Tag archives for गांधी

गांव के रंग

देश के गांधी अड्डों की सूरत बदलनी चाहिए

संदीप नाईक एक ही है सेवाग्राम देश में, एक है कस्तूरबाग्राम इंदौर में और फिर देशभर में फैले हैं - गांधी चबूतरे और गांधी आश्रम , पीठ, अध्ययनकेन्द्र और पुस्तकालय…
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चौपाल

सेवाग्राम का सबक- स्वच्छता, प्रार्थना और स्वावलंबन

संदीप नाईक बहुत सारी खराब बातों के बावजूद बहुत सारी अच्छी बातें सेवाग्राम के आश्रम में मौजूद हैं, इनमें से प्रमुख हैं - स्वच्छता , प्रार्थना और स्वावलंबन। पूरे परिसर में…
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आईना

गांधी पर बात करने वर्धा में जुटे पत्रकार साथी

संदीप नाईक  मध्यप्रदेश का एक पैरवी समूह जो विकास, कुपोषण , शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर गत 15 वर्षों से प्रदेश में कार्यरत है , प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर…
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चौपाल

मीडिया को फिर से पत्रकारिता बनाने की लड़ाई कलम के नाम उधार है

ब्रह्मानंद ठाकुर अपने देश के मीडिया जगत में इन दिनों जो घटनाएं घट रही हैं, वह आकस्मिक नहीं कही जा सकती। इसका ताना-बाना तो काफी पहले ही बुना जा चुका…
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परब-त्योहार

अतिवादों के दौर में गांधी की चर्चा और विनय का स्मरण

अखिलेश्वर पांडेय 24 जून 2018 को कोलकाता स्थित भारतीय भाषा परिषद के सभागार में विनय तरुण स्मृति समारोह-2018 का आयोजन हुआ। भारतीय भाषा परिषद की मंत्री विमला पोद्दार ने सभी…
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आईना

चंपारण सत्याग्रह के सौ बरस- गांधी के संकल्प का एक और पाठ

पशुपति शर्मा कोलकाता में विनय तरुण स्मृति कार्यक्रम हो रहा है। कार्यक्रम के दूसरे सत्र 'अपनी हांडी अपनी आंच' सत्र में पुष्यमित्र की पुस्तक चंपारण 1917 पर परिचर्चा रखी गई…
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चौपाल

अतिवादों के दौर का जनक है पूजीवादी अर्थतंत्र-ब्रह्मानंद ठाकुर

ब्रह्मानंद ठाकुर विनय तरुण स्मृति व्याख्यान 2018 का विषय है- अतिवादों के दौर में पत्रकारिता और गांधीवाद। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि साहित्य, कला, संस्कृति, नीति-नैतिकता, चिंतन और…
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चौपाल

अतिवादों के दौर में पत्रकारिता और गांधीवाद

मोनिका अग्रवाल जब हम किसी से पूछे कि  वर्तमान में हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का काल कैसा है ? शायद जो जवाब मिले वो ऐसा हो- पतनशील, विकासहीन, लक्ष्यविहीन, अराजकतापूर्ण…
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चौपाल

आंदोलनों में हिंसा तो होती है, चौरी-चौरा वाला दम नहीं दिखता

अमित ओझा 5 फरवरी 1922 गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा देश अब अंगड़ाई लेने लगा था।अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ बापू के असहयोग आंदोलन की आग धीरे-धीरे पूरे मुल्क में फैलती…
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आईना

गांधी और अंबेडकर के बीच की कड़ी थे लोहिया

डॉक्टर भावना आजादी के सात दशक बाद भी हिंदुस्तान में जाति, धर्म की सियासत हो रही है। जिन नेताओं पर समाज को जोड़ने की जिम्मेदारी होती है. वही समाज में…
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