सांकेतिक चित्र

वीरेन नन्दा

किस्सागोई के के तीसरे अंक में आपने पढ़ा किस तरह कवि- कहानीकार दोस्तों ने शहर के एक मशहूर पूड़ी-जलेबी की दुकान में छक कर पूड़ी-जलेबी खाने का आनन्द लिया और वेटर द्वारा 70 पूरी, 48 जलेबी की गिनती को  गलत बता कर ( हालाकि वैरे का हिसाब बिल्कुल  सही था  ) कवि जगजीवन जी ने उसे 35 कचौरी और 24 जलेबी का भुगतान कर,  ‘ गिनती सीखो प्यारे’  की मूल्यवान सीख देकर उसके माथे पर प्यार से हाथ फेरते  हुए दोस्तों के साथ दुकान से बाहर निकल गये। दुकान पर पान खाने के बाद कुछ ने अपने घर की राह पकड़ी और वे लेखक के साथ चल पड़े भिक्षा प्रकाशन की ओर और बेहतरीन विशेषणों से भिक्षा प्रकाशन के मालिक का गुणगान करते दोनों दोस्त।

भिक्षा मांगना इसकी किस्मत नहीं, फितरत थी। एक नंबर का कर्जखोर और क्या पाचन शक्ति पाई है इस लाला ने । जिससे भी लिया, लौटाने में नानी मर गई। न जाने कितनी बार मारा नानी को, गिनती नहीं। नानी के मरने का बहाना बना न जाने कितने महाजन को टरकाया। कर्ज का यह गुर ‘सूम की थैली’ की तरह थी। एक बार लिया तो स्वान भग की तरह अपने तशरीफ़ में डाल लेता और फिर क्या मजाल कि निकाल, लौटा दे । टरकाते-टरकाते जब कभी लौटाने की घड़ी आ ही जाती-किसी के लपड़ियाने, थपड़ियाने पर, या फिर लाठी से हुमचाने पर आमादा हो जाता कोई महाजन, तो ‘काढ़त निकसे प्राण’ की तरह लौटता। चेहरा लटक जाता- तू क्या था और क्या हो गया की तरह। कर्ज को हरामखोरी की तरह विकसित कर लिया था। यह लत उसे लगी थी कि बाप से विरासत में मिली, ई हम नहीं जानते । आप में से कोई जाने तो हमें भी जनाये जरा।

सुनते हैं कि भिक्षा प्रकाशन जब खोला था, तब एक बिचारे मिसर जी को फ़ांस पार्टनरसीपी (पार्टनरशिप) में शुरू किया था। एक बार मिसर जी ने अपनी एक किताब वहीं से छपवायी तब उसका मूल्य कजिब्बा ने उतना ही बताया जितना उन्होंने उस प्रकाशन में पूंजी लगाई थी और कर दिया चलता- हिसाब बराबर कह कर। बाप भी कम कटकाजी नहीं होगा, इसकी ठगी को पुचकारा होगा तभी न यह संस्कार उसकी घुट्टी में समाया और देखिए तो ! अपना छोटका भाई नरैना को ड्राइवर से कुछ ज्यादा ही मानता। हर जगह हरकाय रहता और वो मुँह लटकाये हरवाही करता हलकान। इसीलिए हर वक्त उसके मुँह पर बारह बजता रहता। उसने – उसकी हँसी छीन ली हो जैसे। ठगैती कर-कर के, कर-कर के, कर-कर के जब से सेकंड हैंड गाड़ी झपटी, भइवा को डराइवरवा बना छोड़ा। अपने पिच्छे बैठता और भइवा को अगारी। डराइवरी करने। कहीं किसी दिन इसको भी बाहर का रस्ता न दिखा दे, मिसिर जी लेखा ! इसकी चिंता मुझे खाय जा रही। काहे कि प्रकाशन की मालकिन अपनी जोरू सरौता देवी को बनाये हुए है। सब चेक ओहि काटती है। खैर…

 लेखक संग भिक्षा प्रकाशन जाने क्रम में इनदिनों जरूरत से ज्यादा आवभगत करता मेरी। खटाखट चाय-चू कराता। पान का बीड़ा उठाता और हम दोनों खिल्ली। एक दिन चाय-चू पश्चात खिल्ली उड़ाते लेखक ने उससे कहा-

‘क्या शाम के बखत गर्म पिलाते हैं, अरे ठंढा-ठुंडी का इंतजाम किया करें।’ – सुनते ही झट उसने दो थम्सअप मंगवा दिया। लेखक व्यंगपूर्ण मुझे निहारते हुए गर्दन मोड़ी और उससे कहा- ‘अरे ठंडा तो मंगवा दिए लेकिन इसमें मिलाने वाला कहाँ है ?’

