एक अच्छी नौकरी और अच्छा घर हर किसी का सपना होता है, इसके लिए अपना घर-बार छोड़ गांव से बड़ी संख्या में शहर की ओर पलायन भी होता है । शहर का मायाजाल ऐसा कि नौकरीपेशा लोग EMI की उलझन सुलझाते-सुलझाते कब उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच जाते हैं जहां से पीछे मुड़कर देखना उनके लिए मुमकिन नहीं होता । लेकिन कुछ युवा ऐसे भी हैं जो शहर के मायाजाल को वक्त रहते भांप लेते हैं और उससे निकलकर अपनी नई मंजिल खुद तय करते हैं । ऐसे ही लोगों में एक नाम है सुधीर सुंदरियाल का । उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल के रहने वाले सुधीर सुंदरियाल करीब 18 साल दिल्ली में मीडिया की नौकरी करने के बाद अपने गांव लौट गए और आज वहां कृषि-शिक्षा और पहाड़ की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए बेहतरीन काम कर रहे हैं। पिछली रिपोर्ट में हमने सुधीर जी के बारे में विस्तार से चर्चा की, लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि सुधीर जी ने अपनी नई मंजिल कैसे तय की और उनको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा । सुधीर सुंदरियाल से अरुण यादव की लंबी बातचीत का कुछ अंश बदलाव के पाठकों के लिए प्रकाशित किया जा रहा है ।

बदलाव- शहर की चकाचौंध और सुविधाओं को छोड़कर गांव लौटने का फैसला लेने में किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा ?

सुधीर सुंदरियाल- सच कहूं तो हमारे जीवन में जो सबसे बड़ी कमी थी वहीं हमारा सबसे बड़ा हथियार बनी । हमारी कोई औलाद नहीं थी, हालांकि हम चाहते तो वैज्ञानिक पद्यति की मदद से उस कमी को पूरा कर सकते थे, लेकिन हमने ऐसा करने की बजाय अपने सपने को जीने का फैसला किया। एक बच्चे की बचाय गांव के बच्चों को अपनाने और पढ़ाने का निर्णय किया। खास बात ये कि इस फैसले का रिश्तेदारों ने जरूर विरोध किया लेकिन मेरी पत्नी ने पूरा साथ दिया और इस तरह हम वापस गांव लौट गए ।

बदलाव- गांव जाने से पहले क्या आपने कोई खास तैयारी की या फिर वहां जाने के बाद सबकुछ तय किया ?

सुधीर सुंदरियाल- जब आप अच्छी खासी नौकरी छोड़ने का फैसला करते हैं तो अगले दिन से ही आपकी आमदनी जीरो हो जाती है, ऐसे में परिवार का खर्च चलाना बड़ी चुनौती होती है, लिहाजा नौकरी छोड़ने के बाद जिस काम को करने की सोच रहे हैं उसके बारे में पूरी तरह रिसर्च कर लेना जरूरी होता है ।आप जो करने जा रहे हैं उसमें आपका कितना मन लगता है और उसकी सफलता की कितनी गारंटी है और सबसे ज्यादा जरूरी है कि आपका मकसद क्या है । मेरा मकसद साफ था कि गांव में गरीब बच्चों और किसानों के लिए कुछ अलग करना है, इसलिए मेरे सामने ज्यादा मुश्किल नहीं आई और आज मैं 30 गांव के बच्चों को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के काम में जुटा हूं ।

बदलाव- गांव में आपने इन 5 सालों में क्या-क्या काम किया ?

सुधीर सुंदरियाल- सबसे पहले मैंने 2015 में अपने गांव में ‘भलु लगद’ नाम से एक नॉलेज एंड इनफॉर्मेशन सेंटर की स्थापना की, जिसका मकसद था गांव के बच्चों और किसानों को सही और जरूरी सूचनाएं पहुंचाना । धीरे-धीरे मैं और मेरी पत्नी बच्चों को पढ़ाने का काम भी करने लगे । जिसका असर ये हुआ कि आसपास के इलाकों से भी बच्चे आने शुरू हो गए, जिससे हमारा इरादा और पक्का हो गया । फिर धीरे-धीरे एक गांव से दूरे गांव और अब 30 गांव तक भलु लगद यानी फील गुड हो रहा है । बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ किसानों को भी हमने जोड़ना शुरू किया इसके लिए पहले मैंने खुद पंतनगर से 10 दिन का प्रशिक्षण लिया और किसानों को खेती के प्रति जागरुक करने लगा ।आज किसान साग-सब्जी के साथ साथ इलाइची, नींबू, जैसे तमाम पौधे लगा कर अपनी आय को बढ़ा रहे हैं ।

बदलाव- अगर कोई शहर की नौकरी छोड़कर गांव जाकर खेती करना चाहता है तो उसे किन बातों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ?

सुधीर सुंदरियाल- देखिए जब आप नौकरी छोड़ने का दुश्साहस कर सकते हैं तो फिर आपके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है । फिर भी गांव लौटने से पहले चरणबद्ध तरीके से तैयारी करनी जरूरी है । आपको थ्री लेयर प्लान पर काम करना होगा ।आप पहले उस दिशा में सोचें जिससे तुरंत पैसा आए और आपकी रोज मर्रा की जरूरतें पूरीं हो सकें, उसके बाद आप वो काम करें जिससे कुछ महीने बाद पैसा मिलने लगे। तीसरा और सबसे अच्छा प्लान लॉन्ग टर्म इनवेस्टमेंट है यानी ऐसा काम करें जिससे 3-5 साल बाद पैसा आना शुरू हो लेकिन 20-25 साल तक आता रहे।

बदलाव- थ्री लेयर प्लान के बारे में थोड़ा विस्तार से बताएं जिससे लोगों को समझने में सहूलियत हो ?

