तन्मय

बदलाव बाल क्लब की कार्यशाला में मैं तीन दिन अनुपस्थित रहा। दरअसल मैं एक दूसरे बदलाव को महसूस करने में लगा था। ये बदलाव भी कम रोचक नहीं था। गाजियाबाद की सड़ी हुई गर्मी से एकाएक नैनीताल के मनमोहक मौसम का मज़ा। दोस्तों आओ तुम्हें वही यात्रा वृतांत सुनाता हूं। तालों के शहर नैनीताल का यात्रा वृतांत। सुबह सुबह गाजियाबाद रेलवे स्टेशन से ट्रेन पर सवार हो कर हम काठगोदाम के लिए निकले। शताब्दी एक्सप्रेस का सफर भी मेरे लिए नया था। चाय और नाश्ते के साथ हम कब अपने गंतव्य पर जा पहुंचे, पता ही नहीं चला। वहां से फिर एक टैक्सी से हम नैनीताल के लिए रवाना हुए। पांच मिनट के बाद ही हम पहाड़ों के बीच थे। एक ओर हरे-भरे पेड़ों से लकदक पहाड़ तो दूसरी ओर खाई। बीच में पतली सी सड़क पर सरपट भागती गाड़ियां। झमाझम बारिश ने इस सफर को और भी सुहाना बना दिया। चारों ओर नयनाभिराम दृश्य। डेढ़ घंटे लगे नैनीताल पहुंचने में।

होटल का कमरा पहले से बुक था। नैनीताल माल रोड के रिक्शा स्टैंड पर टैक्सी वाले ने हमें उतार दिया। आगे होटल तक चढ़ाई थी। पांच सौ मीटर की चढ़ाई में 15 मिनट लगे। वहां पहुंचते ही होटल वाले ने शीतल पेय से हमारा स्वागत किया। ये बाजार में मिलने वाला बोतलबंद शीतल पेय नहीं था। पूछने पर पता चला ये बुरांश नामक फूल का जूस था। वो फूल जो सर्दी के मौसम में पहाड़ों पर बहुतायत में होते हैं। हम अपने कमरे में गए। लेकिन मेरा मन तो पहाड़ों में रमा था। भागकर बालकनी में आया। नैनी झील साफ दिखाई पड़ रही थी। पूरा शहर सामने था। पहाड़ों पर टिके छोटे छोटे से घऱ और होटल। भोजन कर के हम शहर घूमने निकले। सबसे पहले ताल के किनारे पहुंचे। वही नैनीताल जिसके नाम पर ये पूरा शहर या यूं कहे पूरा ज़िला बसा हुआ है। ताल के किनारे बड़ी तादाद में नौकाएं लगी थीं। 210 रुपये का टिकट लिया और हम सपरिवार नैनीताल में नौका-विहार के लिए निकल पड़े। नाविक हमें नैनादेवी के मंदिर तक ले गया। पूरा ताल हरे रंग के जल से आप्लावित था। ताल में बड़ी बड़ी मछलियां अटखेलियां कर रहीं थी। नाविक ने बताया कि झील 120 फीट गहरी है। सर्दियों में इसका पानी नीले रंग का दिखाई पड़ता है और जब पहाड़ों पर लाल-लाल बुरांश के फूल लद जाते हैं तो उनके प्रभाव से झील के पानी का रंग भी रक्तिम दिखाई पड़ने लगता है।

