विकास के बड़े दावों के बीच देश के आदिवासी क्षेत्रों में पानी के रंग कुछ ऐसे है। ये आदिवासी किसान रोजमर्रा की ज़रूरत को कोसों पथरीली सड़क पर नंगे पांव चलकर पीने का पानी गड्ढों से लाते है। झारखंड, छत्तीसगढ़ के जंगलों में यह तस्वीरे सामान्य है। इन्हें वोट देने के बाद पीने का पानी नहीं मिलता तो विकास की बात छोड़ दीजिये। देश की संसद जहां राजनीतिक आंकड़ों, अखाड़ों में राफेल, अरोपबाजी का दौर चलता है। जहाँ एक दिन में करोड़ रुपये फूंककर सिर्फ जुगाली होती है और साथ में दिव्य भोज की दावतों का भोग होता है वहां शायद ही कभी इन बदनसीब आदिवासी, किसानों का ख्याल आजादी के बाद से अब तक किया गया हो।

झारखंड के फेसबुक साथी लिखते है पीने के पानी की समस्या : – जल ही जीवन है….किस तरह हम सभी यहाँ शहर में सुख से जी रहे है वहीं दूसरे तरफ अन्नदाता किसान और उनके मवेशी पीने के पानी के लिय संघर्ष कर रहे है। अभी भी संथाल परगना के कई गांवो में पीने का पानी का समस्या है।

गांव नमोडीह, पंचायत खरौनी बाजार, प्रखण्ड गोपीकांदर,जिला दुमका(स.प.), झारखण्ड मे विभिन्न समाचारों पत्रों के माध्यम से प्रशासन को जब इसकी जानकारी मिली तो दुमका के उपायुक्त ने संज्ञान लेते हुए प्रखंड विकास पदाधिकारी को त्वरित कार्यवाही करते हुए समाधान करने का निर्देश दिया।

काबिलेगौर है ऐसे कितने गांव आज भी अंतिम पायदान में जीवन बसर करते है और हम, हमारे नेताजी देश को दिवास्वप्न बेच रहे है। यह दोष आती,जाती हर सरकार का है जिसमें मुख्य दोषी स्थानीय प्रशासन है।


आरटीआई एक्टिविस्ट आशीष सागर की रिपोर्ट। फेसबुक पर ‘एकला चलो रे‘ के नारे के साथ आशीष अपने तरह की यायावरी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। चित्रकूट ग्रामोदय यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र। आप आशीष से ashishdixit01@gmail.com पर संवाद कर सकते हैं।