संजय पंकज

संसार की प्रथम विश्व धर्म महासभा शिकागो,अमेरिका में 11 सितम्बर 1893 में विराट भारत खड़ा हुआ था। इसके साक्षी हजारों लोग थे, उन्हें तब आभास भी नहीं था कि वे महान ऐतिहासिक क्षण के द्रष्टा हैं। उस दिन भारत के एक केसरिया धारी युवा संन्यासी ने सारे संसार के धर्मावलंबियों का मानस झकझोर दिया था। सर्वथा अनजान वह युवक किन-किन उपायों से, कैसे-कैसे संघर्षों को झेलते हुए, कठिनाइयों को पार करके उस विश्व धर्म संसद में पहुँचा था। उसे विरोध का सामना करना पड़ा, अपमान का घूँट पीना पड़ा, उपेक्षा का तीखा दंश सहना पड़ा फिर भी वह अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुआ। उसे तो संसार को भारत से परिचित कराना था, भारतीय मनीषा क्या है -यह बताना था। उसे तो कहना था ; जानो भारत क्या है, इसका धर्म और चिंतन क्या है और क्या है इसका वैराट्य  ?

भारत केवल भूखंड या कोई देश मात्र नहीं है । यह शाश्वत मूल्य, समरस संस्कृति, चेतना शिखर और शिवत्व धारक ही नहीं ; बल्कि समन्वय संवाही आत्मीय संवेदना है जो मनुष्य-मनुष्य के बीच फर्क नहीं मानता। भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम् ‘में अटूट विश्वास करने वाला, हर पल इसी भाव में रमने और जीनेवाला परम वैभव है। अपने महान पूर्वजों की ज्ञानसंपदा को अपनी थाती मानकर निष्ठा के साथ सर्वकल्याण करने वाले ईश्वरीय ऐश्वर्य का नाम है भारत। भारत विभेद नहीं जानता मगर विभेदकारी अराजक तत्वों को मटियामेट करने में भी नहीं हिचकता। ‘न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है’ के सत्य से भी कभी पीछे नहीं हटता। भारत का जीओ और जीने दो में विश्वास है। अहिंसा का उपासक भारत कायर नहीं है।यहाँ शिव अराजकता के शमन के लिए तांडव करते हैं। युवक और कोई नहीं स्वामी विवेकानंद था जो अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के ज्ञान-तेज से दीप्त दोपहर के सूरज की तरह उस धर्म संसद में आलोकित हो रहा था।

स्वामी विवेकानंद उस धर्म संसद के महानायक हो गए। सबने एक स्वर से उनकी सराहना की। जिस भारतीय युवा संन्यासी को आयोजन के संचालक ने बड़े अनमने ढंग से बुलाया और सभागार में उपस्थित भीड़ ने जिसके विरुद्ध नारे लगाए साथ ही जमकर हो हल्ला मचाया, वही युवक शौर्य, पराक्रम, ओज और अडिग आत्मविश्वास संभाले जब दृढ़ता पर सवार सिंहावलोकन करता हुआ मंच पर आरूढ़ हुआ तो बिजली- सी कौंध गई। बिना किसी को रोके – टोके स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद को संबोधित करते हुए जैसे ही कहा – ‘मेरे प्रिय अमरीकी भाइयों एवं बहनों!’- सबको काठ मार गया। जो जिस मुद्रा और क्रिया में था उसी में ठगा – सा ठिठक कर रहा गया। संबोधन के औदात्य और सम्मोहन में सबके सब विमुग्ध हो गए। जड़ता से जब लोग उबरे और चेतना झंकृत हुई तो देर तक तालियों की गड़गड़ाहट गूँजती रही। सब अपनी सांसों को रोककर अपनी जगह पर बैठ गए। पहली बार संसार ने सुना था ऐसा अात्मीय और उदात्त संबोधन।

