अपने ही गांव में आज हम अजनबी बन गए

धीरेंद्र पुंडीर अपने ही मकान में हम अजनबी या अजनबी मकान में हम कुछ भी कह पाना मुश्किल है। अकेले

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‘हिंगोश’ का दिलचस्प किस्सा

ये बात अक्सर कही जाती है, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जैसे ये लकड़ी है। यूँ तो यह किसी पेड़

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भुजइन के भार के बहाने किस्सा गांव का

रज़िया अंसारी  गांव के लहलहाते हरे भरे खेत, खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल, कुएं पर पानी भरती गांव की

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हमारे दिलों का कोना-कोना नाप चुके हैं सागर बाबा

सुबोध कांत सिंह बात तक की है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था। स्कूल में गर्मी की छुट्टी पड़ी

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माटी की महक गांव खींच लाती है!

संतोष पाठक के फेसबुक वॉल से गांव का पुराना घर साल दर साल खंडहर हो रहा है। यह मेरे दादा-दादी की

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ओ शहर, गांव से बड़े भय के साथ लौटता हूं

अमित शर्मा अब यहां की धूल में पहले-सी वो महक नहीं। अब यहां के ‘राम-राम’ वाले संबोधन में पहले-सा अपनापन

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