उर्मिलेश उर्मिल के फेसबुक वॉल से साभार

फाइल फोटो

हमारे अनेक समकालीन जानते हैं कि इलाहाबाद में कई साथियों के साथ हम जैसे लोग भी इमरजेंसी का अपने स्तर पर विरोध कर रहे थे। इमरजेंसी-विरोधी अभियान या तरह-तरह की गोपनीय गतिविधियों में हल्का-फुल्का सहयोग भी कर रहे थे। इसलिए अभी जो कहने जा रहा हूं, उसे मेरे राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रेरित विचार नहीं कहा जा सकता। 
मुझे आज तक स्वाधीनता-सेनानियों की तरह इमरजेंसी में जेल गये लोगों को पेंशन देने की कुछ राज्यों की योजना का औचित्य समझ में नहीं आया। सच तो ये है कि अपने देश में स्वाधीनता सेनानी पेंशन का कुछ कम दुरुपयोग नहीं हुआ। अभी एक प्रदेश में लोकतंत्र-सेनानी के नाम पर बंटने वाली नियमित धनराशि के बारे में विवाद खड़ा हो गया है।

फोटो सौजन्य- अजय कुमार कोसी बिहार

हमारा मानना है कि एक लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य को कल्याणकारी होना चाहिए। पर ‘सलेक्टिव’ नहीं होना चाहिए। हर बेरोजगार या बेसहारा-बुजुर्ग को जीने के लिए एक न्यूनतम सहायता राशि मिलनी चाहिए। ऐसे प्रावधान कई लोकतांत्रिक मुल्कों में पहले से हैं। विकलांग या वे लाचार या गरीब लोग जो बुरी तरह बीमार हों, उनकी देखभाल निश्चय ही राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए। पर किसी एक अभियान या आंदोलन, चाहे उसका मकसद जितना भी पवित्र हो, से जुड़े चुनिंदा लोगों को स्वतंत्र भारत में ‘लोकतंत्र का सेनानी’ बताकर पेंशन देने का कोई औचित्य नहीं है। उसी तरह, कुछ राज्यों की सरकारें अपनी पसंद के कवि, साहित्यकार या पत्रकार को, जिनमें कई पूरी तरह जुगाड़ू होते हैं, को सम्मान के नाम पर एकमुश्त मोटी राशि और हर महीने एक तरह की पेंशन देती है। इस योजना का लाभ करोड़पति भी उठा लेते हैं। यह सिलसिला ठीक नहीं। अगर यह बरकरार रहा तो किसी दिन किसी ‘दंगाई’ और किसी ‘हिंसक गो-रक्षक’ को भी ‘धर्म-सेनानी’ बताकर मासिक पेंशन मिलना शुरू हो जायेगी। इस तरह की शासकीय-स्वेच्छाचारिता बंद होनी चाहिए। कम से कम इस विषय पर एक अच्छी बहस तो होनी ही चाहिए।


उर्मिलेश/ वरिष्ठ पत्रकार और लेखक । पत्रकारिता में करीब तीन दशक से ज्यादा का अनुभव। ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘हिन्दुस्तान’ में लंबे समय तक जुड़े रहे। राज्यसभा टीवी के कार्यकारी संपादक रह चुके हैं। दिन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता करने में मशगुल।

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