सुदीप्ति

एक ही ससुराल है अपना तो। अब मायके से ज्यादा अपना।
भई हम सुतली बम में सच्ची यकीन नहीं करते। जैसे हैं वैसे को बाहें फैला अपनाया है लोगों ने। भर-भर के प्यार दिया है। और हम चार दिन के लिए जाते हैं तो उनके लिए भीतर से न भी बदलें तो थोड़ा भेस बना लें तो कुछ नहीं जाता।
लेकिन अगर वहीं रहना होता, दिन रात की जद्दोजहद वहीं करनी होती तो?
तो भी लड़ते-भिड़ते और बदलते-बदलाते न। आखिर और बहनें कर रही हैं न।

सोचा था कि अब इस मुद्दे पर नहीं लिखूंगी। दो दिन ज़ब्त भी किया, लेकिन फिर यह लिखा। आखिरी होगा मेरी ओर से। लम्बा है। धैर्य हो तो पढ़ें। हो सकता आपकी राय न बदले। राय अनुभव जन्य परिस्थितियों से बनती है। आपके अनुभव-संसार की बातें भिन्न होंगी।

1) कोई आकर कमेन्ट में लिख गया कि गाँव जाकर वहां के हिसाब से थोडा ढल जाना apologetic आर्गुमेंट है और प्रतीकात्मक कर्म-कांड होता है।
2) किसी और ने कहा कि शहराती औरतें जब कुछ दिनों के लिए जाकर यह रवैया दिखाती हैं तो वहाँ (गाँवो/ कस्बों) की औरतों का संघर्ष बढ़ जाता है।
3) किसी ने गाँव जाकर साड़ी लपेटने की नौटंकी कहा।

बहुत सारे लोगों को लगता है कि हम गाँव विलेज टूरिज्म पर जाते हैं, दो दिनों के रोमांच के लिए। उनको क्या सफाई देना? जो जानते हैं उनको यह बता दूं कि हमारा वहां से नाभि-नाल का संबध है। कभी बदलेगा नहीं और वहां के लिए कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। जो सामाजिक मुद्दे को व्यक्तिगत आक्षेप बना देते हैं, जिनकी नज़रों में हम रिग्रेसिव हैं और हमारी वजह से क्रांति पिछड़ रही है, उनको भी समझाना संभव नहीं। फिर भी लिखना जरुरी है क्योंकि अगर उनकी बात आंशिक रूप से भी सही है तो उसके बरक्स दूसरी बात भी उचित ही है।

अव्वल तो जो हम (या सिर्फ मैं) वहाँ करते हैं वो कतई कर्मकांड या अंध-विश्वास को बढ़ावा देने का काम नहीं।विचारों के स्तर पर समझौता तो हो ही नहीं सकता न? हाँ, पोशाक और स्वभाव में मैं उनको आक्रांत करने वाली न लगूं- इसका ध्यान रखना चाहती हूँ। मैंने पहले भी कहा है, असल मुद्दों- स्वायत्तता, निर्णय लेने में हक़, बच्चों के भविष्य में दखल, आर्थिक रूप से सबल आदि पर अपनी बात एक बड़े समुदाय तक पहुँचाने के लिए जरुरी है, उनसे ज्यादा दूरी न दिखे। एक दम उनसे अलग शहरी मेम लग कर मैं क्या उनको कुछ समझा पाऊँगी? मेरे उनके बीच न भरने वाली दूरी बनी रहेगी।

अपने ससुराल का एक उदहारण देती हूँ। पहले साल छठ में मैं गयी थी। वहां छठ घाट पर एक भद्र स्त्री बिना सर पर पल्लू रखे बच्चे को गोद में लेकर खड़ी थी। वो गाँव के एक डॉक्टर युवक की पत्नी है। मालूम नहीं खुद डॉक्टर है या नहीं पर काफी पढ़ी लिखी और समझदार दिखीं। सारे लोगों की चर्चा के केंद्र में उनका सर पर बगैर पल्लू के खड़ा रहना था। मैं घूँघट में कभी नहीं रही, पर उस सार्वजानिक स्थान पर मेरा सर ढंका था।

मैंने अपने परिचितों/ परिजनों से पूछा कि क्या गलत किया उन्होंने? उनकी नजर में वह जाहिलपन होगा, पिछड़ापन होगा तो नहीं ढंका। सबको यही लगता रहा कि उनके इस कदम से बड़ों का असम्मान हुआ। मुझे नहीं लगा। मैं सबकी नज़रों में अच्छा बनने के लिए नहीं सहज बुध्दि से कि पहले साल गाँव भर की जिज्ञासा का केंद्र होऊँगी तो ध्यान न खींचूँ इसलिए सर ढंके हुए थी। मैं अपने को ढकोसले वाली नहीं बस अवसर के मुताबिक निर्णय करने वाली मानती हूँ।

