ही बच्चे सोच पाते हैं।

‘लोहिया ग्राम’ पर रिपोर्ट-एक

बहरहाल, करीब 8 महीने बाद गांव जाने का मौका मिला, इस बार गांव में कुछ बदलाव दिखे। ब्लॉक से करीब 15 किलोमीटर दूर बसे डुमरी को अखिलेश सरकार ने ‘लोहिया ग्राम’ घोषित कर दिया है। बदले में गांव में सोलर लैंप जगमगा रहे हैं और कुछ सड़कें ठीक-ठाक हो गई हैं। कई घरों के आगे पंचायत के पैसे से बने शौचालय दिखे तो कुछ लोगों को आवास भी मिल गया है। बाकि का जो विकास है, उसमें सरकार का कोई हाथ नहीं, जो पैसे वाले हैं वे अपने लिए सुविधा खुद जुटा रहे हैं।

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डुमरी, देवरिया- कोई बस मेरे गांव का रास्ता कब ढूंढेगी? फोटो- कमलेश

गांव में थोड़ी हालत भले सुधरी है लेकिन आज़ादी के सालों बाद भी डुमरी को एक बस तक नही मिल सकी। बस मिलती भी तो चलती कहाँ? पिण्डी से डुमरी की दूरी करीब 5 किलोमीटर है लेकिन डुमरी जाने के लिए कोई सुविधा नहीं। या तो पैदल जाइये या ऑटो लीजिये किराये पर। वो भी शाम 7 बजे से पहले उसके, बाद कोई नहीं जायेगा। पिण्डी-डुमरी सड़क से पिंडी, मियांपुर, खरवनियां और डुमरी गाँव जुड़े हैं लेकिन सड़क एक बार बनी और फिर उसे पूछने वाला कोई नहीं रहा। पिंडी से डुमरी जाते वक़्त आपकी अंतड़ियां सुकड़ जायेगी। बाबा रामदेव के सारे योगा कर लेंगे आप डुमरी पहुँचने से पहले। रात को गए तो कहाँ किस गड्ढे में गिरेंगे पता नहीं चलेगा।

सरयू नदी के किनारे बसे गांवों को कटान से बचाने के लिए पिण्डी से लेकर डुमरी तक एक बांध बनाया गया। बांध पर सिंचाई विभाग सड़क नहीं बनाने देता और न ही उसकी कभी मरम्मत होती है। बाढ़ आने पर ये सभी गांव सरयू मैया की कृपा पर रहते हैं।

बहरहाल, बांध के नीचे से होती हुई एक तथाकथित सड़क है जिसमें पिण्डी से डुमरी तक इतने गड्ढे हैं कि आप गिन भी नहीं सकते। दरअसल कहें भी तो किससे विधायक और सांसद तो ‘दूर की चीज’ हैं।

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कमलेश यादव पिछले 5 सालों से मीडिया में सक्रिय हैं। नौकरी के लिए गांव से शहर की सड़कों का रुख तो किया लेकिन चिंताओं का विस्तार उन पगडंडियों तक हैं, जहां बचपन के दिन गुजरे।


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