सुधीर सुंदरियाल- देखिए गांव के लिए पशुपालन अच्छा व्यवसाय है जिसको शुरू करते ही पैसा आने लगेगा ।इसमें आप गाय, भैंस, बकरी, मुर्गी पालन जैसे व्यवसाय को चुन सकते हैं । दूसरा भौगोलिक स्थिति के आधार पर आप साग-सब्जी की पैदावार कर सकते हैं। जो कुछ महीने बाद आपके लिए आमदनी का जरिया बन सकती है । लेकिन ध्यान रहे सब्जियां वहीं उगाएं जिसकी डिमांड हो या फिर मसाले में इस्तेमाल होने वाली चीजों को उगा सकते हैं । जिससे आपको तीन महीने बाद पैसा आने लगे । तीसरा नंबर आता है उन फल या फिर पौधों का जो लगाने के 3-5 साल बाद फल देना शुरू करते हैं लेकिन एक बार लगाने पर 15-20 साल तक चलते हैं अगर आप पहाड़ों में रहते हैं तो इलाइची, किवी जैसी दूसरी पैदावार आप कर सकते हैं। मैदानी इलाकों में हैं तो नींबू, पपीता, अमरूद, केला या फिर इस तरह की और चीजें की जा सकती हैं । ऐसा करने का मकसद ये होता है कि अगर किसी वजह से एक तरफ नुकसान भी हुआ तो उसकी भरपाई दूसरी जगह से होने की उम्मीद रहेगी ।

बदलाव- सुना है आपने अपने गांव में कृषि केंद्र भी खोल रखा है ?

सुधीर सुंदरियाल- किसानों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल होती है किसी भी फसल या फिर पैदावार के बारे में जानकारी जुटाना । इसके लिए हमने “उम्मीद” नाम से समन्वित कृषि बागवानी केंद्र की स्थापना की है । साथ ही 15×25 का एक पॉली हाउस भी बास-बल्ली के जरिए बना रखा है, जिसमें 20 अलग अलग तरीके के पेड़ पौधे और औषधियां उगाई जा रही हैं । हालांकि पॉली हाउस के लिए सरकारें 80-90 फीसदी तक सब्सिडी देती हैं, आप चाहे तो उसकी मदद भी ले सकते हैं । आप यकीन नहीं मानेंगे हमारे गांवों में उगाई गई साग-सब्जियां दिल्ली के तमाम स्टोर्स में जा रही हैं । खास बात ये है कि हम लोग पूरी तरह जैविक पद्धति को अपना रहे हैं ।

बदलाव- आप गढ़वाली संस्कृति को लेकर भी कुछ काम कर रहे हैं ?

सुधीर सुंदरियाल- (हंसते हुए) कुछ काम जरूर किया है लेकिन उसमें कुछ ऐसा है जिसके लिए मुझे पहले तो काफी विरोध का सामना करना पड़ा, हालांकि बाद में सभी लोग मेरे साथ खड़े हो गए । मसलन पहाड़ी संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए मैंने पुरुषों के एकाधिकार वाले ढोल दमाऊं और सरैया टीम में महिलाओं को शामिल करने की मुहिम छेड़ी तो काफी विरोध हुआ, इसी तरह महिलाओं के एकाधिकारी वाले थड़िया चौंफला टीम में पुरुषों की एंट्री भी कराई और आज महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पहाड़ी संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम कर रही हैं ।

बदलाव- शिक्षा, संस्कृति, कृषि और जल संरक्षण पर आप एक साथ काम कर रहे हैं। इसमें कितनी मुश्किलें आती हैं ?

सुधीर सुंदरियाल- जब आप एसी दफ्तर से निकलकर गांव की गलियों में कुछ करने की ठान लेते हैं तो फिर कुछ भी मुश्किल नहीं होता । ग्राउंड पर रहते हुए आपके सामने जो मुश्किलें आती हैं उसे आप दूर तो करते ही हैं साथ ही उस मुश्किल से लड़ते हुए कुछ नया करने की नई सोच भी विकसित करते हैं और यही हमें ऊर्जा देती हैं जिसकी वजह से शिक्षा पर काम करने से शुरू हुआ हमारा सफर कृषि, जल संरक्षण तक जा पहुंचा है ।

बदलाव- आपके इस काम में स्थानीय लोगों की कितनी मदद मिल रही है?

सुधीर सुंदरियाल- शुरूआत में लोगों का जितना विरोध झेलना पड़ा अब उससे भी ज्यादा सहयोग मिल रहा है । यही वजह है कि स्थानीय संगठनों के अलावा उत्तरांचल एसोसिएशन ऑफ अमेरिका भी हमारी मदद के लिए सामने आया है और जिन गांवों में हमारा ट्रेनिंग सेंटर हैं वहां ट्रेनर का जो भी खर्च होता है अब वही संगठन उठा रहा है । इसलिए पहले आपको करके दिखाना होगा तभी दूसरों से मदद की उम्मीद भी कर सकते हैं ।

बदलाव- शहर छोड़कर गांव आने की इच्छा रखने वालों के लिए कोई खास संदेश देना चाहेंगे ?

सुधीर सुंदरियाल- देखिए हर किसी की अपनी समस्याएं होती हैं, लेकिन अगर आपने मन बना लिया है तो सभी चुनौतियों से लड़ सकते हैं। लिहाजा आपके अंदर कुछ अलग करने की दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिए और वहीं आपको अपने सपने को जीना सिखाएगा ।

बदलाव से बात करने के लिए धन्यवाद ।