‘समझा नहीं – नहीं समझने का उपक्रम किया उसने। गर्मी के कारण थम्सअप पी मैं बाहर निकल आया। कुछ देर बाद लेखक बाहर आए तो बताया कि आखिर मंगवाया न उससे और उसी चिरपरिचित काले बैग से किला फतह की तरह पउआ निकाल उसे लहराया।

एक आध महीने बाद एक दिन भिक्षा प्रकाशन गया। जब और कोई उस के पास नहीं था तो मुझसे एक लाख रुपये की जरूरत बतायी। मैनें उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसकी बात सुन लेखक ने मेरी ओर देखा और फिर प्रूफ देखने लगे। फिर दूसरे दिन भी वही बात। मैनें अक्षमता व्यक्त किया। तब एक दिन मेरे घर पहुँचा और घिघियाते हुए कहा – ‘सर, एक लाख रुपये की सख्त जरूरत है।’

‘इतने रुपये मेरे पास नहीं हैं, यह बात तो बता चुका हूँ”- उससे कहा।

‘कहीं से उपाय कर दीजिए’ – मेरा उत्तर सुन बोला।

इनकार करने पर गिड़गिड़ाने लगा तो मैनें कहा – ‘इतनी बड़ी राशि कहाँ से लाऊंगा, मेरे पास कोई कारू का खजाना है क्या ?’

‘आप चहिएगा तो करवा दे सकते हैं’ – मेरी दो टूक बात पर घिघियाती हँसी हँसते बोला ।

‘मेरे चाहने से थोड़े ही न हो जायेगा, कोई पेड़ है कि तोड़ा और दे दिया’ – कहकर टालने का उपक्रम किया। किन्तु वो चमरचीट की तरह टसकने का नाम ही न ले रहा था।

‘कहीं से ब्याज पर ही दिलवा दीजिए, आप का आजीवन अहसान रहेगा। बहुत जरूरी है। मेरी इज्जत चली जायेगी एक लाख के लिए’ – उसकी आवाज भर्राने लगी थी, फिर कातर स्वर उभरा- ‘लेखक जी ने कहा है कि आप चाहे तो करवा दे सकते हैं।’

‘अच्छा देखते हैं’ – कह के किसी तरह उस दिन पीछा छोड़ाया।

उसके बाद तो दूसरे दिन, तीसरे दिन, चौथे दिन…. लगातार धमकता रहा। भिक्षा प्रकाशन हमलोग पहुंचते तो वहाँ भी वही लाख रुपये की रट। लेखक ने भी मुझसे कई बार कहा।लेकिन उनकी बातों का क्या, वो तो न जाने कितनी ही बार क्षुद्र राशि ले क्षुद्रता की पराकाष्ठा दिखलाई। उनकी बात पर भरोसा करने जैसी बात तो थी नहीं कि उनके कहे दे-दिलवा देता, टालता रहा।

एक दिन मुशहरी बैंक में बैठा था कि कजिब्बा वहाँ भी धमक गया और रुआंसा चेहरा लिए दे दाता के राम माफिक लोटने लगा। मेरे लाख समझाने के बावजूद उसका रुदन और गिड़गिड़ाना नहीं रुका तो मैं उसे बैंक से बाहर ले जाकर कहा कि अभी आप जाए, मैं देखता हूँ। इस तरह ग्रह को टाला। किन्तु इस ग्रह को तो टलना नहीं था। उसके जाते ही एक लहना कारोबारी बैंक में डिपाजिट हेतु घुसा। और सलाम करते हुए काउंटर की तरफ बढ़ा। जब उसने डिपाजिट कर लिया तो इशारे से उसे बुलाया। सामने कुर्सी पर बैठा तब उससे हाल-चाल ले कारोबार के बारे में पूछा। उसके बाद मूल प्रश्न पर लौटा –

‘आप कितना परसेंट ब्याज पर रुपये लगाते हैं ?’

