एम अखलाक

कारोबारी मीडिया का राष्ट्रवाद पनछुछुर है। इसका राष्ट्रवाद आर्थिक गलियारों से होकर गुजरता है। इस राष्ट्रवाद में मुगालते और गलतफहमियां हैं। इस पनछुछुर राष्ट्रवाद को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है। यह कहना है मीडिया विशेषज्ञ और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक विनीत कुमार का। वे रविवार को बिष्टुपुर स्थित चैंबर ऑफ कामर्स सभागार में दस्तक की ओर से आयोजित पत्रकार विनय तरुण स्मृति व्याख्यान में ‘मीडिया का राष्ट्रवाद’ विषय पर बतौर मुख्य वक्ता अपनी बात रख रहे थे।

‘मंडी में मीडिया’ और ‘इश्क कोई न्यूज नहीं’ पुस्तक के लेखक विनीत ने कहा कि राष्ट्रवाद और मीडिया को देश एक बार फिर समझना चाहता है। मीडिया हर दिन राष्ट्रवाद के नए-नए संस्करण पेश कर रहा है। सबसे पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि मीडियाकर्मी का राष्ट्रवाद कैसा होना चाहिए। इसकी एक झलक विनय तरुण की पत्रकारिता और समाजसेवा में नजर आती है। मीडिया की ओर से पेश किए जा रहे राष्ट्रवाद के नए-नए संस्करणों में दर्शक-श्रोता व पाठक किस राष्ट्रवाद के साथ खड़े हों, यह बड़ा सवाल है। किसी चैनल की ओर से प्रस्तुत राष्ट्रवाद के साथ या राष्ट्र कवि रवींद्रनाथ टैगोर के साथ, जिन्होंने भारत और बांग्लादेश दोनों के राष्ट्रीय गीत लिखे हैं।

इस मुद्दे पर मीडिया के बिजनेस पैटर्न को समझने की कोशिश होनी चाहिए। क्या मीडिया अपने राष्ट्रवाद से एक आदमी को और बेहतर आदमी बना पा रहा है। न्यूजरूम से जो राष्ट्रवाद पैदा हो रहा है, वह आदमी को केवल एक ढांचे के रूप में ही रहने दे रहा है। देश की हिन्दी पत्रकारिता की पैदाइश देशभक्ति से हुई, राष्ट्रवाद से नहीं। इसका मतलब है कि हमें अपने देश से स्वाभाविक लगाव है और इसमें आलोचना भी शामिल है, ताकि हिंदुस्तान का सामाजिक ढांचा और मजबूत हो। राष्ट्रवाद एक वैचारिक मुद्दा है, लेकिन इसको सांस्थानिक रूप देने की कोशिश हो रही है। राष्ट्रवाद बहुत खूबसूरत चीज है, इसमें सबकुछ समाहित है। आज के परिवेश में राष्ट्रवाद की छतरी के नीचे नित नई-नई चीजें जो शामिल की जा रही हैं, उनकी शिनाख्त होनी चाहिए कि ये चीजें देश को किस तरह की उन्नति देंगी?

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा कि राष्ट्रवाद शब्द ही गलत है। अमेरिका में सबसे पहले यह शब्द आया। मीडिया में तो हमें यह चयन करना है कि हमें क्या देखना है। बस्तर में राष्ट्रवाद का क्या मतलब है। भारत कभी राष्ट्रवादी रहा ही नहीं। चंद्रगुप्त क्या राष्टवादी थे? अशोक को कलिंग की लड़ाई के लिए जाना जाता है, बौद्ध हो गए। पृथ्वीराज चौहान को देखें। आज के परिवेश में हम मन की बात सुन तो पा रहे हैं, पर मन की बात कह नहीं पा रहे हैं।

व्याख्यानमाला को दैनिक जागरण जमशेदपुर के संपादकीय प्रभारी चंदन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार रंजीत प्रसाद सिंह, मनोरंजन सिंह, राधेश्याम अग्रवाल, जय प्रकाश, देवेन्द्र सिंह ने भी संबोधित किया। इसके पूर्व सभागार में मौजूद तमाम लोगों ने विनय तरुण को श्रद्धांजलि अर्पित की। विनय के साथियों ने अपनी-अपनी यादों को साझा किया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश्वर पांडेय ने किया जबकि दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार एम. अखलाक ने विषय प्रवेश कराया।


एम अखलाक। जमशेदपुर के दैनिक जागरण में वरिष्ठ पद पर कार्यरत एम अखलाक कला-संस्कृति से गहरा जुड़ाव रखते हैं। वो लोक कलाकारों के साथ गांव-जवार के नाम से बड़ा सांस्कृतिक आंदोलन चला रहे हैं। उनसे 09835092826 पर संपर्क किया जा सकता है।

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