विकास मिश्रा

1982 में आई थी फिल्म ‘नदिया के पार’। तब मेरी उम्र 12 साल की रही होगी। गाना सुपरहिट था- ‘सांची कहे तोरे आवन से हमरे, अंगना में आई बहार भौजी।’ मैं भी बड़की भौजी को ये गाना सुनाया करता था। अंगना में बहार की तरह ही तो थीं भौजी। मुझे स्कूल भेजने, स्कूल से लौटने के बाद मेरे कपड़े-जूते-चप्पल व्यवस्थित करना, खाना खिलाना, दिद्दा-अम्मा के हाथों से फिसलकर भाभी के हाथों में आ गया था। यहां तक कि स्कूल जाते वक्त मेरे सिर पर कंघी भी वही करती थीं, वरना मैं तो बिना कंघी किए चला जाता। स्कूल से आता तो पैर से जूते उतारता नहीं था, पैर से ही फेंक देता था। एक जूते से दूसरे जूते के बीच फासला कई बार 20 मीटर का भी हो जाता था। भाभी सब व्यवस्थित करती थीं। मां से भी ज्यादा प्यार-मान भाभी के लिए था, क्योंकि मां तो पीटती भी थी, भाभी तो पिटाई से बचाती भी थीं। 

भाभी सिर्फ मेरी ही भाभी नहीं थीं, बड़े भइया से छोटे हम सभी की, भइया से छोटे गांव के सभी लड़कों की भाभी थीं। उनकी एक आवाज पर सारे लड़के हाजिर। भाभी पापड़ बनातीं तो ये पूरी फौज, उसे सुखाने के इंतजाम में लग जाती। दिवाली पर भाभी दीये तैयार करतीं, देवर उसे दीवारों और कमरों में सजाते। देवरों में भी तो होड़ लगी रहती थी कि कौन भाभी का सबसे दुलारा है। भाभी के ये देवर बड़े खुराफाती भी थे। भाभी को दिलोजान से मानते थे, तो उन्हें परेशान करने में भी पीछे नहीं रहते थे। मेरी बड़ी भाभी को मेंढक से बहुत डर लगता था। गांव में हमारे कहार काका के बेटे पारस भाई ने कुछ छोटे-छोटे मेंढकों को पकड़ा, उनके पैर एक धागे में बांध दिए, भाभी आंगन में बैठी थीं, पीछे से उनके गले में मेंढकों की माला पहना दी, उसके बाद भाभी जो चिल्लाईं, भागीं। सभी देवर डर गए, क्योंकि ये कुछ ज्यादा ही हो गया था। 

देवर भाभी के रिश्ते जो हम लोगों ने जीये हैं, शायद आज की पीढ़ी को नसीब नहीं। आजकल तो लोग खुद अपनी पत्नी के साथ ससुराल जाते हैं, वहां के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। गांव में इसे अच्छा नहीं माना जाता था। लोग ससुराल भी बहुत कम ही जाते थे। गांवों में कहावत थी- ‘मरदा मनइया सीमा पर सोहे, मउगा मरद ससुरारी में।‘ भाभियों की शान तो देवर के साथ मायके जाने में होती थी। देवर भी फौरन तैयार। मैं कई बार अपनी भाभियों को लेकर उनके मायके जा चुका हूं। एक जिम्मेदारी का एहसास, ऊपर से ससुराल जाने की खूबसूरत कल्पना। भाभी के मायके में हमारा मान भइया से कम नहीं, बल्कि उनसे ज्यादा होता था। भइया की सालियों से चुहलबाजी, हंसी-मजाक। किसी में ‘गुंजा’ देखने और खुद को ‘चंदन’ समझने का एहसास…। 

देवर-भाभी के इस रिश्ते में सिर्फ हमारे घर में मौजूद भाभियां ही नहीं थीं, गांव में भी तमाम भउजाइयां थीं। तेज तर्रार भउजाइयां अलग लिस्ट में थीं। जिनके लिए गांव के लड़के होली पर खास टारगेट फिक्स करते थे। गांव की कई भउजाइयां तो इतनी मजबूत थीं, कि उन्हें रंग लगाने अगर एक या दो लड़के चले गए तो वो खुद उन्हें पटककर रंग में नहला देतीं। तो पहले से तय हो जाता था कि किस भउजाई को रंगने के लिए कितने देवरों की फौज जाएगी। गांव की होली में देवर और भउजाइयों में पटका पटकी हो जाती थी। कभी देवर पटकाते, कभी भउजाइयां। होली के दिन सुबह सुबह गांव के हमारे काका-चाचा लोग मेरे घर पहुंच जाते थे। दरवाजे पर ही मां के लिए कबीरा गाते, भीतर से अम्मा पूरी बाल्टी में रंग भरकर सबको नहलाती थी, गांव में उसके बाद ही होली शुरू होती थी। 

