सांकेतिक चित्र

वीरेन नंदा

किस्सागोई के पिछले अंक में आपने पढ़ा कि कैसे दो दोस्त, जो साहित्यकार भी हैं, घर से रिक्शे पर सवार होकर बाजार निकले और उनका हर अंदाज निराला है । एक दोस्त वाकपटु है तो दूसरा वाचाल, एक दोस्त एक बात को समझाने के लिए बकायदा कहानी बुनने लगता है, दोनों दोस्तों की छोड़ी निराली है। दोनों दोस्त रिक्शा लेकर कल्याणी पहुंचे और वहां क्या कुछ हुआ, पढ़िए वीरेंद्र नंदा के किस्से ।

रिक्शा जब छोटी कल्याणी पहुंचा तो तन्द्रा टूटी। अरे ! ये क्या, रिक्शा आज न हाथी चौक रुका ! न तरल… न आचमन किया।  इस सवाल पर फट पड़े- ‘ आप ने ही तो फोन पर कहा था कि अपने भरोसे और आज मेरी जेब भरोसे लायक नहीं ।’  कहते हुए आवेश में रिक्शा से उतरकर बोले- ‘चलिए प्रकाशन, प्रूफ लेना है’ ‘इतनी हड़बड़ी क्या है? – रिक्शे पर बैठे बैठे बोला-‘ आज तो मैं पलने आया था ।’

‘मतलब ?’  पनबट्टा खोल मुँह में सुपाड़ी डाल प्रश्ननांकित हुए वे बोला। ‘जगजीवन जी को तो आप जानते है न ?’ ‘हाँ, तो ?’ – काली जिह्वा से उंगली पर का चुना चाटते हुए बोले। ‘उनसे मिलिए तो छूटते ही कहेंगे- तब बन्धु, आज पालेंगे कि पलेंगे ? और यदि कह दिया कि पालेंगे तो शिकारी मुद्रा में उनका चेहरा खिल उठता और आप इस तरह हलाल होते उस शाम कि वर्षों पालने का ख्वाब न देखने की कसम खा बैठते ।’

‘ये पालने-पलने का क्या खेल है ? – उन्होंने पूछा, तो  किस्सा गो को सुनाने लगा किस्सा। बनारस बैंक चौक पर बैजू चाय की दूकान है। जहां नित्य शाम लेखकों का जमघट जुटता। शायर-कवि-लेखक जुटते हैं। जिनमें वरेण्य कवि कविन्द्र प्रसाद सिंह भी अमूमन अपने रिक्शे से पहुंचते। चाय टोस्ट के बीच देश दुनिया के साहित्य की चर्चा होती। जगजीवन जी भी वहाँ होते। कमल विश्वास भी अपनी बनारस बैंक चौक पर वाली दुकान ‘दीप जनरल स्टोर्स’ बन्द कर आ जाते। जगजीवन जी संध्या में मुलाकाती मित्र से मिलते ही कहते, – ‘ तब बन्धु, आज पलेंगे कि पालेंगे ? यदि आपने कहा कि पालेंगे ! तो समझो आ गई शामत ! बैजू चाय की दुकान में बैठकर जब पालने वाली मुद्रा में आप शान से उनसे पूछते कि क्या खाना पसंद करेंगे, तो वे कहते – जैसी आप की श्रद्धा ! गर अंडा के लिए पूछ लिया तो बोलते-आप खिला नहीं पाएंगे । दर्जन आधा दर्जन से कम पर समझौता नहीं करते। साथ में आठ दस मक्खन टोस्ट । तीन चार कप चाय और फिर पान की खिल्ली उड़ाते कहते-‘कल फिर मिलें अपनी टटकी कविता के साथ’। वैसे यह नियमित रूटीन था उनका।

ऐसा नहीं कि दूसरों का ही मुंडन करते। अपनी जेब भी इसी तरह उड़ाते । खाने की उनकी ये शैली थी। कचहरी में काम करते थे। दाताओ की कमी नहीं। कचहरी में आप के संग पान खाया और मुड़ते ही कोई क्लाइंट चाय के लिए पूछ दिया तो मुँह के एक तरफ पान सरका चाय सुड़क लेते । अपने घर भी उन्हें सुबह का नाश्ता करते देखा-खाया ! भौजाई के हाथों का बना जबरदस्त पन्द्रह सोलह तन्दरूस्त पराठा और किलो, आधा किलो आलू की भुजिया संग चट करने में देर नहीं लगती थी उन्हें। भौजाई बनाती भी जबरदस्त थी। कई बार जीमने का मौका मिला। स्वाद की स्मृतियों ने मुँह पानी से भर दिया। चलिए,अभी उसी पानी की घूंट पी आगे बढ़ते हैं। जगजीवन जी अच्छी शायरी करते। उर्दू ऐसी बोलते कि उर्दू दां भी उनसे अदब से मिलते।

