‘ज़ीरो’ बजट का आदर्श गांव

धमदाहा - आदर्श ग्राम पर बातें और घर को लौटते ग्रामीण
लेखक (पुष्यमित्र) के गांव धमदाहा की एक तस्वीर

मोदी सरकार द्वारा सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत किये जाने के बाद से देश में मॉडल विलेज बनाये जाने की बात एक बार फिर से जेरे बहस है. हालांकि जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग यह बखूबी जानते हैं कि मॉडल विलेज का जो यह शिगूफा होता है वह बस प्रचार का एक मकसद भर होता है. नेताजी, मंत्री जी तड़ाक से किसी गांव को मॉडल विलेज बनाने की घोषणा कर देते हैं, चार दिन वह गांव खबरों में रहता है. योजनाएं बनती हैं, बहस होती है. फिर तमाम खबरों, योजनाओं और मुहाबिसों के साथ वह गांव खुद डब्बा बंद फिल्मों की तरह कहीं डब्बा बंद हो जाता है.

आजादी के बाद से ही विभिन्न सरकारें मॉडल विलेज का शिगूफा छोड़ती रही हैं और मेरा दावा है कि सरकारी कोशिशों से आजतक शायद ही कोई गांव मॉडल बन पाया हो. जो गांव आदर्श बने भी हैं वे कुछ सिरफिरे युवकों की अनथक परिश्रम की वजह से, जैसे महाराष्ट्र का हिवरे बाजार, अन्ना हजारे का गांव रालेगण सिद्धी, गुजरात औऱ राजस्थान के कुछ गांव, और अलग-अलग राज्यों में बसे कुछ छोटे बड़े गांव.
सरकारी कोशिशों से आदर्श गांव बनाये जाने की एक कहानी सुनाता हूं. झारखंड राज्य में एक बार तय हुआ कि सौ गांवों को आदर्श बनाया जायेगा. आनन-फानन में योजना बनी, घोषणाएं हुईं, फिर गहमा-गहमी भी खूब हुई. मगर जैसा कि चंद महीने बाद होता है, ये चर्चाएं भी बंद हो गयीं. कुछ साल बाद पंचायती राज पर काम करने वाली संस्थाओं के समूह ने पता लगाया कि आखिर उन आदर्श गांवों का क्या हुआ तो पता चला कि सरकार के पास इस बात का भी कोई रिकार्ड नहीं है कि ये गांव किस पंचायत और किस प्रखंड में स्थित हैं. अगर कुछ महीने बाद सांसद आदर्श ग्राम योजना का भी यही हाल हो जाये तो इस पर किसी को हैरत नहीं होनी चाहिये.
बहरहाल यह भी सच है कि अगर स्थानीय लोग चाह लें तो आदर्श ग्राम बनाना कोई बड़ा काम नहीं है. और सबसे बड़ी बात है कि इसके लिए किसी फंड की भी दरकार नहीं है. आप अपनी जेब से एक रुपया खर्च किये बगैर भी अपने गांव को आदर्श बना सकते हैं. इसके लिए बस आपके सजग रहने की जरूरत है. तो आइये आपको जीरो बजट में आदर्श ग्राम बनाने की तरकीब बताते हैं-
अपने गांव को आदर्श बनाने के पहले आप यह जान लें कि आदर्श गांव किसे कहते हैं. क्या आदर्श गांव वही है जहां चमकदार सड़कें हों और ऊंची-ऊंची बिल्डिंगें हों. जहां 24 घंटे बिजली रहती हो, गरीबी का नामोनिशान न हो. अमूमन आदर्श ग्राम की परिकल्पना लोगों के मन में ऐसी ही है. मगर सच तो यह है कि आदर्श गांव का इन बातों से कोई लेना-देना नहीं है. अत्यंत गरीब, कच्ची सड़क और फूस की झोपड़ियों वाला गांव भी आदर्श हो सकता है. आदर्श गांव का निर्माण चमक-दमक और पैसों से नहीं होता, उसके लिए अंदरूनी निखार की जरूरत है. ये इंडीकेटर कुछ ऐसे हो सकते हैं-

1. आपका गांव शत-प्रतिशत साक्षर हो.
2. आपका गांव कुपोषण मुक्त हो.
3. आपके गांव में कोई खुले में शौच नहीं करता हो.
4. आपके गांव में हर बच्चा स्कूल जाता हो, कोई कम उम्र में मजदूरी नहीं करता हो.
5. आपके गांव से रोजगार के लिए किसी को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती हो.
6. आपके गांव के सारे खेत सिंचित हों और किसानों को समय पर खाद-बीज और उपज का सही दाम मिल जाता हो.
7. आपके गांव में किसी युवती का विवाह 18 साल से कम उम्र में नहीं होता हो, हर महिला प्रसव कराने अस्पताल जाती हो, उसका नियमित टीकाकरण होता हो, दो बच्चों के बीच समुचित अंतराल रखती हो.
8. जात और धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं होता हो.
9. अमूमन गांव के तमाम झगड़े गांव में ही निबटा लिये जाते हों.
10. पंचायती राज के तहत गांव में नियमित तौर पर ग्राम सभा होती हो और ग्राम सभा में अधिकतर लोग सक्रिय भागीदारी निभाते हों.

