शिरीष खरे

अलेक्जेंड्राइट नाम के दुनिया के बेशकीमती पत्थर जिस खेत से निकले उस खेत का मालिक कैसा होना चाहिए । क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि उसके पास आधुनिक सुख-सुविधाएं हों और उसका भी बेटा नामी और हाईप्रोफाइल स्कूलों में पढ़ेता होगा । लेकिन क्या आप सोच सकते हैं ऐसे बेशकीमती पत्थरों का मालिक नौकरी के लिए दर-दर की ठोंकरे खा रहा हो और घर का खर्च चलाने के लिए उसे मनरेगा के जॉब कार्ड का सहारा लेना पड़ रहा हो ।

ये कहानी है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 240 किमी दूर सेंदमुंडा गांव दो भाइयों की जिनको नौकरी का झांसा देकर सरकार ने उनसे उनकी जमीन छीन ली और उन्हें मजदूरी के लिए मोहताज बना दिया । कहने का मतलब ये कि दुनिया के सबसे कीमती और दुर्लभ पत्थरों में से एक अलेक्जेंड्राइट जिस जमीन के नीचे गड़ा है, उसके मालिक मजदूर बना दिए गए और उनके हाथों मनरेगा का जॉबकार्ड थमा दिया। अब वे मजदूरी के लिए मोहताज हैं और रोजीरोटी के लिए मारे-मारे फिर रहे।

बात कोई तीस साल पहले की है, जब प्यारेसिंह और प्यारीलाल नाम के दो भाई करीब दो एकड़ के खेत में धान उगाते थे। उनकी जिंदगी बहुत खुशहाल तो नहीं, पर इतनी लाचार भी नहीं कि दो जून की रोटी मुश्किल हो जाए। आज भी यह परिवार मिट्टी के छोटे घर में रहता है, जहां कोई खास सामान नहीं। इनके लिए बहुमूल्य पत्थर ऐसे अभिशाप बने कि दोनों मजदूरी करने के लिए मजबूर हो गए ।

प्यारेसिंह पूरी कहानी बताते हुए कहते हैं कि “अधिकारियों ने कहा था कि तुम्हारे खेत में अरबों रुपए के पत्थर हैं, जो सरकार के काम आएंगे। जमीन दे दो, तुम दोनों भाईयों को नौकरी दिलवा देंगे। कहीं भटकने की जरुरत नहीं, उसी जमीन के रखवाले बनांएगे। जमीन तो अब तुम्हें वैसे भी मिलने वाली नहीं, इसलिए 12  हजार रख लो और हमने अधिकारियों की बात मान ली।“

प्यारे लाल की जमीन

इसके बाद सरकार ने दोनों भाइयों को इसी खदान का गार्ड बनाया, पर वेतन कभी नहीं दिया कुछ दिन बीतने के बाद उन्हें नौकरी से भी हटा दिया गया। रिकार्ड में जमीन का पट्टा दोनों भाईयों के नाम हैं, बावजूद इसके वे अपने खेत में खेती तो दूर पैर नहीं रख सकते। उनकी जमीन कटीले तारों से घिरी है और दोनों भाई मजदूरी की तलाश में दूर-दूर तक भटक रहे हैं। काम मिला तो ठीक, नहीं तो जीना मुश्किल होता है।

यहां ये जानना भी जरूरी है कि अलेक्जेंड्राइट है क्या । यह  एक बहुमूल्य रत्न है, जो प्रकाश की तीव्रता के आधार पर रंग बदलता है। दिन के दौरान यह हरे रंग में बदल जाता है और धीरे-धीरे भूरा, बैंगनी और लाल रंग को अपने में उतार लेता है । वैज्ञानिक इसे अलेक्जेंड्राइट प्रभाव कहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि 1831 में, मिनरलोगिस्ट नाल्स गुस्टफ नॉरन्सकॉल्ड ने इसे पहली बार रूस के उरल पर्वत में खोजा था और इसका नाम रूस के झार अलेक्जेंडर -2  के नाम पर रखा गया था। रूस में, 5 कैरेट (1000 मिलीग्राम) अलेक्जेंड्राइट पाया गया है। ब्राजील में भी इसी वजन का अलेक्जेंड्राइट जमा है। इन देशों के अलावा,  यह कीमती पत्थर भारत,  श्रीलंका,  मेडागास्कर और तंजानिया में भी पाया जाता है। हालांकि, इन देशों में केवल 3 कैरेट अलेक्जेंड्राइट मौजूद हैं।


shirish khareशिरीष खरे। स्वभाव में सामाजिक बदलाव की चेतना लिए शिरीष लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक भास्कर , राजस्थान पत्रिका और तहलका जैसे बैनरों के तले कई शानदार रिपोर्ट के लिए आपको सम्मानित भी किया जा चुका है। संप्रति पुणे में शोध कार्य में जुटे हैं। उनसे shirish2410@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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