‘दस परसेंट, मगर आप क्यों पूछ रहे ?’ – उसकी आँखों में आश्चर्य था।

‘नहीं, यूँ हीं’ – कह कर टाला।

‘आप को जरूरत हो तो तिने परसेंट पर दे देंगे सर, कभी खिदमत का मौका तो दीजिए’ – उसकी लहनेदार बुद्धि ने कमाई के राह टटोली। अच्छा कह कर उसे विदा किया।

शाम घर लौटा तो अभी हाथ मुँह धोकर चाय पी ही रहा था कि उसके स्कूटर के रुकने की आवाज आयी। पत्नी से कहलवा दिया कि बोलो अभी बैंक से नहीं लौटा हूँ। वो लौट गया। तैयार होकर बाहर निकल ही रहा था कि फिर धमक गया। मरता क्या न करता ! उसे बिठाया तो फिर उसकी वही जिद –

‘सर, काम करवा न दीजिए।’

‘बात किया हूँ….’ – यह बोलते हीं उसकी बाँछे खिल उठी, बोला – ‘तो कल हो जाएगा ?’

नहीं, अभी पूछा हूँ और ब्याज समझ लीजिए, वो दस परसेंट ब्याज पर देता है ….’ – खुशी उदासी में परिणत कर मेरी बात काटते बोला – ‘इतना ब्याज तो बहुत ज्यादा है, …चार पांच परसेंट पर हो जाये तो राहत होगी।’

‘पहले पूरी बात सुनिए….अभी केवल पूछा है, कल बात करूंगा’ – कह के विदा किया।

 दो-तीन दिन लहनेदार दिखा नहीं। शाम उसके प्रकाशन जाता नहीं तो कजिब्बा धमक जाता। कभी बैंक तो कभी घर। उसका गिड़गिड़ाना और निरीहता देख मन पसीजने लगा था। दूसरे दिन भी जब वह लहनेदार नहीं आया तो बैंक से निकलते समय उसके घर पहुँचा। किन्तु वो मिला नहीं, मालूम हुआ कि लहना वसूलने निकला हुआ है। कल बैंक आकर मिलने का संदेश छोड़ लौट आया। अभी गाड़ी पार्क ही कर रहा था कि दैत्य की तरह घर आ धमका काजीब। देखते हीं इतनी खीझ हुई कि बिगड़ कर उसे वहीं से लौटा दिया। कल फिर जब बैंक पहुँचा तो देखा लहनाबाज बेंच पर बैठा है। उससे बातें हुई। तीन परसेंट पर एक लाख देने को तैयार हो गया। उसने बताया कि ऐसे तो सोना, चांदी या जमीन बंधक रखे बिना तो देता नहीं, लेकिन आप बैंक के हाकिम हैं इसलिए आप की जुबान ही काफी है। बस ब्याज एक के एक मिल जाए हाकिम तो मेहरबानी। और खींसे निपोड़ते हुए बोला – ‘लेट होने पर दस परसेंट।’

संध्या घर लौटा तो लेखक का फोन बजा। उधर से आवाज गूंजी कि कई दिनों से दिख नहीं रहे और न फोन उठ रहा आप का। उधर कजिब्बा मेरा घर खोदे हुए है। उसका काम काहे न कर देते हैं। उन्हें बताया कि बात की है। इस बात पर उन्होंने कहा कि चलिए न प्रकाशन। प्रूफ भी लेना है। मैनें मना कर दिया तो कुछ देर बाद तैयार होकर पहुँच गए और आवाज देने लगे। अंततः निकलना पड़ा। रिक्शा ले जब चल पड़े तो लेखक फिर उसकी पैरवी करने लगे। इस पर मैनें पूछा –

‘उस पैसे की क्या गारंटी है ? नहीं देगा लौटाया तब ?’

