सुदीप्ति

महाभारत मेरी रुचि का विषय है इसलिए जब एक भाषण में माननीय प्रधानमंत्री ने ‘शल्य’ का नाम लिया और फिर उनकी नकारात्मकता फैलाने की प्रवृति पर बात की तो मेरा ध्यान अटक गया। (प्रकारांतर से तो प्रधानमंत्री जी का उद्देश्य शल्य और नकारात्मकता के बहाने अर्थव्यवस्था के अपने आंकड़ों पर से ध्यान हटवाने का रहा। जोकि हुआ तो नहीं। ज्यादातर लोग शल्य पर नहीं आए। हाँ, भक्त और ट्रोल जरूर नकारात्मकता वाली बात दुहराए जा रहे हैं।)

अब कुछ दिन बीतने पर मैं शल्य और शल्य-वृति पर बात कर लेती हूँ।

* शल्य कौन?- मद्र के राजा, माद्री (पांडु की दूसरी पत्नी जो सती हुई के भाई)।

* युद्ध में शल्य किसकी ओर से लड़े- कौरवों की। कौरवों के आखिरी सेनापति भी थे।

*सवाल है- क्यों?

*पारंपरिक कथा के अनुसार शल्य जब युद्ध के वक़्त अपने भांजों के पक्ष में मिलने के लिए बड़ी-सी सेना लेकर आ रहे थे तो शकुनि और दुर्योधन ने अपने को छुपा के उनका स्वागत-सत्कार रास्ते में किया। उन्होंने समझा कि ये उनके भांजों की ओर से हो रहा है। खूब मज़े में उन्होंने आतिथ्य का आंनद उठाया और फिर युद्ध में सहायता का वचन दे दिया। बाद में उनको पता चला कि यह वचन तो शत्रु को दे दिया है। तो फिर वह वचन से मुकरे नहीं पर शत्रु की भाँति अपनों के विपक्ष में शत्रु सेना में रहे।

*शल्य पर मुख्य आरोप क्या हैं?

जब वे कर्ण के सारथी बने (ध्यान दीजिए, सारथी कर्ण की अपनी माँग पर बने।) कर्ण को अर्जुन से ही स्पर्धा थी और उसके सारथी कृष्ण से चतुर थे, इसलिए कर्ण को खुद के लिए एक चालाक सारथी चाहिए था।

* तो सारथी बन क्या किया शल्य ने? उन्होंने कर्ण के मनोबल को लगातार गिराया। अर्जुन के कुल, शिक्षा, ज्ञान आदि की प्रशंसा करते हुए कर्ण के निम्न कुल और अज्ञात वंश पर प्रहार करते रहे। वैसे लगातार नकारात्मक बातें सुन कर्ण अपनी विद्या न भूला, न ही उसके प्रदर्शन में कमी आई। वो खीझता रहा लेकिन दृढ-निश्चयी भी हुआ कि उसे साबित करना है।

* शल्य का मुख्य घात यह रहा कि उन्होंने कीचड़ में फँसे रथ के पहिए को निकालने से मना कर दिया। वह उस वक्त उनका काम था। वही करने के लिए कर्ण ने उनको चुना था, लेकिन सूत का पहिया मैं क्यों निकालूँ वाले क्षत्रियोचित दंभ में शल्य ने उसे मना किया। फिर, वह मन से शत्रु की और भी तो थे।

अब प्रधानमंत्री जी के बयान के सन्दर्भ में इस कथा के बरक्स कुछ सवाल हैं-

1) धर्म-अधर्म छोड़िए; कौरव-पांडव भी जाने दीजिए। क्या वे मानते हैं कि कुछ महारथियों को उन्होंने छल-बल से अपनी और मिलाया है? 

शायद हाँ! 2014 वाले लोकसभा चुनाव में लगभग एक तिहाई लोग दूसरों की और से आकर आपसे मिले थे। हाल में, मणिपुर और गोवा में जो हुआ और उसके बाद बिहार में- उसे देख आप सच कह रहे हैं कि ‘शल्य’ आपकी ओर हैं। आप सोचिए, पूछिए और जांचिए कि उसे किसने अपने साथ लिया। गलती शल्य की नहीं उसे अपनी और मिलाने वाले की है।

2) अगर शल्य-वृति की बात आप जानते हैं तो कर्ण-वृति भी तो जानते होंगे न? कर्ण अपने मित्र को और शत्रु को ठीक-ठीक पहचान नहीं पाया। उसके मित्र ने उसका इस्तेमाल किया और शत्रु उसे वैसा महत्व देते न थे। वह भावनाओं को महत्व देता था, अच्छी बात है। पर सामने वाले के उद्देश्य को जाने बगैर भावों में बह जाना बेवकूफी भी तो है।
साथ ही, उसके भीतर एक आक्रोश-जन्य कुंठा सम्पूर्ण समाज और उसकी जातिवादी सोच ने भरी थी। उसने कहीं मान लिया जैसे एक अर्जुन को मार उसकी प्रतिष्ठा स्थापित हो जाएगी और क्षत्रियता का परम पद मिल जायेगा।

आप क्यों कर्ण-वृति से असल शत्रु की जगह किसी और जगह अपना ध्यान और अपनी ऊर्जा को व्यर्थ करने में जुटे हुए हैं? आपको तो जनता ने कर्ण नहीं ‘राम पद’ दिया है। इस जनता की सेना के नायक कब बनेंगे?

3) सलाह तो मेरी पहुँचेगी नहीं फिर भी, भोजपुरी में कहूँ तो “अधिका हूँ” इसलिए दे रही हूँ। जब शल्य-वृति जानते हैं तो जान-बूझकर शल्य को सारथी मत बनाइए न।


sudipti-profileसुदीप्ति। जेएनयू की रिसर्च स्कॉलर। बिहार के महाराजगंज की मूल निवासी। इन दिनों राजस्थान के मेयो कॉलेज में प्राध्यापिका। किसी भी मुद्दे पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखती हैं।

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