भारतीय संस्कृति और संस्कार की शिष्टता -विशिष्टता से ठीक से पहली बार संसार परिचित हुआ था। पहली बार किसी सुदृढ़ युवा संन्यासी से संसार को पाला पड़ा था। स्वामी जी ने ‘कूपमंडूक’ की कथा से अपना अभिप्राय प्रारंभ किया।समझने वाले समझ गए कि यह भारतीय संन्यासी सामान्य नहीं है और इसका संबोधन-अभियान भी औपचारिकता मात्र नहीं बल्कि साभिप्राय है। हिंदू धर्म की अस्मिता समुद्र के समान है। विवेकानंद के रूप में शिकागो में भारत का स्वाभिमान खड़ा था और निर्भयता के साथ सत्य को उद्घोषित कर रहा था।

यह 11 सितम्बर विराट भारत दिवस है जिस पर समस्त भारतवासियों को गर्व है। भारत गौरवान्वित हो गाता है -‘हमको है अभिमान देश का /जिसका पाँव पखारे सागर /गंगा भरे संवारे गागर /सोए जिस पर स्वर्ग वही तो /शीश मुकुट हिमवान देश का’ । भारत राम , कृष्ण, बुद्ध, महावीर, तुलसी, कबीर, नानक की अवतार भूमि है। असंख्य ज्ञानियों, ध्यानियों, वैज्ञानिकों, मनीषियों, चिंतकों और सही अर्थ में मनुष्यों की पावन स्थली है। यहाँ कंकड़-कंकड़ में शिवशंकर के वास-सुवास हैं। जड़ में भी चिंतन के दर्शन करना, दर्शन मात्र नहीं अपितु आध्यात्मिक आत्मबोध है। बाह्य यात्रा से बहुत बहुत अधिक निरंतर अंतर यात्रा करने वाले यहाँ के साधकों को पता है कि माया और जीव क्या है, और क्या है जीवन और मृत्यु। सत्यद्रष्टा मनीषियों ने सब जीवों के भीतर एक ही परमात्मा को देखा। उन्होंने परम तत्व को सिर्फ अनुभूत ही नहीं किया बल्कि उसका साक्षात्कार भी किया।

रामकृष्ण परमहंस ने युवक नरेंद्र की ईश्वर संबंधी तीव्र जिज्ञासा को शांत कर दिया था। नरेंद्र के -ईश्वर है? के प्रश्न को रामकृष्ण ने -‘ठीक वैसे ही जैसे मैं हूँ, तुम हो ईश्वर भी है ‘ कहकर निरुत्तर कर दिया था। रामकृष्ण ने आगे कहा था -‘तुम जब चाहो मैं तुम्हें ईश्वर के दर्शन करा सकता हूँ।’ नरेंद्र की बोलती बंद हो गई थी। वह नहीं कह सका कि उसे ईश्वर को देखना है। जब यथोचित अवसर आया तो महान गुरु ने तेजस्वी शिष्य को ईश्वर की संपूर्ण अनुभूति ही नहीं परिक्रमा ही करा दी। अपने अवतारी गुरु का आशीर्वाद लेकर विश्व मानवता के कल्याण के लिए दिग्विजय अभियान पर निकले विवेकानंद ने जो विचार दिए वे मनुष्य को तमाम हीनताओं, दुर्बलताओं और दीनताओं से मुक्ति देनेवाले जीवन सूत्र हैं, अमोघ मंत्र हैं। सोए संसार को भारत-दर्शन से जागृत करते हुए स्वामी विवेकानंद ने उसे उसके यथार्थ से अवगत कराया ।दीन-दलितों और भाग्यपीड़ित अभागों को स्वामी जी ने बोध कराया कि -तुम विजेता हो, तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है, ईश्वर का प्रेम तुम्हारे लिए है, तुम जागो, स्वयं को पहचानो।