 आश्चर्य से उनकी आंखें फैलते देख किस्सा जारी रखा। एक बार सुबह-सुबह पुरानी बाजार में मक्खन साह की दुकान में कचौरी जिलेबी खाने का मौका दिया। गरमा गरम छनती जिलेबी कचौड़ी की सुगंध के बीच जमी भीड़ को चीर घुसते हुए मक्खन साह का हाल चाल लिया उन्होंने, फिर हम दोनों बैठे तो वेटर को बुला पूछा – ‘आज सब्जी में क्या बना है ?’ उसके आलू चना कहने पर चार- चार कचौड़ी और तीन-तीन जिलेबी का आर्डर दिया। प्लेटें सज गई तो मुझसे कहा-बिस्मिल्ला कीजिये ! और हो गए शुरू। हमने चट कर लिया तो फिर उन्होंने तीन कचौड़ी और पांच जिलेबी की फरमाइश की। मैंने मना कर दिया तो उन्होंने वेटर को आवाज दी कि जरा सब्जी लाओ और भकोसते हुए कहा- ‘आप के इतना तो ऊँट के मुँह में जीरा का फोरन वाली बात हुई।’ और तंज कसते हुए उन्होंने वेटर को आवाज दे पुनः दो जिलेबी और तीन कचौड़ी मंगाई। उसे हजम कर पांच कचौड़ी और दो जिलेबी मांगा। खाते हुए कई लोग मुस्कुराते उन्हें घूर रहे थे। लेकिन उनकी जिलेबी कचौड़ी की विषम गिनती चलायमान थी। जेब से रूमाल निकाल नाक पोछते जाते ! खाते जाते। अंततः वो घड़ी आ ही गई जब डकार ले विराम लगाया। उठ कर हाथ धोया और रूमाल से हाथ नाक पोछते हुए फिर उसी सीट पर टिक कर वेटर को हिसाब बताने कहा।

छूटते ही वेटर बोला-‘ सत्तर कचौड़ी और अड़तालीस जिलेबी ।‘ उस वेटर की गिनती सुन आश्चर्य हुआ कि एकदम सही जोड़ जोड़ा इसने । इस विषम गिनती को बिना लिखे बता पाना कठिन था । लेकिन मेरे आश्चर्य की सीमा तब और बढ़ गई जब उन्होंने उसे हिसाब ठीक से जोड़ने को कहा । और कहते हुए बोलें कि पहले दो जगह चार-चार कचौड़ी और तीन-तीन जिलेबी दिया फिर एक ही जगह। इस तरह करीब आधा घण्टा हुज्जत करने के बाद अंततः उन्होंने साबित कर दिया कि कुल पैंतीस कचौड़ी और चौबीस जिलेबी ही हुई । और पैसे चुकता करते हुए वेटर को नसीहत दी-‘ गिनती सीखो प्यारे।’ और उसके सिर पर हाथ फेर दुकान से उतर गए। मैं अवाक था कि वेटर की सही गिनती को किस अदा से झुठला दिया इस शायर ने । मुझे अवाक खड़ा देख उन्होंने आवाज दी – ‘और खाने का इरादा है ?’ तब मेरी तंद्रा टूटी।

मान गए उस्ताद के मेरे व्यंग पर मुस्कुरा कर पान की दुकान पर जा जमे। ‘अब छोड़े जगजीवनानुभव प्रसंग’ – मेरे किस्से से ऊब कर बोले लेखक – ‘ चले अंदर ‘। ‘कहाँ ? मैने पूछा – ‘कजीब्बा के यहां’ – वे बोले।

अच्छा, प्रकाशक पति के प्रकाशन ! भूगोल की किताब पर इतिहास का कवर लगा विश्विद्यालय में सप्लाई करने वाला प्रिंटर। सैंकड़ों लोगों से घिघिया कर कर्ज ले पचा जाने वाला प्रकाशक पति । मतलब के लिए गधे को भी बाप बना लेने वाला प्रकाशक  और बाप को….. !’

‘किस्सों का भूत सवार हो गया क्या आज !  छोड़िये भी किस्सा अब’ – खीझते हुए टोका उन्होंने और मुड़ते हुए बुदबुदाए ,- ‘चलिए अंदर। कहानियाँ मैं लिखता हूँ और आप मुझे सुनाने चले हैं कहानी…हद हो गई।’

और हमलोग उस दे दे मार्केट के चोरवा प्रिंटर की दुकनवा तरफ बढ़े..

मानी… भिक्षा प्रकाशन। किस्सागोई जारी है…


वीरेन नन्दा।  बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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