विभावरी के फेसबुक वॉल से साभार

इलाहाबाद वि.वि. से एम.ए. करके आई एक निम्न मध्यवर्गीय लड़की के बतौर राजधानी के पॉश इलाके में स्थित इस जगह ने मुझे कभी भी इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि मेरी आर्थिक, सामाजिक अथवा लैंगिक पहचान मेरी पढ़ाई में बाधा बन सकती है। एक वि.वि., जैसा इस देश के हर वि.वि. को होना चाहिए।

घर से नियत पैसा आता था, जो मेस बिल और महीने के अन्य ख़र्चों के लिए कभी भी पर्याप्त नहीं होता था। ऐसे में अपना धैर्य बना कर पढ़ाई कर पाने का जज़्बा दिया इस वि.वि. की लाइब्रेरी ने जहाँ की अनगिनत किताबों पर बाक़ी मेरी उँगलियों के निशान गवाह हैं कि उन्हें ख़रीद पाने की हैसियत कभी न थी मेरी…ये जज़्बा दिया यहाँ के शिक्षकों ने जिनके सिखाये पाठ आज भी रौशनी बनते हैं मेरी राह के अंधेरों में…ये जज़्बा दिया इस वि.वि. की छात्र राजनीति ने जिसने हर ग़लत के ख़िलाफ़ बोलना, लिखना और लड़ना सिखाया। मुझे याद आते हैं वे दिन जब सुबह सुबह नाश्ता करके लाइब्रेरी के लिए निकली मैं लंच करने हॉस्टल आती और वापस जाकर डिनर से पहले तक वहाँ पढ़ती। अक्सर एक्ज़ाम के दिनों में डिनर के बाद पढ़ते हुए रात एक-दो बजे तक मुझे भूख लग जाती और ऐसा होता कि किसी से कुछ भी मांगने में संकोची स्वभाव की मैं गंगा ढाबा पर जाकर एक पराठा और चाय उधार मांगते हुए ढाबे वाले भईया से नज़रें भी न मिला पाती लेकिन भईया कभी भी मुझे इस बात का अहसास न होने देते कि लगातार मैं चाय और पराठे उधार ले जा रही हूँ। सामने वाले का ये बड़प्पन जो आपके भीतर आपकी असमर्थता का बोध होने के बावजूद आपको सहजता की हदों में बनाए रखता है उसका नाम है जे एन यू.

मुझे याद आते हैं वे दोस्त जिनकी किताबें आज भी मेरे पास पड़ी हैं…वे दोस्त जिनके दिए shawl आज भी सर्द रातों में उन दोस्तियों की गर्माहट बन जाते हैं मेरे लिए…वे दोस्त जिन्होंने मेस बिल पेंडिंग होने पर मेरे लिए उसे चुकता किया…वे दोस्त जिन्होंने ख़ुदमुख्तार बनने की राह दिखाई…वे दोस्त जिन्होंने नज़ीर पेश की कि मेरी तकलीफ़ें उनकी तकलीफ़ों के सामने कुछ भी नहीं फिर भी वे दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए लड़ रहे हैं…वे दोस्त जिन्होंने सिखाया कि व्यक्ति का हर व्यक्तिगत मसला दरअसल राजनीतिक है और बेशक इसका हल भी।
आपको आपके हक़ देकर न सिर्फ़ अपने बल्कि दूसरों के हक़ों के लिए लड़ना सिखाने वाले इस जज़्बे का नाम है JNU.

मुझे याद आते हैं वे दिन जब मैं प्रेम में थी और प्रियम जब भी दिल्ली आते तो हमारे पास इतना पैसा नहीं होता कि हम खाना खाने के लिए बाहर जा सकें। ऐसे में मैं अपना खाना पैक करते हुए कई बार अपनी डायट से थोड़ा ज़्यादा ही पैक करती ताकि हम दोनों उसमें खा सकें। प्रियम आज भी कहते हैं कि गंगा मेस का क़र्ज़ है हम पर…और मैं कहती हूँ कि ये क़र्ज़ हम जीवन भर उतारेंगे अपने होने में…हम जैसे न जाने कितनों पर ऐसा क़र्ज़ हैं जे एन यू का जिसे उतारने को वे प्रतिबद्ध हैं…ताउम्र. आपके जीवन के नितांत व्यक्तिगत आयामों को उनकी सामाजिक अर्थवत्ता से रु-ब-रु करवाकर आप में आत्मविश्वास भरने वाले भरोसे का नाम है जे एन यू.

