Tag archives for साहित्य

आईना

बचपन की मुस्कान

डॉक्टर प्रीता प्रिया बचपन के दिन  बिताए हैं मैंने  सूरज की किरणों की डोली पर चंदा के पलने पर मैंने  बचपन की रात गुजारी है  बचपन में मैंने जीवन की …
और पढ़ें »
माटी की खुशबू

कांपता हृदय और पिता

रुपेश कुमार जब देखता हूं ढीली होती पेशियां पिता की बहुत कांपता है हृदय ! सुबह जब कभी  लेटते हैं देर तक पिता तब जी कड़ा कर उन्हें जाता हूँ…
और पढ़ें »
माटी की खुशबू

श्रम से निखरता सौंदर्य

डॉ. भावना बिहार के प्रसिद्ध चित्रकार राजेंद्र प्रसाद गुप्ता की कृति। बलुई के ढलान से बोझा लिए जब भी गुज़रती है वह काली लड़की तो लोग उसे चिढ़ाते हैं 'करीअक्की'…
और पढ़ें »
अतिथि संपादक

माथे पर पृथ्वी को उठा, सूरज की अगवानी करती स्त्री

डाॅ॰ संजय पंकज स्त्री का हर रूप सृजनधर्मी और कल्याणकारी है। वह परिवार से लेकर राष्ट्र-निर्माण तक में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। कार्यक्षमता और अकूत शक्ति से…
और पढ़ें »
अतिथि संपादक

अप्रैल माह के अतिथि संपादक होंगे संजय पंकज

जाने - माने साहित्यकार , कवि और लेखक डाक्टर संजय पंकज होंगे बदलाव के अप्रैल के अतिथि सम्पादक। मुजफ्फरपुर जिले के कटरा प्रखंड के ऐतिहासिक गांव वीरभूमि बेरई मे 5 …
और पढ़ें »
यूपी/उत्तराखंड

“पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” की 40वीं साहित्य गोष्ठी सम्पन्न

बदलाव प्रतिनिधि 28 जनवरी’ 2018, रविवार, वैशाली,गाजियाबाद। “68वें गणतन्त्र दिवस के अवसर पर देश भक्ति व सामाजिक सौहार्द ” पर गीतों , कविताओं और गजलों से परिपूर्ण “पेड़ों की छांव…
और पढ़ें »
परब-त्योहार

काव्य फूलों की तरल मुस्कान से पट गई पूर्णिया की धरती

शंभु कुशाग्र नववर्ष 2018 की पूर्व संध्या पर पुराने साल को विदाई देने और नए साल के स्वागत में पूर्णिया के साहित्यकार भारतीय लेखक मंच के बैनर तले स्थानीय जिला…
और पढ़ें »
माटी की खुशबू

… और मां के साथ मर गया मनुष्य

देवांशु झा बेटे ने बूढ़ी मां से कहा मां चलो, सूर्य नमस्कार करते हैं लगभग अपंग मां सहज तैयार हुई बहू ने खुश होकर दरवाजा खोला बेटे ने मां को…
और पढ़ें »
आईना

देहरादून में सृजन का सादगी भरा साहित्य उत्सव

प्रियदर्शन साहित्य समारोह अक्सर अपनी भव्यता और भटकावों में मुझे अरुचिकर लगते रहे हैं। इन समारोहों में साहित्य और विचार पीछे छूट जाते हैं और ग्लैमर और चकाचौंध का शोर…
और पढ़ें »
परब-त्योहार

गए साल को चरण स्पर्श

नीलू अग्रवाल विदा, विदा, विदा...अलविदा। अब मिलेंगे नहीं कभी नहीं हमें है पता। हँसते हुए, फिर भी देते हैं विदा। तुम जाओ यही नियति है। वह आएगा कुनकुनाता, गुनगुनाता चुलबुलाता…
और पढ़ें »