संदीप नाईक 

मध्यप्रदेश का एक पैरवी समूह जो विकास, कुपोषण , शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर गत 15 वर्षों से प्रदेश में कार्यरत है , प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर एक मीडिया संगोष्ठी करता रहा है जिसमें वह देश भर के पत्रकारों को बुलाकर किसी एक विषय पर फोकस करते हुए चर्चा, बहस और मुद्दों को सामने रखता है। यह उम्मीद होती है कि ये पत्रकार साथी यहां से लौटकर अपने अखबारों , पत्रिकाओं या चैनलों में जाकर इन मुद्दों की पैरवी करें। यह भी कोशिश होती है कि पत्रकार सिर्फ अपने बीट से संबंधित ही नहीं – बल्कि व्यापक स्तर पर अपनी समझ बनाएं और पढ़ें लिखें। ऐसा नहीं कि पत्रकार पढ़े-लिखे नहीं है परंतु अपने दैनंदिन कामों में उन्हें कई बार इतना समय नहीं होता कि वो विभिन्न संदर्भ टटोलकर विश्लेषण करें, मंथन करें या अपने साथियों के साथ बैठकर खुले और मुक्त भाव से चर्चा कर सकें। गत 12 वर्षों से आयोजित होने वाला यह मंथन इस वर्ष गांधी जी के सेवाग्राम जिला वर्धा में आयोजित था। उल्लेखनीय है कि यह गांधीजी का 150 जयंती वर्ष होगा जिसमें सरकार ने घोषणा की है कि इसे धूमधाम से मनाया जाएगा। यह संयोग ही है कि यह कस्तूरबा का भी 70 वां जन्म वर्ष है। विकास संवाद ने अपना बारहवां मीडिया विमर्श अबकी बार सेवाग्राम वर्धा में दिनांक 17 से 19 अगस्त तक किया, जिसमें देश भर से करीब 130 पत्रकारों ने शिरकत की।

गांधी के 150 वर्ष – माध्यम या सन्देश

विकास संवाद का बारहवां आयोजन सेवाग्राम, वर्धा 

निश्चित ही इस तरह के आयोजन बहुत श्रम साध्य होते हैं और इन की तैयारी लगभग 3 से 4 माह पूर्व आरंभ करना होती है। नाम छाँटने से लेकर स्थान का चयन, आरक्षण , सामग्री तैयार करना, वक्ता तय कर उन्हें बोलने के लिए तैयार करना और फिर उन सब को निमंत्रित करना। विकास संवाद की पूरी टीम इस काम में अपना समय , ऊर्जा और तन – मन – धन झोंक देती है, तब कहीं जाकर आयोजन असली रंग रूप ले पाता है। इस काम में टीम के साथ – साथ विकास संवाद के साथ जुड़े सहयोगी साथी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए एक बड़ा समूह इस महती कार्य को पिछले 12 वर्षों से लगातार पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता से करता आ रहा है। पत्रकार साथियों ने इसे एक रस्मी आयोजन ना मानकर शिद्दत से अपनी जिम्मेदारी समझकर इसमें शिरकत की है और विकास तथा शिक्षा स्वास्थ्य और कुपोषण से जुड़े मुद्दों को मीडिया की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की है।

यह बात तसल्ली देती है कि हर वर्ष नए साथी इस में जुड़ते हैं और जो नहीं आ पाते वह अपनी टीस बाहर से व्यक्त करते हैं। कितने अफसोस की बात है कि इस तरह के आयोजनों के लिए भी मीडिया संस्थानों में दफ्तर की छुट्टी का प्रावधान नहीं हो पाता। अनौपचारिक बातों में पता चलता है कि कुछ लोग झूठे बहाने बनाकर ऐसे आयोजनों में शिरकत करने पहुंच पाते हैं। युवाओं के सीखने की लगन और बहस करने की भावना को देखा जाना चाहिए जो बहुत स्वाभाविक रूप से प्रश्न पूछते हैं , पढ़ते हैं, बहस करते हैं और जाते समय बहुत भावुक होकर जाते हैं। इस पूरी यात्रा में देशभर के पत्रकारों में एक सार्थक चर्चा हुई है और सामंजस्य भी पैदा हुआ है। वे साल भर अपने मुद्दे शेयर कर चर्चा करते हैं और लगभग पारिवारिक रिश्तों में तब्दील हो चुके इन सम्बन्धों की ऊर्जा हर संवाद में स्पष्ट दिखाई देती है।

एक शिकायत अक्सर सबको रहती है कि समय कम है या सत्र दिन दिन भर के बहुत लंबे और बोझिल हो जाते हैं। कई मित्रों ने औपचारिक रूप से आयोजकों के सामने अपनी बात रखी। यह खुशी की बात है कि सचिन जैन ने इसे स्वीकारा भी है और आश्वस्त किया है कि अगली बार से कुछ समानांतर रूप से चर्चा सत्र और व्याख्यान सत्र आयोजित किये जायेंगे अलग-अलग विषयों पर ताकि सबको आपस में बातचीत और अपनी बात कहने-सुनने का मौका भी मिले।


संदीप नाईक। सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक-विचारक।  सी- 55 , कालानी बाघ, देवास, मप्र , 455001। आप इनसे मोबाईल – 9425919221 या मेल आई डी naiksandi@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

 

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