विकास मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार

शम्स ताहिर खान। हम लोगों के शम्स भाई। हर हिंदी भाषी इनके नाम और चेहरे से परिचित होगा। ये बेहतरीन प्रोफेशनल हैं तो बेहतरीन इंसान भी। इन्हें क्राइम रिपोर्टिंग, क्राइम कवरेज का बादशाह माना जाता है। बरसों से आजतक के क्राइम शो-‘वारदात’ के प्रमुख हैं, लेकिन मेरा मानना है कि शम्स भाई ऑलराउंडर हैं। क्राइम से तो इनकी बस शिनाख्त जुड़ गई। ये अगर मुहब्बत लिखते तो वो भी बेहतरीन लिखते। शायरी करते तो अजीमोशान शायर होते। जिस विषय पर लिखते-बोलते, उसे ही हरा-भरा कर देते।

शम्स भाई से मेरा रिश्ता एक दशक से ज्यादा पुराना है। आजतक में जब पहली बार आया था, तो कुछ भाषा, कुछ स्क्रिप्ट के स्तर पर एक दूसरे से अच्छी जान पहचान हुई। फिर दोनों एक दूसरे के मुरीद हुए। जब भी मेरे शो के एंकर शम्स भाई होते, मैं एंकर लिंक्स बदल देता था, उनके मिजाज के हिसाब से कर देता था। कई बार ऐसा भी हुआ है कि मैंने ये सोचकर स्क्रिप्ट लिखी कि इसका वॉयस ओवर शम्स भाई से ही करवाना है। तब उनकी आवाज के मुताबिक शब्दों में उतार चढ़ाव रखता हूं।

हाल की ही बात है। देहरादून में शहीद मेजर विभूति ढौंढियाल की आखिरी विदाई पर पैकेज लिखना था। मन बहुत खिन्न था, उनकी पत्नी के विजुअल देखकर भीतर से हिल गया, लेकिन क्या करता, कर्म की गति कठोर है। मैंने स्क्रिप्ट लिखी। सोचा नहीं था कि शम्स भाई से वॉयस ओवर करवाऊंगा, लेकिन तभी वो दिख गए। मैंने कहा-अगर पता होता कि आपकी आवाज होगी तो मैं स्क्रिप्ट बदल देता। उन्होंने वायस ओवर किया, पैकेज चला। उनके पास तमाम लोगों के मैसेज आए कि पैकेज देखकर वो अपने आंसू नहीं रोक पाए। शम्स भाई ने वो मैसेज फारवर्ड किए, बोले ये आपकी स्क्रिप्ट का कमाल था, मैंने कहा नहीं, ये आपकी आवाज का कमाल था। सारी रात दोनों लोग अड़े रहे अपनी-अपनी बात पर। मुहब्बत की बातों का फैसला भला जल्दी कहां होता है।

मुझे याद है कि पेशावर में जब आतंकी हमला हुआ था, तो मैंने उस दर्द को महसूस करके पैकेज लिखा था। ये सोचकर कि इसका वॉयस ओवर शम्स भाई से ही करवाऊंगा। शम्स भाई ने उस पैकेज को अपनी आवाज क्या दी, पैकेज की तासीर बदल गई। उसे देखकर कोई पत्थरदिल ही होगा, जिसकी आंखें नम न हो गई हों। यहां तक कि अंजना ओम कश्यप उस शो की एंकरिंग कर रही थीं। पैकेज के बाद जब दूसरा एंकर लिंक उन्होंने पढ़ा तो उनकी आंख भर आई थी। ये जादू है शम्स ताहिर खान की आवाज का। ऐसी तमाम नजीरें हैं। कई बार ऐसी घटनाएं हुईं, जब मैंने अपने शो के लिए उनकी आवाज चुनी। यहां तक कि कई बार मैंने शो का एंकर बदलवाकर उनसे एंकरिंग करवाई। क्योंकि तकाजा शो के साथ इंसाफ का था। शम्स भाई सिर्फ आवाज के ही नहीं लिखने के भी उस्ताद हैं। गजब का लिखते हैं।

एक बार शम्स भाई मेरे सीधे बॉस बने। दरअसल नीलेंदु सर पहले प्रोगामिंग के हेड थे, उनके संस्थान छोड़कर जाने के बाद मैं स्वतंत्र रूप से प्रोग्रामिंग देखता था। कुछ महीने बाद शम्स भाई विधिवत नए प्रोग्रामिंग हेड बने। लंबी चौड़ी टीम थी, उसके साथ शम्स भाई ने पहली मीटिंग की। मीटिंग में बस दो बातें की-पहला-‘टीम के किसी भी साथी को कोई समस्या हो, तो वो सिर्फ टीम के भीतर बात करे, हर समस्या आपस में सुलझाई जाएगी।’ दूसरी बात-‘विकास जी जिस तरह से पहले प्रोग्रामिंग देख रहे थे, वैसे ही देखेंगे। छुट्टी यही पास करेंगे, शिड्यूल वही तय करेंगे।’ हम लोगों का अद्भुत साथ रहा। हालांकि ये साथ ज्यादा दिन चल नहीं पाया। एक-दो महीने के भीतर ही शम्स भाई को दिल्ली आजतक के मुखिया की जिम्मेदारी मिल गई।

शम्स भाई और मेरा एक दूसरे के अभिवादन का तरीका अलग है। वो मुझे देखते ही बोलते हैं-लव यू। मैं पलटकर कहता हूं-लव यू, मोर दैन यू। शम्स भाई की टीम में अख्तर हैं, हैदर हैं, बनर्जी हैं, चौहान हैं, शर्मा हैं … हर शख्स उनका दीवाना है। सिर्फ अपनी टीम के ही नहीं, दिल्ली के सभी न्यूज चैनल्स के क्राइम रिपोर्टर्स के वो हीरो हैं, कई बार सबको एक साथ भी मैंने देखा है। मैंने उन्हें आज तक किसी पर चीखते, चिल्लाते, किसी को डांटते न तो देखा और न ही सुना।

दफ्तर में भी किसी ने अगर उनसे कोई समस्या कही तो पूरी संजीदगी से न सिर्फ सुनते हैं, बल्कि उसे हल करवाने की कोशिश भी करते हैं। पॉपुलर इतने कि तमाम साथी उनकी मिमिक्री भी करते हैं। जो लोग दिल्ली आजतक चैनल में काम करते हैं, उनके लिए तो डबल बोनांजा है। हेड के तौर पर उन्हें शम्स ताहिर खान मिले हैं तो आउटपुट हेड के तौर पर संजीव चौहान। संजीव चौहान जैसा निर्मलहृदय इंसान आप नहीं पाएंगे। शाही घराने से आते हैं, लेकिन इतने विनम्र कि उनकी विनम्रता को सलाम करने को जी चाहे। दूसरों की गलती अपने सिर तक ले लेने वाले हेड। खैर, संजीव चौहान के बारे में फिर कभी, आज तो यूं ही शम्स भाई पर ही कुछ लिखने का मन हो गया था।

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