पशुपति शर्मा

ताऊजी नहीं रहे। वासुदेव ताऊजी, मेरे पिता की करीबी मंडली के उन चेहरों में शुमार थे, जो हर खास मौके पर उनके ईर्द-गिर्द नज़र आते थे। रिश्तों की तासीर क्या होती है और उसे कैसे निभाया जाता है, उसका एहसास ऐसे ही लोगों से हुआ करता है। शादी हो, कोई छोटा-मोटा फंक्शन, जन्म का उत्सव हो या मरनी-हरनी, ताऊजी 50-60 किलोमीटर का सफ़र तय कर यूं आ धमकते, जैसे 50-60 कदमों की दूरी पर हों। पिताजी और ताऊजी के रिश्तों में प्रेम की ताकत देख आप और हम हैरान हो सकते थे।

हम उस दौर में हैं, जब फेसबुक पर चंद लाइनें लिखने में भी कोताही कर जाते हैं। ताऊजी ने कभी मन की बात कहने में कोई गुरेज नहीं किया। पिताजी के लिए वो किसी से भी लड़ने-भिड़ने को तैयार रहा करते। हमेशा पिताजी की ताकत रहे वासुदेव ताऊजी। उनके निधन की खबर के बाद से मैं सोचता रहा, और पिताजी के चश्मे से ही उस चेहरे को तलाशता रहा- जो दरवाजे पर बैठे होते तो हमें एक आत्मीय उपस्थिति का एहसास होता रहता। जनेऊ संस्कार के दौरान बतौर गुरु मेरा कान फूंकने की रस्म भी उन्होंने ही निभाई थी।

अभी चंद महीनों पहले ही उनसे आखिरी मुलाक़ात हुई थी। कांपते कदमों से वो बुआ के अंतिम कार्यक्रम में शरीक होने आए थे। हमेशा की तरह कुछ पल मेरे साथ थे, मेरा हाल-चाल पूछा और तरक्की की तमाम दुआएं दे डालीं। जब मैं हॉस्टल में था, तब से वो जब भी घर आते तो पूछते- नया क्या चल रहा है? और मैं असमंजस में पड़ जाता। तमाम बच्चों की तरह मैं भी इस तरह के सवालों से बचने की कोशिश करता लेकिन ताऊजी पास बुला लेते और धीमे-धीमे ऐसे ही सवाल-जवाब करते रहते। मैं भी कुछ किस्से गढ़ता रहता।

आज जब रिश्तों को निभाने की वो सलाहियत खत्म होती जा रही है, आज जब प्रेम बरसाने वाले चेहरों की कमी दिखती है, आज जब निश्चल स्नेह का सोता समेटे रखने वाली शख्सियतें नज़र नहीं आती… ताऊजी का यूं जाना, खटकता है… अखड़ता है… अब दालकोला मोड़ से गुजरते वक्त आंखें कैसे आपको तलाशेंगी ताऊजी…

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