Tag archives for पत्रकार

चौपाल

दम तोड़ता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

वीरेन नंदा/ वर्तमान समय में लोकतंत्र का चौथा खंभा पूरी तरह जमींदोज नजर आ रहा है। एक वह समय था जब कोई मंत्री या सरकार किसी पत्रकार की तारीफ गलती…
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सुन हो सरकार

सत्ता जानती है पत्रकार की औकात क्या है ?

पुष्य मित्रपिछ्ले साल का वाकया है। एक बड़े मीडिया हाउस से मुझे फोन आया कि वे चाहते हैं कि मैं उनके नए वेन्चर का रीजनल हेड(पूर्वी जोन) बन जाऊं, इसलिये…
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मेरा गांव, मेरा देश

बदलते दौर में पत्रकारिता के चाल-चरित्र और चेहरे की झलक

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के फेसबुक वॉल से साभार मेरा मानना है, किसी लेखक, बुद्धिजीवी, एकेडेमिक, सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह एक सक्रिय पत्रकार, खासतौर पर रिपोर्टर या एंकर को…
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गांव के नायक

वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा ने किया देहदान का ऐलान

पद्मपति शर्मा के फेसबुक वॉल से हो गयी देह दान की औपचारिकता पूरी। गत शुक्रवार, 15 जून को शपथ पत्र का काम कचहरी में एडवोकेट कन्हैया यादव भैया के सहयोग…
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मेरा गांव, मेरा देश

राजकिशोर का न होना

संजीव कुमार सिंह जनसत्ता की कैच लाइन रही है सबकी खबर दे, सबकी खबर ले। टीवी में काफी समय गुजारने के बाद अपने लिए इसके मायने बदलते लग रहे हैं।…
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महानगर

पत्रकार कुमार नरेंद्र सिंह से खुली बातचीत आज

बदलाव टीम के साथियों के साथ 15 अप्रैल को रूबरू होंगे वरिष्ठ पत्रकार कुमार नरेंद्र सिंह। मार्च महीने से बदलाव ने वरिष्ठ पत्रकारों से मुलाकात और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला शुरू…
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परब-त्योहार

अब न रहा वो फगुआ, अब न रहे वो हुरियारे

प्रशांत पांडेय ज़िंदगी की आपा धापी में प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। मनुष्य समय के चक्र में फँसकर उसी के इशारे पर चलने को मजबूर हो जाता है। पिछले दो साल…
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माटी की खुशबू

बहुत तकलीफ़देह है नीलाभ का यूं जाना

नमस्ते, कल्पितजी !  मैं नीलाभ मिश्र हूँ, पटना से आया हूँ । नवें दशक का कोई शुरुआती वर्ष था, जब नीलाभ मिश्र मुझसे मिलने अशोक-मार्ग के घर आये थे। नवभारत…
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‘भूमिका’ ने मीडिया से ज़्यादा उर्वर ज़मीन तलाश ली

जब खेतों में कदम पड़े तो चेहरा खिल उठा किसानों और सरकारों का रिश्ता अजीब सा रहा है। सरकारें  योजनाएं बनाती हैं, खूब पैसा बहाती हैं, लेकिन न जाने क्यों…
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