मुझे आज भी याद है कि होम ट्यूशन के लिए वसंत विहार के उस महलनुमा घर में क़दम रखते हुए अगर मेरा आत्मविश्वास डगमगाया नहीं था तो वह इस जगह और इसके परिवेश की ही बदौलत जिसने मुझे सिखाया कि इंसान पैसे से बड़ा नहीं होता बल्कि अपनी ज़ेहनियत से होता है और इस ज़ेहनियत के बनने में शिक्षा की अहम भूमिका होती है।
शिक्षा के मायने जो आपको आपके स्व से ही नहीं बल्कि आपके समाज से भी परिचित कराते हैं…शिक्षा के मायने जो आपको यह समझने की ज़मीन मुहैया कराते हैं कि शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ना आपका सामाजिक दायित्व है…इस सामाजिक दायित्वबोध का नाम है जे एन यू.

एक ऐसा वि.वि. जो समाज के हर वर्ग को शिक्षा प्राप्त कर पाने की सलाहियत देता है, जो देश के दूर दराज क्षेत्रों से आये छात्रों को स्पेशल Deprivation Points देता है ताकि वे अकादमिक रूप से अग्रणी शिक्षण संस्थाओं से आये छात्रों के साथ ईक्वली कम्पीट कर सकें और शिक्षा के अपने अधिकार को अवेल कर सकें, एक ऐसा वि.वि. जो एक लड़की और लड़के में सिर्फ़ इसलिए फ़र्क़ नहीं करता कि समाज ने उनके जेंडर रोल निर्धारित कर दिए हैं…एक ऐसा वि.वि. जो हिंदी पट्टी से आये किसी व्यक्ति के साथ सिर्फ़ इसलिए दोहरा व्यवहार नहीं करता कि उसे अंग्रेज़ी नहीं आती…एक ऐसा वि.वि. जो किसी एम पी के बेटे/बेटी और किसी ग़रीब किसान/मजदूर के बेटे/बेटी में सिर्फ़ इसलिए अंतर नहीं करता कि उनके पिताओं की सामाजिक हैसियत ग़ैरबराबर है…एक ऐसा वि.वि. जो हर तरह की ग़ैरबराबरी का विरोध करना और उसके ख़िलाफ़ लड़ना सिखाता है…कितनी लंबी फेहिस्त है ऐसी विशेषताओं की लिखने बैठूं तो ख़त्म ही न हो…हालाँकि पिछले कुछ सालों में तमाम ख़ूबियों को ख़त्म करने में सरकार ने कोई कसर न छोड़ी है…बावजूद इसके आज भी जे एन यू इस देश के तमाम अन्य विश्वविद्यालयों में कहीं बेहतर है…मैं ऋणी हूँ इस वि.वि. की…हमेशा रहूंगी.

तो उन तमाम लोगों से जो टैक्सपेयर्स के पैसे का रोना रो रहे हैं सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगी कि इसी पैसे का इस्तेमाल यह सरकार जब मूर्तियाँ बनवाने में, अपने विज्ञापन देने में और अपने आक़ा पूंजीपतियों के लोन माफ़ करवाने में करती है तो उस पर सवाल उठायें न कि इंसान होने की तमीज़ सिखाने वाली शिक्षा के क्षेत्र में इसे ख़र्च किये जाने पर. आंकड़े देखेंगे तो पायेंगे कि सरकार लगातार शिक्षा का बजट कम करती जा रही है और इसके ख़िलाफ़ लड़ना सिर्फ़ जे एन यू ही नहीं इस देश के हर बुद्धिजीवी का दायित्व है। आज जो इस आंदोलन पर सवाल उठा रहे हैं कल जब उनके बच्चों के पढ़ने की बारी आएगी तो उनके इस अधिकार के लिए लड़ाई लड़ने वाले भी बेशक यही लोग होंगे

विभावरी/ यूपी के गोरखपुर की मूल निवासी, जेएनयू की पूर्व छात्रा , संप्रति ग्रेटर नोएडा के गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी में कार्यरत ।