बड़े भाई मानष के साथ नैनीताल झील में नौका विहार का लुत्फ लेते हुए ।

झील में कुल 222 नावें चलती हैं। सब सरकारी ठेके पर। हां झील की मछलियों को मारने का ठीका नहीं दिया जाता। मछलियों को नैनादेवी का वरदान प्राप्त है। कोई चोरी-छिपे मछलियां मार भी ले तो वो बेस्वाद लगती हैं-कड़वी। ऐसे ही कुछ कहानी-किस्सों के साथ हम वापस माल रोड पर आए। सब कुछ जल्द से जल्द देख लेने की बेचैनी थी। हम एक टैक्सी में बैठे और ऊपर की ओर निकल पड़े। टैक्सी वाला हमें चढाई वाले रास्ते से शहर से ढाई हजार फीट ऊपर ले गया। हर मोड़ पर यही लगता कि बचना मुश्किल है। बिल्कुल सीधी चढ़ाई थी। हम स्नो व्यू प्वाइंट पर पहुंचे। वहां से हिमालय की बर्फ भरी चोटियां साफ नज़र आ रही थीं। वहीं भोलेनाथ का एक मंदिर भी है। मंदिर में पूजा अर्चना के बाद हम नीचे की ओर रवाना हुए। उतरना और भी ज्यादा डराने वाला था। अब गए तब गए, ऐसा ही एहसास होता था। लेकिन टैक्सी ड्राइवर मंझा हुआ खिलाड़ी था। हम खुरपा ताल पहुंचे। दरअसल ये नैनीताल ही था जो दो पहाड़ियों के बीच गाय के खुर की मानिंद दिखाई पड़ रहा था। एक दूसरी जगह भी थी जहां से नैनीताल बिल्कुल आम के आकार का नज़र आता था। हमने तस्वीरें उतारीं और एक ऐसी जगह जा पहुंचे जिसे सुसाइड प्वाइंट के नाम से जाना जाता है। टैक्सी वाले ने बताया कि सैंकड़ों सालों पहले एक अंग्रेज अफसर की बेटी को एक घोड़े वाले से प्यार हो गया था। किसी वजह से दोनों ने यहीं से छलांग लगाकर खुदकुशी कर ली थी। सुसाइड प्वांइट के पास ही घुड़सवारी के लिए कई घोड़े तैयार खड़े थे। मेरी नजर पास ही बिक रहे फलों पर पड़ी। आड़ू, चेरी, प्लम, खुबानी और छोट-छोटे हरे हरे सेव। मैने इन पहाड़ी फलों का खूब स्वाद लिया। कोई खूब मीठा तो कोई थोड़ा खट्टा और थोड़ा कसैला। हम आगे बढ़े। सामने संत जोसेफ कालेज था। वही कालेज जहां ऋतिक रौशन की फिल्म कोई मिल गया की शूटिंग हुई थी।

करीब तीन घंटे की इस यात्रा के बाद हम हाईकोर्ट होते हुए बड़ा बाजार में थे। यहां हाईकोर्ट नया बना है। पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट से ही कामकाज होता था। खैर, टैक्सी वाले ने बताया कि शाम सात बजे से नौ बजे तक माल रोड पर गाड़ियों की नो एंट्री रहती है। पूरे शहर के सैलानी इस वक्त यहीं जमा होते हैं। हम बड़ा बाजार से पैदल माल रोड पहुंचे। रौशनी से जगमग माल रोड। दो घंटे कैसे गुजरे पता ही नहीं चला। वापिस होटल पहुंचे। अगले दिन हमें जू जाना था। सरकारी गाड़ियां हीं वहां तक जाती हैं। टिकट लेकर हम भी तैयार थे। कतार लंबी थी। हमने पहले नैना देवी का दर्शन किया फिर जू के लिए चल पड़े। जू में बहुत मजा आया। सबसे ज्यादा बाघ को देखकर। कैसे घूमता था वह अपने बाड़े में। शाही अंदाज में। हमने उसकी तस्वीरें उतारीं। फिर चीता, गुलदार, बंदर-भालू सब का दीदार हुआ। ऊपर चढते जाओ और नए नए मेहमानों से मिलो। हाई अल्टीट्यूड जू का यही मजा था। पांच घंटे लगे। हम वापस माल रोड आए फिर रात नौ बजे होटल। अगले दिन वापसी थी। लेकिन इससे पहले तालों का दीदार करना था। पहले सात ताल, फिर भीमताल और आखिर में नैकुचिया ताल। अलग अलग ताल अलग अलग कहानियां। सात ताल में सात ताल थे। अगल बगल। भीमताल के बारे में बताया गया कि भीम को वनवास के दौरान प्यास लगी थी तो उन्होंने गदा से जमीन फोड़कर पहाड़ से पानी निकाला था। नौकुचिया ताल के बारे में बताया गया कि इस ताल में नौ कोण हैं। कोई एक साथ इन नौ कोणों को देख ले तो तत्काल उसकी मौत हो जाती है। राहत की बात ये कि नौ कोण एक साथ देखना मुमकिन ही नहीं था। घूमते-घामते फिर काठगोदाम। रात में ट्रेन पर सवार हुए और अहले सुबह घर पहुंच गए। प्रकृति की गोद से फिर उसी कंक्रीट के जंगलों में।

– तन्मय, 7वीं के छात्र । ग़ाज़ियाबाद के वैशाली में निवास ।