ऐसे छोटे-बड़े कई काम हो सकते हैं. फिलहाल आप मानकर चलिये कि अगर इन दस में से छह या सात मानकों पर भी आपका गांव खरा उतरने लगे तो वह गांव खुद-ब-खुद आदर्श ग्राम मान लिया जायेगा. एक दो मानकों को भी पूरा कर आप अपने गांव को बेहतर गांव की श्रेणी में खड़ा कर सकते हैं. जैसे शत-प्रतिशत साक्षर होने के साथ ही आपके गांव की चर्चा पूरे इलाके में होने लगेगी. खुले में शौच मुक्त या कुपोषणमुक्त गांव या पलायनमुक्त गांव भी आज पूरे भारत में इक्का-दुक्का ही मिलेंगे.

सबसे अच्छी बात यह है कि इन तमाम मानकों को पूरा करने के लिए किसी बजट की कोई जरूरत नहीं है. साक्षरता से लेकर कुपोषणमुक्त बनाने तक के लिए सरकार की ओर से गांवों के लिए कई योजनाएं चलायी जा रही हैं. आपका काम बस इन योजनाओं को ठीक से लागू कराना है.

जैसे, अगर आप अपने गांव को कुपोषणमुक्त बनाना चाहते हैं तो आपका काम गांव के आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषाहर के वितरण की निगरानी करना है. कोशिश करना है कि हर छोटे बच्चे और धातृ महिलाओं को वहां से पोषाहार उपलब्ध हो जाये. आंगनबाड़ी के जरिये गांव के हर बच्चे के स्वास्थ्य की नियमित जांच कराना है. एएनएम द्वारा बच्चों का शत-प्रतिशत और नियमित टीकाकरण कराना है. अगर कोई बच्चा गंभीर रूप से कुपोषित मिलता है तो उसे जिला स्तरीय कुपोषणमुक्ति केंद्र में भरती कराना है. आपकी साल-दो साल की निगरानी के बाद आपका गांव आसानी से कुपोषणमुक्त हो सकता है.

अगर आप अपने गांव को खुले में शौच से मुक्त बनाना चाहते हैं तो सरकार के निर्मल भारत अभियान से जुड़ना होगा. सर्वे करवा कर हर घर में सरकारी सहयोग से शौचालय का निर्माण कराना होगा. पलायनमुक्त बनाने के लिए आपको मनरेगा और रोजगार संबंधी दूसरी योजनाओं की निगरानी करनी होगी और किसानों को खुशहाल बनाने के लिए सिंचाई कार्यक्रमों और पैक्स की गतिविधियों पर नज़र रखनी होगी. इस तरह आप देखेंगे कि महज थोड़ी सी मुस्तैदी और नियमित निगरानी से आप बड़ी आसानी से अपने गांव की तस्वीर बदल सकते हैं.

इसके लिए गांव के चार युवक भी मिलजुलकर कोशिश कर सकते हैं. सप्ताह में एक दिन देकर भी आप यह बदलाव ला सकते हैं.

PUSHYA PROFILE-2

आलेख पुष्यमित्र का है, जिनसे 09771927097 पर संपर्क किया जा सकता है। पुष्यमित्र पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय में हैं और गांवों में बदलाव और उनसे जुड़े मुद्दों पर आपकी पैनी नज़र रहती है।

 

3 thoughts on “‘ज़ीरो’ बजट का आदर्श गांव

  1. Pushyamitra Bhai aapki adarsh village ki parikalpana sajiv air sarthak hai, lekin satta me baithe logon ko ye bat shayad samajh name aaye, phir bhi name pray as karna yoga…BADALAV ki disa me ek kadam badhana hoga ….

  2. Shashi Shekhar वाकई अब गांव बदल चुका है। सुख-सुविधा के मामले में गांव के लोग शहर वालों से उतने पीछे नहीं रहे। विलासिता का सामान भी अब इनके पास कम नहीं है। चमचमाती सड़कें है तो उस पर दौड़ाने के लिए 98 सीसी से 180 सीसी की बाईक है, महंगी एसयूवी गाडिय़ां हैं।
    बिजली है तो घर में फ्रीज, टीवी, पंखे भी हैं। बिजली चली जाए तो इन्वर्टर से काम चल जाता है। शहर से गांव पहुंचने पर हर चीज अच्छी लगती है। मन डोलता है क्यों न गांव में रहा जाए। स्वच्छ हवा, शुद्ध भोजन, अपने खेत की ताजी सब्जी, फल, बिना मिलावट के दूध और दही…. सब सही लगता है। बस बच्चों की अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य उपचार को लेकर मन डोलने लगता है। शहर में नौकरी चल रही है तो प्राइवेट स्कूल बेहतर हैं। गांव में नौकरी नहीं होगी। आर्थिक हालात सिर्फ खेती पर निर्भर होगी। वैसे में बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना संभव नहीं। निजी अस्पताल में लंबे समय तक उपचार करवाना भी संभव नहीं।
    तब मन में कई सवाल आते हैं।
    देखो पिछले दस सालों में गांव स्मार्ट तो हुआ, पर सरकारें स्मार्ट नहीं हो पाईं। सड़कें बनवा दी, बिजली चमकने लगी। शौचालय बन गए। पर उस सरकारी स्कूल का क्या हुआ जिसे हम दस साल पहले बेहतर हालात में छोड़ आए थे? जिसमें पढ़कर आज हम बुद्धिजीवी है उस सरकारी स्कूल के क्या हालात हैं? उसकी गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय क्यों घटा दी गई?
    काश, स्मार्ट शहर बनाने से पहले कोई गांव के सरकारी स्कूल और अस्पताल को स्मार्ट बना दे।कम खर्च और कम समय में देश स्मार्ट बन जाएगा।— शशि शेखर, फेसबुक पर

  3. हां पुष्यमित्र जी,’हर ततवीर से पहले खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बंदे से खुद पूछे , बता तेरी रजा क्या है ?

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