लेखकों का ‘आपातकाल’ और ‘फासीवाद’ बस हौव्वा है ?

संजय द्विवेदी देश में बढ़ती तथाकथित सांप्रदायिकता से संतप्त बुद्धिजीवियों और लेखकों द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का सिलसिला वास्तव

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यारों को वीराने में छोड़ गए वीरेन

श्रद्धांजलि तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें

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पटना के रंगमंच पर ‘मेहमान’ की ‘दस्तक’

बदलाव प्रतिनिधि निर्मल वर्मा की कहानियों को मंच पर उतारना आसान नहीं है। मगर पटना के प्रेमचंद रंगशाला में निर्देशक

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ऑस्ट्रेलिया में पूर्णिया के ‘ईयान बाबू’!

सत्येंद्र कुमार शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद इनके लिए भी आप बोल सकते हैं। बहुत ही दिलचस्प और जानदार शख़्स हैं। ये

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