सांकेतिक तस्वीर- साभार अमित

वीरेन नंदा

किस्सागोई के पहले अंक में आपने पढ़ा पति-पत्नी के बीच की मीठी नोकझोंक जिसमें प्यार भी रहता है और टकराव भी । कैसे जब एक दोस्त का फोन आता है तो पत्नी-पत्नी के बीच कटाक्ष शुरू हो जाता है, फिर भी दोस्त के साथ जाने के लिए पति घर से निकल पड़ता है और और फिर दोनों छोटी कल्याणी के लिए चल पड़ते हैं । वीरेंद्र नंदा की किस्के के इस अंक में पढ़िए बाजार में दोनों के बीच क्या कुछ चर्चा होती है।
वीरेंद्र नंदा के किस्से पार्ट-2
 रिक्शा चल पड़ा। सोंच रहा था कि नित्य की भांति हाथी चौक पर ‘द्रव्य’ दुकान के सम्मुख रिक्शा रूकवाएंगे। मेरी ओर दांत निपोड़ कहेंगे- ‘आप लेंगे ‘ ? लेंगे का सीधा मतलब होता-दाम देंगे ? मेरी स्वीकृति पर उनकी आंखें चमक उठती। एक पउआ खरीदता और आधा-आधा हमलोग गटक लेते ! फिर खुद वे एक खरीदते ! आधा गटक शेष को जलमग्न कर बैग में डालते और पनबट्टा निकाल पान का बीड़ा मेरी ओर बढ़ा एक अपने मुँह दबाते। फिर हम दो दीवाने रिक्शे पर जा बैठते। और यदि कभी इनकार कर देता तो गमगीन मुद्रा में अपने उसी चिरपरिचित काले बैग का चेन खोलते, हाथ डाल रुपल्ली टटोलने का अभिनय करते, कभी पैंट के दायीं तो कभी बायीं जेब में हाथ डालते ! पुनः बैग का दूसरा चेन खोल ढूंढने का यत्न करते मुझे कातर निहारते। मुझे निर्लिप्त देख अंततः बीस का नोट ‘काढ़त निकसे प्राण’ की तरह निकाल कातर स्वर में पूछते- ‘ बीस रुपये है क्या ? कल लौटा दूंगा ‘। आज तक तो कभी लौटाए नहीं लिए पैसे ! सदा का यह नाटक देख खीझ उठता और कभी कभी गुस्से में रिक्शे से उतर एक पउआ खरीद देता।
दुकानदार दो गिलास निकालता। फिफ्टी-फिफ्टी तरल गिलास में उड़ेल पानी मिलाकर हमारी तरफ सरका देता। एक झटके में वे गिलास खाली कर मुँह बिचकाते और अपने बैग से पनबट्टा निकाल पान मुँह में दबा एक मेरी ओर बढ़ा देते। मैं भी आचमन कर पान दबा रिक्शे पर जा बैठता। लेखक महोदय तब भी द्रव्य की दुकान पर ही खड़े रहते। मुझसे आंखें चुरा धीरे से सौ का नोट दुकानदार को बढ़ाते और एक पउआ ले आधा सटक सीताराम कर शेष में पानी डाल ढक्कन बन्द कर मेरी ओर कनखियों से देखते हुए उसी ऐतिहासिक बैग के हवाले करते। दूसरा चेन खोल पनबट्टा निकाल मुँह में पान डालते और काली जीभ से अंगुली से निकाले गए चूना चाट रिक्शे पर आ बैठतेे। रिक्शा चल पड़ता तो यह पूछने – ‘ अभी तो आप बीस ही रुपये होने की बात कह रहे थे तो सौ का नोट किस टेट से निकल आया ‘ ? – पर साफ झूठ बोलते कि उधार लिया है। जबकि सच्चाई यह थी कि कोई दुकानदार उधार देता ही नहीं इन्हें ! घर के पड़ोस वाला किराना दुकानदार भी नहीं !
मोहल्ले के पास संजय किराना वाला एक दिन लल्लू पान वाले की दुकान पर उन्हें उधार देने का रोना रोते हुए कह रहा था कि आप के मित्र तीन हजार का सामान ले गए ! तीन महीना दौड़ाने के बाद इलाहाबाद बैंक का एक चेक थमा दिया। तीन महीने से बैंक का चक्कर काट रहा। अंत में बैंक वाले ने बताया कि साल भर पहले से इस खाता में राशि नहीं है। घर पर तगादा करता हूँ तो कहलवा दिया जाता कि दिल्ली गए हुए है। ऐसी जोरदार साख है इस कामरेड लेखक की ! खैर…
और जब कभी तरल शॉप के सामने रुपये देने से इनकार करता कि ‘आज नहीं है’ के बहाने के साथ तो वे कुछ देर उसी चिर परिचित मुद्रा में काले बैग से भिड़ते और अंततः पसीजता न देख अपनी हिप हॉप जेब से नोट निकाल खरीदते, गटकते, पान दबा तमतमाते हुए रिक्शे पर आ बैठते ! न आचमन को पूछते ! न पान बढ़ाते ! न किस्सों का पिटारा ही खुलता ! और मैं मन्द मुस्कान तले मधुर आनंद के हिचकोले खाता रिक्शे के साथ- संग । जारी………

वीरेन नन्दा।  बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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