हाई स्कूल के बाद से ही घर से बाहर पढ़ने के लिए चला गया। बनारस रहा या इलाहाबाद। होली से पहले ही घर का कार्यक्रम तय हो जाता था। हम सिर्फ़ इस नाते नहीं जाते थे कि होली भाभियों के साथ ही अच्छी लगेगी, इस नाते भी जाते थे कि होली पर अगर हम लोग नहीं जुटे तो भाभियों को अच्छा नहीं लगेगा। देवर-भाभी में छोटे-मोटे झगड़े भी होते थे, लेकिन होली के रंग में वो भी धुल जाते थे। हमारे एक भाई साहब की एक भाभी से बिगड़ गई थी। मुझसे बोले कि उन्हीं की वजह से होली में घर नहीं जाएंगे। मैं गांव पहुंचा, भाभी से बोल दिया कि भइया नहीं आएंगे। देख क्या रहा हूं, दो दिन बाद भाई साहब पधार गए। यही नहीं उन्हीं भाभी से बोल रहे हैं-‘ भाभी बस आपके लिए ही आया हूं।’ 

भाभियों को देवरों पर अपने पतिदेव से भी ज्यादा भरोसा रहता था। पतिदेव का क्या भरोसा, क्या पता कि कुछ कहो तो भूल जाएं, लेकिन प्रतिबद्ध देवर के लिए तो भाभी फर्स्ट। मेरे बाबूजी बताते हैं कि एक बार वो बनारस बड़े बाबूजी (डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी ) के पास गए। तो घर में बड़की माई बड़े बाबूजी के साथ गंगा नहाने जाने की मनुहार कर रही थीं। बड़े बाबूजी को कहीं जाना था, वो मान नहीं रहे थे। जैसे ही मेरे बाबूजी पहुंचे, बड़की माई ने बड़े बाबूजी को ताना मारते हुए कहा-जाईं आप जहां जाए के बा, हम्में त साथे जाए खातिर मर्द चाहत रहल, आ गइल हमार देवर, उहै गंगा नहवाई।

भाभियां देवरों की सबसे बड़ी राजदार होती थीं और देवर भाभियों के राजदार। देवर भाभी का बड़ा बेटा ही नहीं दोस्त भी हुआ करता था। घर में शादी की बात चलती थी, तो देवर को अपनी भाभी जैसी ही पत्नी चाहिए होती थी। देवर अपनी प्रेम कथा भी भाभियों को ही सुनाया करते थे। मैंने इलाहाबाद, बनारस और दिल्ली में पढ़ाई की, फिर नौकरी। बरसों तक हर 15 दिन में भाभियों की चिट्ठियां आ जाती थी, प्रिय बाबू.. खूब खुश रहिए…. आखिर में ढेर सारे प्यार और आशीर्वाद के साथ आपकी भाभी। तब फोन का दौर नहीं था, चिट्ठी मिलते ही जवाबी चिट्ठी तैयार होती थी। 

अब देवर भाभी के रिश्तों में उतनी मिठास मैं नहीं देखता, जो हम लोगों ने देख रखी है। एकल परिवारों, महानगरीय संस्कृति में रिश्तों में लोग हाथ सिकोड़ रहे हैं। रिश्ते फिसल भी रहे हैं। मुट्ठी जितनी कसी जाएगी, रेत की तरह रिश्ते भी बिखरकर गिरेंगे ही, लेकिन इस मामले में मैं बिल्कुल नहीं बदला हूं। आज भी भाभियों से वैसा ही रिश्ता है। भाभियों का आज भी दुलारा हूं। यही नहीं तमाम दोस्तों की पत्नियां भी मेरी बहुत प्रिय भाभी और मैं उनका प्रिय देवर हूं। कई दोस्त ऐसे हैं जब मैं उनके घर पहुंचता हूं तो मैं किचेन में भाभी का हाथ बंटाता हूं और मेरा दोस्त मेरी पत्नी से गप कर रहा होता है, दोस्त से कम और भाभी से ज्यादा बातें होती हैं, हंसी मजाक चलता है। हमारी अगली पीढ़ी में अभी सिर्फ दो बहुएं आई हैं, जबकि देवरों की संख्या दर्जन भर से ज्यादा है। मैंने जितना जाना सुना है, उसमें देवरों और भाभियों की केमेस्ट्री चकाचक चल रही है। 

विकास मिश्रा।आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ संपादकीय पद पर कार्यरत। इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के पूर्व छात्र। गोरखपुर के निवासी। फिलहाल, दिल्ली में बस गए हैं। अपने मन की बात को लेखनी के जरिए पाठकों तक पहुंचाने का हुनर बखूबी जानते हैं।

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