Tag archives for सांप्रदायिकता

गांव के रंग

‘मौलाना जोशी’ ने ‘मुल्क’ से कुछ मांगा है, दे पाओगे?

सच्चिदानंद जोशी कुछ दिन पहले बचपन का एक दोस्त मिला। मेरे रूप को देखते ही बोला "अरे यार तुम तो एकदम बदल गए "। उम्र के साथ शरीर और बाल…
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चौपाल

सांप्रदायिकता सरकार का सबसे बड़ा अस्त्र है- प्रेमचंद

डा. सुधांशु कुमार कथा-सम्राट प्रेमचंद। हिंदी कथा साहित्य को 'तिलस्म' और 'ऐय्यारी' के खंडहर व अंधेरी गुफा से निकालकर जनसामान्य के दुख-दर्द और यथार्थ से जोड़ने वाले कथासम्राट प्रेमचंद आज…
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बिहार/झारखंड

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना… रे कबीरा, न बदला जमाना

श्वेता जया पांडे अगर आप कबीर को एक महान शख्सियत बताते हैं और उनकी महान ज़िंदगी से कुछ सीखने की सीख देते हैं तो सबसे पहले आपको ये सोचना होगा…
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मेरा गांव, मेरा देश

भीड़ की हिंसा पर लीपापोती करना देश के लिए घातक

बदलाव प्रतिनिधि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में साम्प्रदायिक हिंसा के बाद काफी तनाव है। ये सारा विवाद फेसबुक पर एक कथित पोस्ट को लेकर हुआ है। बशीरहाट…
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चौपाल

देश की तहज़ीब ‘अकबरुद्दीनों’ और ‘तोगड़ियों’ के ख़िलाफ़- राणा यशवंत

राणा यशवंत अकबरुद्दीन ओवैसी साभार फेसबुक। 3 जुलाई 2017। मेरे मित्र अभिसार शर्मा ने आज अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान पर एक पोस्ट लिखी और कहा कि "आखिर क्या गलत कह…
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मेरा गांव, मेरा देश

दुनिया को क्या पैगाम देगी राम की नगरी ?

फाइल चित्र ब्रह्मानंद ठाकुर पिछले तीन सालों में देश में नये मुद्दे पैदा करने की परम्परा का बड़ी तेजी से विकास होता दिखाई दे रहा है। यह बात दीगर है…
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मेरा गांव, मेरा देश

ये डर ग़लत साबित कर पाएंगे योगीजी?

प्रिय आदित्यनाथ योगी जी , मेरा नाम विनोद कापड़ी है। अच्छा लगता है, इसलिए थोड़ी बहुत पत्रकारिता करता हूँ और छोटी मोटी फिल्में बनाता हूँ। आपकी तरह एक हिंदू परिवार…
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चौपाल

तारिक फतेह को लेकर ‘चिंताओं’ का दौर

धीरेंद्र पुंडीर ये मुजफ्फनगर की तारिक फतेह पर चिंता है। घर आया था लिहाजा सुबह के अखबार में दिखा। ये हर हाल में एक धर्मनिरपेक्ष चिंतन है। मुजफ्फरनगर से हजारों…
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आईना

ओवैसी को जिसके लिए चुना वो वही कर रहे हैं !

वही लोग ओवैसी से इस वक़्त उसके सांप्रदायिक बयान को ले कर चिढ़े हुवे हैं जिन्होंने उसे चुना ही सांप्रदायिक धुर्वीकरण के लिए है । ये बताईये कि आपने ओवैसी…
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गांव शहर बना तो हम हिन्दू-मुस्लिम हो गए !

ज़ैग़म मुर्तज़ा क़रीब दो दशक पहले गांव जाना हमारे लिए अंतर्राष्ट्रीय पिकनिक से कम न था। हफ्ता भर पहले तैयारियां शुरू हो जातीं थी। गांव कोई ऐसा ख़ास दूर नहीं…
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