वो मुझे बिल्कुल सही लगती हैं। फिर भी लगता है क उन्होंने संवाद बनाने का एक मौका खो दिया। सैकड़ों नहीं तो दसियों लोगों को वो भविष्य में आगे बढ़ने, पढ़ने और नए रास्ते पर जाने में मार्गदर्शन कर सकती थीं, लेकिन पति के गाँव में प्रैक्टिस करने के बावजूद वो वहां जम नहीं पायीं। क्योंकि चर्चा का केंद्र उनका बाहरी वेश हो गया। गलत नहीं होते हुए भी उनका कोई सही असर नहीं पड़ा।

अब आते हैं हम जैसे प्रतीकात्मक रुप से सरेंडर करने वालों पर। गाँव में रह कर दसवीं तक की पढ़ाई, उसके बाद पटना से jnu तक के सफ़र में एक अतिरिक्त दबाव हमेशा ही रहा कि कुछ ऐसा न करें कि और किसी बहन को मौका ही न मिले। होस्टल जाने वाली पहली लड़की आखिरी न बन जाए कुनबे में। इसके बाद जो हासिल किया क्या वो कम है?
जो लोग दहेज़ लेकर शादी के पाँच साल बाद चेतन हो क्रांति चिल्लाते हैं उनको बस बता दूँ कि दहेज़ के लिए सबसे बदनाम समुदाय में जहाँ प्रेम-विवाहों में भी दहेज़ छूटता नहीं, लड़कियों को भी गलत नहीं लगता। हमने प्रेम ही नहीं किया बल्कि बिना किसी किस्म के दहेज़ के शादी की। सबकी मर्ज़ी से जरुर की।

आज कोई कहे कि कोर्ट मैरेज क्यों नहीं कर ली?  क्या इससे हम दोनों परिवारों और आस-पास के समुदाय पर ज्यादा बेहतर असर डालते? जो रिश्तेदार प्रेम-विवाह के ही पक्ष में नहीं हो सकते थे वो अब हमें एक उदाहरण की तरह देखते हैं और हमारे जैसे घोर जातिवादी-सामंती कुनबे में अंतरधार्मिक विवाह भी सबकी स्वीकृति से हुआ। मुझे दिखता है कि मेरे गाँवों में खूब लड़कियां जींस और स्कर्ट पहन साइकिल चाहती हैं। मुझे वो स्कूटी पर भी नज़र आती हैं। पर ज्यादा ख़ुशी इस बात की होती है कि पड़ोस की कजन के पच्चीस साल के होने पर भी उसके पिता विवाह के लिए अकुलाते नहीं बल्कि एक असफलता के बाद एक और साल देते हैं स्वावलंबी होने के लिए।

मेरी लड़ाईयां अलग हैं। कोई मुझे केप्री लोअर (जबकि मैं बचपन से गाँव में ही रही और कभी सूट जैसी चीज़ नहीं पहनी) में देखा यह मान ले कि होस्टल की लड़कियां ऐसी हो जाती हैं तो अपनी बेटियों को नहीं भेजेंगे, प्रेम विवाह की आई बहुएँ बड़ों का छोटा सम्मान नहीं कर पातीं तो हम किसी कीमत पर उसे अपने घरों में न होने देंगे। यह चिंताजनक लगता है। और सच पूछिए तो लोअर में ही आराम मिलेगा सलवार में नहीं यह भी एक तरह की हास्यास्पद बात है।

आप ही सोचिये जो लोग मुझ जैसी तार्किक और अपनी बात स्पष्टता से कह सकने वाली स्त्री तक को मजाक उड़ा कर, व्यंग्य कर और नीचा दिखा समझाना चाहते हैं क्या वो अपने टारगेट ऑडिएंस को इस पद्धति से समझा लेंगे? मुझे नहीं लगता। मजाक उड़ा, नीचा दिखा और थोप कर कुछ नहीं बदला जा सकता है।


sudipti-profileसुदीप्ति। जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर। बिहार के महाराजगंज की मूल निवासी। इन दिनों राजस्थान के मेयो कॉलेज में प्राध्यापिका। किसी भी मुद्दे पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखती हैं।