घने तिमिर में दीप जलाकर

घने तिमिर में दीप जलाकर

सुनील श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार

( चित्र : सुभाष शर्मा,पूर्व कला निदेशक लोकमत , नागपुर )

उस दिवाली टूटा दीया,
इस दिवाली फूटी किस्मत,
उस दिवाली घना अंधेरा,
इस दिवाली लूटी अस्मत।
***
किसने तोड़ी दीप हमारी,
किसने तिमिर भरा जीवन में,
न जाने क्यों तारे टूटे ,
क्यों रोया था चांद गगन में।
***
किसने किसने जुआ खेला,
दांव लगी एक और द्रौपदी,
यह तो रात अमावस की है,
किसके अंदर दिखी त्रासदी।
***
किसने देखा घना अंधेरा,
आसमान को काजर घेरा,
क्रंदन करते तारे टूटे,
सबने देखा दुःखद सवेरा।
***
खील बतासे लइया बिखरी,
अंदर आंसू, छिटकी गठरी,
कोयल भी खामोश पड़ी है,
भागा मंदिर छोड़ पुजारी ।
***
फिर भी हिम्मत नहीं हारते,
जी छोटा कर नहीं भागते ,
घने तिमिर में दीप जलाकर,
चल पड़ते हैं राह निहारे

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