तुम परमानंद में लीन हो जाओ, सारा ऐश्वर्य तुम्हारे लिए है। तुम हतभागी मत बनो, तुम्हारी पतितावस्था के दोषी तुम हो, तुम ज्योतिपुत्र हो, अमृतपुत्र हो तो फिर अंधकार में भटकते तिल तिल क्यों मर रहे हो। अपने लक्ष्य को जानो – समझो और उसकी प्राप्ति के लिए निर्भीक बढ़ो और तब तक रुको नहीं जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। ‘यह भारत की आध्यात्मिकता है जो बताती है कि ईश्वर सबके हैं और सभी आनंद के अधिकारी हैं। विवेकानंद ने विश्व को अज्ञानता के अंधकार से निकाला था, जड़ता की गहरी नींद से झकझोर कर जगाया था, उसके सत्य स्वरूप के दर्शन से उसे चेतनशील किया था, उसकी अपार क्षमता से अवगत कराया था। वैज्ञानिक चिंतन और प्रगतिशील विचारों के संवाहक स्वामी विवेकानंद की वाणी मृत्युमुखी जनों के लिए संजीवनी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।

विवेक की वाणी सर्वजन, सर्वदेशीय और सदा सर्वकालिक होती है। यह वाणी सनातन भारतीय जीवन मूल्यों की विरासत है। गुरु रामकृष्ण परमहंस के करुणामय आदेश का पालन करते हुए प्रिय शिष्य विवेकानंद ने संसार -त्याग का विचार छोड़ कर संसार के बीच रह कर सेवाकार्य जीवनपर्यंत किया। भारत का विवेक ही विवेकानंद के माध्यम से विश्व का आनंद तब विश्व धर्म महासभा में बना था जो आज भी पर्यावरण तथा आतंकवाद के संकट में फँसे संसार को निकाल सकता है।

निस्संदेह स्वामी विवेकानंद हिंदू हृदय सम्राट हैं मगर साम्प्रदायिकता और संकीर्णता के तथाकथित अर्थों में नहीं। वे सारे धर्मों का बहुत ही आदर करते थे। धरती की सारी जातियों का हृदय से सम्मान करते थे। उनके लिए सारे मनुष्य परमात्मा की संतान है। आपसी विसंगतियों के लिए ईश्वर को वे ही दोषी बतलाते हैं, जिन्होंने ज्ञान का व्यापार किया है या मूढ़ता के गहन अंधकार में स्वयं को कैद कर रखा है। प्रकृति या ईश्वर ने तो मनुष्य को असीम शक्तियों से भरकर पैदा किया है फिर मनुष्य का भाग्यवाद का रोना उसकी अकर्मण्यता नहीं तो और क्या है ? कृष्ण ने गीता में कर्म को सर्वोपरि बताया। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने गीता रहस्य में कर्मवाद को ही जीवन के लिए श्रेयस्कर निरूपित किया।आदिशंकराचार्य ने गीता के नष्टोमोहा को जीवन सूत्र मानते हुए कर्म की व्यापक व्याख्या की।

विवेकानंद ने कर्म को जीवन-आधार बनाया और अनथक परिश्रम किया। कर्म केन्द्रित जीवन की सार्थकता क्या है इसे विवेकानंद ने शिकागो-व्याख्यान में प्रतिपादित करने के साथ ही लगभग चार वर्षों तक यूरोप के विभिन्न भागों तथा अन्य देशों में जागरण का संदेश दिया। हिंदू धर्म के बारे में फैलाई गई भ्रांतियाँ का निवारण किया। भारत की व्यापक व्याख्या की। धर्म की अवधारणा, वैज्ञानिकता और अनिवार्यता की विशद चर्चा करते हुए सबको आनंदमय जीवन का अधिकारी बनाया। शिकागो-संवाद का ऐसा गहरा प्रभाव जमा कि भीड़ सिर्फ विवेकानंद को सुनने के लिए ही हर दिन जुटती रही और उन्हें सुनने के लोभ से ही अन्य धर्मावलंबियों को सुनने की विवशता झेलती रही। विवेकानंद सबके आकर्षण के केन्द्र हो गए थे। आंदोलित हो गयी थॉी पूरी पश्चिमी दुनिया।

