पुष्यमित्र/
बही खाता वालों ने किसानों से जीरो बजट खेती करने कहा है। उन्हें क्या जीरो बजट का हिन्दी नहीं मिला? और कुछ नहीं तो ‘शून्य बही खाता’ ही कर देते। हालांकि बजट का हिन्दी बही खाता नहीं होता है। बही खाता में आय व्यय का हिसाब लिखा जाता है, आगामी व्यय की योजना नहीं। खैर यह उनकी बौद्धिक सीमा है। वैसे भी जब किसानों की इनकम डबल नहीं हुई तो उन्होने बजट ही जीरो करने कह दिया।

वैसे जीरो बजट खेती अपने देश में महज 30-40 साल पहले तक खूब होती थी। अपना हल बैल होता था, पिछ्ले साल की फसल से बीज बना लेते थे, गोबर से खाद बन जाता था, मौसम मेहरबान रहता तो सिंचाई भी खुद हो जाती। गांव के सभी लोग मिलकर बारी बारी से एक दूसरे के खेतों में बुआई, कमौनी और कटनी कर देते। इस तरीके में कहीं पैसा खर्च नहीं होता।

मगर जब से हरित क्रांति आई, खेती के हर काम में पैसा लगने लगा। बीज से लेकर फसल की तैयारी तक में। खाद और कीटनाशकों के खर्च का तो कोई हिसाब ही नहीं है। इस बीच मौसम भी बेईमान हो गया है। बारिश के भरोसे सिंचाई होने से रही। बड़े किसानों ने दरवाजे से दुधारू पशु हटा दिये। इसलिये गोबर खाद भी महंगा सौदा है। इसके अलावा हर किसान को बम्पर फसल चाहिये तभी उसके जरूरी खर्चे चल सकते हैं। जीरो बजट खेती से बम्पर पैदावार हो नहीं सकती। इसलिये, जीरो बजट खेती एक सम्मोहक विचार जरूर है, मगर इस वक़्त एक झटके में किसानों पर इसे लादना खतरनाक हो सकता है। इसके बदले मुझे जैविक और सम्पूर्ण कृषि का विचार अधिक आकर्षित करता है। खेती के साथ किसान पशुपालन और वानिकी भी करे। प्रकृति का भी भला हो, जहर खाने से हम बचें भी और किसानों को कई तरह से आय हो।

अगर किसान फिर से दरवाजे पर गाय या भैंस रखने लगे तो उसे दूध से भी आय होगी और गोबर खाद भी मुफ्त में मिलेगा। छोटे छोटे तालाब हो तो सिंचाई का खर्च भी बचेगा, मछली पालन भी होगा और प्रकृति का भी भला होगा। खेत के मेढों पर नीम के पेड़ लगाये तो पेस्टीसाइड की जरूरत भी घटेगी और प्रकृति का भी भला होगा। वृक्ष जब वृद्ध होकर सूख जायेगा तो उसकी लकड़ी से किसानों को आमदनी होगी।यही राह आगे बढ़ कर जीरो बजट उर्फ शून्य व्यय खेती की तरफ हमें ले जायेगी।

पुष्यमित्र। पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता का अध्ययन। व्यावहारिक अनुभव कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ जुड़ कर बटोरा। प्रभात खबर की संपादकीय टीम से इस्तीफा देकर इन दिनों बिहार में स्वतंत्र पत्रकारिता  करने में मशगुल