‘हम हैं न, और फिर हमारे कप्तान साहेब हैं न ! चार सोंटा चुत्तर पर दिलवाएंगे कि झट से …देगा।’ – उन्होनें अपनी शेखी बघारी। रिक्शा हाथी चौक पर के तरल शॉप पर रुक चुका था। फिर वही चिरपरिचित काली बैग, फिर वही चेन खोल-खाल के रुपये की खोज। कातर निगाहें। बीस रुपये की डिमांड। तरल, आचमन और मुँह में पान कोंचते हुए भिक्षा प्रकाशन। बीस रुपये हेतु नौटंकी करने वाला सख्स एक लाख की गारंटी बता रहा। प्रकाशन पहुँचा तो वो चाय मंगा खुशी जाहिर की। उसके पूछने पर काम हो जाने की हामी भरी। यह सुनते ही लेखक ने कजिब्बा को लपका –

‘अब क्या है ! कुछ खर्चा-पानी कीजिये….ठंडा गरम हो।’ – और उसने तरल मंगवा धीरे से उनके बैग में सरका दिया। चलने को हुए तो प्रफुल्लित हो उसने पूछा कि कल मिलूँ क्या? मैनें हामी भरी।

दूसरे दिन लहनेदार से एक लाख टका ले लौटा तो मालूम पड़ा कजिब्बा आ कर लौट चुका था। हाथ-मुँह धो लेखक को फोन लगाया –

‘चलेंगे भिक्षा प्रकाशन ?’

‘बाट ही जोह रहा था कविवर। आया था वो, न मिलें आप तो यहाँ आ के बैठा रहा। अभी पाँच मिनट पहले गया है, मुँह लटकाये।’ – उन्होंने कहा।

हम दोनों हाथी चौक रुक कर चरणामृत ग्रहण करते प्रकाशन पहुँचे। देखते ही खड़ा हो गदगद भाव से नमस्कार किया। बैठें तो झट ठंडा का ऑर्डर दिया। इस बात पर लेखक थोड़ा तन कर साधिकार उससे मुखातिब हुए –

‘आप का काम कर दिया कविजी ने, आज खाली ठंडा नहीं गर्म भी मंगवाये। और वो भी छोटका नहीं, पूरा खंबा !’

 

लेखक की बात सुन वह कुर्सी छोड़ बाहर निकला और तुरंत मुस्कुराते हुए वापस लौटा। लहनेदार से लाये एक लाख रुपये उसे देते हुए उसकी सब शर्तें फिर से दोहरा दी कि छह माह की शर्त पर दिया है और ब्याज मंथली देना है। छः माह में नहीं लौटा तो दस परसेंट से लेगा। मेरी हर बात पर हाँ में हाँ करता मुंडी हिलाता रहा और समय से ब्याज और मूल चुकता करने की कसम खायी। रुपये दे-दिला के जब वहाँ से चलने के लिए उठा तो लेखक ने प्रश्नवाचक हो उसकी ओर देखा और हाथ टेबल पर खड़ा कर खम्बा का इशारा किया ! उसने हँसते हुए बताया कि बाहर रखा है, ले लीजिए। झट कुर्सी छोड़ बाहर निकले तो उसका आदमी अखबार में खम्बा सी आकृति को लपेटे लेखक की ओर बढ़ाया। जब रिक्शा पर हमलोग आलुढ़ हो बढ़े तो लेखक ने हँसते हुए कहा –

‘बहुत पैसा लेता है पत्रिका छपाई का, कुछ तो ढीला करवाया स्साले से।’

इन्हें तो दारू नाम केवलम ही दीखता है। उनकी बातों में न रुचि लगी न मन, मन में तो मंथन चल रहा था कि कर्ज लेकर कर्ज देना, कहीं महंगा न पड़ जाए।

किस्सागोई जारी है….


वीरेन नन्दा/ बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति समिति के संयोजक। खड़ी बोली काव्य -भाषा के आंदोलनकर्ता बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री पर बनी फिल्म ‘ खड़ी बोली का चाणक्य ‘ फिल्म के पटकथा लेखक एवं निर्देशक। ‘कब करोगी प्रारम्भ ‘ काव्यसंग्रह प्रकाशित। सम्प्रति स्वतंत्र लेखन। मुजफ्फरपुर ( बिहार ) के निवासी। आपसे मोबाइल नम्बर 7764968701 पर सम्पर्क किया जा सकता है।