विवेकानंद की लोकप्रियता तेजी से फैली। बिना दस्तक के ही पश्चिम का क्षितिज-द्वार खुल गया और आलोक से भर गया। कहने की आवश्यकता नहीं कि आलोक-सूर्य पूरब से वहाँ पहुँचा था। भारत का यह भास्वर स्वर जब सदेह दिग्विजय करके भारत-भूमि पर लौटा तो पूरा देश स्वागत-अभिनंदन के लिए उमड़ पड़ा । विवेकानंद परम्परा विश्वासी प्रगतिशील थे। परम्परा में जो कुछ बेहतर और युगानुकूल था विवेकानंद ने उसे उदारता से स्वीकार किया। इतना ही नहीं संसार के सारे धर्मों में भी जो मानवीय था उसे भी उन्होंने सिर आँखों पर धारण किया। हम कह सकते हैं कि सर्व धर्म सर्वोच्च के वे समन्वय शिखर थे जिस पर फहराती हुई विशाल हिंदू-पताका में सारे धर्मों ने अपने निर्मल रंग की पावनता के विराट दर्शन किए।

विवेकानंद ने सनातन हिंदू धर्म परम्परा को महासमुद्र के रूप में अभिहित करते हुए अन्य धर्मों को सतत प्रवाहित नदियों के रूप में प्रतिपादित किया और बताया कि धर्म लड़ने -झगड़ने, मरने-मारने और यश-निन्दा की कोई निर्जीव वस्तु नहीं है। धर्म तो जीवन पद्धति के महाअनुशासन का असमाप्त ऐसा अध्याय है जो प्राणसत्ता की गाथा में अक्षर-अक्षर मृत्युपर्यंत धड़कता रहता है। धर्म की धुरी से विलग जीवन निष्प्राण होता है। धर्म रूढ़ियों, प्रस्तर-प्रतिमाओं और ग्रंथों में नहीं है, धर्म तो सांस लेती हर जिंदगी की हिफाजत करने में है। पूजा-पाठ, जप-तप, योग-ध्यान, मंदिर-मस्जिद सब कर्मकांड के आडम्बर हैं, यथार्थ तो जीवन के समग्र विकास और आनंद में निहित है। विवेकानंद की प्रगतिशीलता धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, नैतिक और समस्त मानवीय मूल्यों की संवेदनात्मक वैज्ञानिक अवधारणा में समझी जा सकती है।

जीवन की कीमत पर विवेकानंद को कुछ भी स्वीकार नहीं था । उनका ईश्वर मनुष्य-रूप में पूज्य और सर्वोपरि है।बेलूर मठ का शिल्प मंदिर-मस्जिद-चर्च का समाहार और सामंजस्य है तथा उसमें स्थापित प्रतिमा महामानव करुणास्वरूप सर्वधर्म ज्ञाता सत्यद्रष्टा रामकृष्ण परमहंस की है। रामकृष्ण ने सारे धर्मों के ईश्वर के तथा सारी जातियों के इष्ट के साक्षात्कार किए थे और उन्हें आत्मस्थ किया था। स्वामी विवेकानंद अपने विराट गुरु के आलोक का महाप्रसारक सूर्य बनकर तब भी भासमान हुए थे और आज भी प्रखरता लिए भासमान हैं। और यह सच है कि आलोक का कभी अवसान नहीं होता। उसका जयगान युगों-युगों तक होता है। शाश्वत जययात्रा कभी रुकती नहीं, चूकती नहीं।आलोक-सूर्य उगता अलख जगाता है, दोष तो सोनेवाले का है। विवेकानंद के प्रगतिशील विचारों को संवहन कर सकने की निष्ठा, कूबत, ईमानदारी सब में हो भी कैसे सकती है भला! जड़ता टूटते-टूटते टूटती है और सदियों लगी जंग भी छूटते-छूटते छूटती है। रामकृष्ण ने विवेकानंद को कठोरता और जतन से गढ़ा था तभी तो उसका वैभव आज भी अमर है।


संजय पंकज। बदलाव के अप्रैल 2018 के अतिथि संपादक। जाने – माने साहित्यकार , कवि और लेखक।  स्नातकोत्तर हिन्दी, पीएचडी। मंजर-मंजर आग लगी है , मां है शब्दातीत , यवनिका उठने तक, यहां तो सब बंजारे, सोच सकते हो  प्रकाशित पुस्तकें। निराला निकेतन की पत्रिका बेला के सम्पादक हैं। आपसे मोबाइल नंबर 09973977511  पर सम्पर्क कर सकते हैं। 

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