Tag archives for शिरीष खरे

माटी की खुशबू

दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुका है कोल्हापुर का वालवे खुर्द गांव

शिरीष खरे कोल्हापुर के बाकी गांवों की तरह दिखने में यह एक साधारण गांव है। यहां के लोगों को यह बात भी अब साधारण ही लगने लगी है कि कुश्ती…
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आईना

महाराष्ट्र का एक ऐसा गांव जहां घर की तरह स्कूल भी हैं स्वच्छता की मिसाल

शिरीष खरे बीजापुर से आगे महाराष्ट्र के पश्चिमी छोर की ओर बढ़ा तो एक अलग ही नजारा दिखा ।  जितनी दूर तक देखो उसी अनुपात में उतनी दूर तक खाली-खाली…
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माटी की खुशबू

सिर्फ कानून नहीं सोच में भी बदलाव लाने की ज़रूरत

शिरीष खरे तीन तलाक विधेयक पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का पक्ष बहुत स्पष्ट है। संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार का कहना है कि इस प्रकार की कुप्रथा से…
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चौपाल

आर्थिक असमानता दूर करने का ‘सियासी’ छलावा !

शिरीष खरे स्वतंत्रता के बाद भारत जैसे विशाल और विविधता सम्पन्न देश में असंतुलन तथा अंतर्विरोधी समाधान के लिए योजना को एक सकारात्मक साधन माना गया। ग्रामीण भारत में योजना…
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मेरा गांव, मेरा देश

ग्राम सभा का इतिहास और ग्राम स्वराज का अधूरा सपना

शिरीष खरेभारत में स्थानीय शासन का अस्तित्व बहुत पुराना है। मध्यकाल के इतिहास में ग्राम-सभा का उल्लेख मिलता है जो कि पंचायतों के माध्यम से काम करती थीं। कहा जाता…
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मेरा गांव, मेरा देश

गांवों में विकास की धीमी रफ्तार और नौकरशाही का ढुलमुल रवैया

शिरीष खरे  भारतीय प्रशासन का वर्तमान ढांचा ब्रिटिश शासकों से विरासत में मिला है। इसी ढांचे के नीचे गांव का विकास कार्य और जवाबदेही तय की जाती है। हालांकि, समय-समय पर इसमें…
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चौपाल

पूंजीवाद और सामंतवाद की चक्की में पिसता किसान आंदोलन

शिरीष खरे आजकल देश में किसानों का बड़ा आंदोलन खड़ा करने की कोशिश चल रही है । जिसमें देशभर से किसान एक मंच पर आए हैं ताकि कारपोरेट सरकारों को…
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चौपाल

ग्रामीण भारत की बदहाली और आर्थिक विकास का लालीपॉप

शिरीष खरे भारत में ग्रामीण और शहरी अंचल के लिए निर्धनता का निर्धारण अलग-अलग तरह से होता है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत के 75 प्रतिशत निर्धन गांवों में रहते…
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मेरा गांव, मेरा देश

गांव की आर्थिक-सामाजिक बुनावट में कितना बदलाव

शिरीष खरे गांव क्या है? अवधारणाओं में जब भी इसे ढूंढ़ने-समझने की कोशिश की तो इससे जुड़ी व्याख्याओं में मुख्य तौर पर तीन बाते सामने आईं। छोटी आबादी, भौतिक ढांचा…
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चौपाल

मैया नहीं मालगाड़ी बन गई है नर्मदा

शिरीष खरे जब पहली यात्रा समाप्त होने की कगार पर होती है तो मेरे भीतर दूसरी यात्रा तेजी से आगे बढ़ रही होती है। यह होती है विचारों की यात्रा।…
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